(Video) Daily Current Affairs for UPSC, IAS, UPPSC/UPPCS, BPSC, MPSC, RPSC & All State PSC/PCS Exams - 16 November 2020


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भारत के बिना हुआ दुनिया का सबसे बड़ा व्यापार समझौता

  • आसियान (ASEAN- ASSOCIATION OF SOUTHEAST ASIAN NATION) पूर्व एषियाई देषों का एक क्षेत्रीय संगठन है इसकी स्थापना 1967 में आसियान घोशणापत्र (बैंकाॅक घोशणा) सदस्य देषों द्वारा हस्ताक्षर करने के बाद हुयी।
  • इसका उद्देष्य दक्षिण पूर्व एषियाई देषों के समृद्ध और षांतिपूर्ण समुदाय के लिए आर्थिक विकास, सामाजिक प्रगति तथा सांस्कृतिक विकास में तेजी लाने के लिए की गई थी।
  • कृशि और उद्योगों के अधिक उपयोग, व्यापार विस्तार, परिवहन और संचार सुधार लाने विकास में तेजी लाकर पूरे क्षेत्र के लोगों के मानवीय विकास सर्वोच्चता प्रदान करना ।
  • आसियान ने अपने उद्देष्यों को प्राप्त करने के लिए आपसी व्यापार को बढ़ावा देने के साथ आसियान राश्ट्रों ने 6 भागीदार के साथ मुक्त व्यापार समझौता किया। आसियान सदस्य देष एवं मुक्त व्यापार समझौता भागीदार देष निम्नलिखित हैं।

सदस्य राश्ट्र

  • आसियान राश्ट्रों के साथ 6 FTA भागीदार
  • इंडोनेषिया
  • भारत (AIFTA)
  • मलेषिया
  • पीपुल्स रिपब्लिक ऑफ़ चाइना (ACFTA)
  • फिलीपींस
  • कोरिया गणराज्य (AKFTA)
  • सिंगापुर
  • जपान (AJCEP)
  • थाईलैण्ड
  • आस्ट्रेलिया और न्यूजीलैण्ड (AANZFTA)
  • ब्रुनेई
  • वियतनाम
  • लाओस
  • म्यांमार
  • कंबोडिया
  • आसियान राश्ट्रों एवं इसके FTA भागीदारों के मध्य एक आधुनिक, व्यापक, उच्च, गुणवत्ता पूर्ण तथा पारस्परिक रूप से लाभकारी एक समझौता करने की पहल नवंबर 2012 में 21 वें आसियान षिखर सम्मेलन के दौरान प्रारंभ की गई। इस प्रस्तावित समझौते को क्षेत्रीय व्यापक आर्थिक भागीदारी (RCEP-REGIONAL COMPREHENSIVE ECONOMIC PARTNERSHIP) नाम दिया गया।

आरसीईपी क्या है ?

  • आरसीईपी कुछ देशों को एक समूह हैए जिसमें दस आसियान देश समेत आस्ट्रेलियाए चीनए जापानए दक्षिण कोरिया और न्यूजीलैंड शामिल हैं।
  • इनके बीच में एक मुक्त व्यापार समझौता किये जाने का प्रयास पिछले 8 सालों से किया जा रहा था जो कि अब हो गया है । जिसके बाद इन देशों के बीच बिना आयात शुल्क दिए व्यापार किया जा सकता है।
  • इस मेगा मुक्त व्यापार समझौता में वस्तुए सेवाओंए निवेशए आर्थिक और तकनीकी सहयोगए प्रतिस्पर्धा और बौद्धिक संपदा अधिकारों से जुड़े मुद्दे शामिल हैं।

कितना महत्वपूर्ण है आरसीईपी ?

  • आरसीईपी दुनिया का सबसे बड़ा आर्थिक समूह है और वैश्विक अर्थव्यवस्था में क़रीब 50 फ़ीसदी की हिस्सेदारी रखता है। भारत के शामिल न होने से यह आंकड़ा थोड़ा कम होगा ! साल 2050 तक आरसीईपी के सदस्य देशों का सकल घरेलू उत्‍पाद लगभग 250 ट्रिलियन अमरीकी डालर होने की संभावना है।

भारत को क्या फायदा हो सकता था आरसीईपी से ?

  • भागीदार देशों की तादाद और दायरेए दोनों ही पैमाने परए आरसीईपी बेहद महत्त्वाकांक्षी योजना है।
  • इससे भारत के वस्तु व्यापार में वृद्धि होती।
  • भारत को आसियान देशों का बाजार मिल सकता था।
  • समझौता होने के बाद चीन-जापान और दक्षिण कोरिया से भारत में आने वाला निवेश भी बढ़ जाता।
  • सेवा क्षेत्र में भारत के निर्यात में वृद्धि हो सकती थी।
  • आरसीईपी समझौते से बाहर होने के बाद भारत वैश्विक मूल्य श्रृंखला (GLOBAL VELUE CHAINS) के लाभों से दूर हो सकता है।
  • पूर्वोत्तर भारत के जरिए व्यापार में वृद्धि से पूर्वोत्तर के राज्यों के आर्थिक विकास में भी मदद मिलता। इसे एक रणनीतिक लाभ के तौर पर देखा जा सकता है।

फिर क्या नुकसान था आरसीईपी से ?

  • मौजूदा वक्त मेंए सेवा क्षेत्र के लिहाज से भारत की स्थिति काफी मजबूत है। लेकिन दिक्कत यह है कि आरसीईपी में वस्तुओं की तुलना में सेवाओं के व्यापार में ज्यादा छूट नहीं है। ऐसे मेंए भारत को इससे बहुत लाभ की उम्मीद नहीं है।
  • दक्षिण कोरिया-आस्ट्रेलिया और न्यूजीलैंड के साथ भी भारत का व्यापार घाटा बढ़ने की आशंका
  • इसमें बौद्धिक संपदा के कड़े नियम शामिल है। इसके चलते भारत का जेनेरिक दवा उद्योग प्रभावित हो सकता है।
  • आयात शुल्क खत्म करने से भारत के कृषि आधारित उद्योगोंए वाहन-दवा और स्टील के प्रभावित होने की आशंका
  • चीनी सामान की ज़्यादा आपूर्ति से भारतीय मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर प्रभावित हो सकता है।
  • कई सालों से लगातार कई दौर की वार्ता के बावजूद यह समझौता भारत की मांगों के अनुसार आगे नहीं बढ़ पा रहा है।

किसानों को है आरसीईपी पर आपत्ति

  • किसान नेताओं का कहना है कि आरसीईपी व्यापार समझौता-विश्व व्यापार संगठन से ज्यादा खतरनाक है। भारत आरसीईपी के तहत व्यापार करने वाली वस्तुओं पर शुल्क को 92% से घटा कर 80% करने के लिए दवाब बना रहा हैए पर भारत बाद में ड्यूटी बढ़ा नहीं सकेगा। यह एक ऐसा प्रावधान हैए जिससे भारत को अपने किसानों और उनकी आजीविका के संरक्षण खासी दिक्कत होगी।
  • साथ ही इससे डेयरी व्यवसाय को बड़ा नुकसान होगा। भारत का अधिकांश असंगठित डेयरी सेक्टर वर्तमान में 15 करोड़ लोगों को आजीविका प्रदान करता है। आरसीईपी समझौता लागू होने के बाद न्यूजीलैंड आसानी से भारत में डेयरी उत्पाद सप्लाई करने लगेगा।

क्या आरसीईपी व्यापार घाटे का इलाज है ?

  • मौजूदा वक्त में- भारत पहले से ही 17 अन्य मुक्त व्यापार समझौतों का हिस्सा हैए लेकिन भारत जिन 17 एफटीए का पहले से हिस्सा है वे भारतीय उद्योग के लिहाज से बहुत फ़ायदेमंद नहीं साबित हुए हैं। ऐसे मेंए इस बात की क्या गारंटी है कि नयाआरसीईपी बहुत फ़ायदेमंद ही होता।
  • आरसीईपी के 16 वार्ताकारों में से केवल भारत और चीन के बीच द्विपक्षीय क्षेत्रीय व्यापार समझौते (RTA) नहीं है। चीन के साथ आरटीए नहीं होने पर भी व्यापार घाटा अत्यधिक है- ऐसे में एक बात तो साफ है कि व्यापार घाटे की जड़ आरटीए नहीं है।
  • पिछले साल नवंबर में बैंकॉक में क्षेत्रीय व्यापक आर्थिक भागीदारी यानी RCEP की शिखर बैठक का आयोजन किया गया। इस मौके पर दुनिया भर के कई बड़े नेता मौजूद थे। बैठक के दौरान भारत ने RCEP समझौते में शामिल नहीं होने का फैसला लिया था। दरअसल कई मुद्दों पर चिंताओं का समाधान न हो पाने के कारण यह निर्णय लिया गया। भारत के इस फैसले का ऐलान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा RCEP शिखर बैठक में उनके संबोधन के दौरान किया गया।

क्या कहा था प्रधानमंत्री ने ?

  • प्रधानमंत्री मोदी ने बताया कि समझौते की मौजूदा रूपरेखा तय मार्ग दर्शक सिद्धांतों की मूल भावना के अनुरूप नहीं है। उनका कहना था कि इस समझौते से भारत से संबंधित मुद्दों और चिंताओं का भी संतोषजनक समाधान नहीं होता- इसलिए इस पर हस्ताक्षर करना संभव नहीं है। प्रधानमंत्री ने आगे कहा कि भारत अधिक क्षेत्रीय एकजुटता के साथ-साथ अधिक मुक्त व्यापार और नियम आधारित अंतर्राष्ट्रीय व्यवस्था का पक्षधर है।

क्या चिंताएं हैं भारत की ?

  • RCEP के लिहाज़ से भारत की कई चिंताएं हैं जिनमे प्रमुख हैं
  • आयात वृद्धि के खिलाफ अपर्याप्त सुरक्षाए
  • चीन के साथ बड़ा व्यापारिक घाटाए
  • उत्पत्ति के नियमों की संभावित ढकोसलाए
  • साल 2014 के रूप में आधार वर्ष माना जाना और
  • बाजार पहुंच व गैर टैरिफ बाधाओं पर कोई विश्वसनीय आश्वासन न मिलना।

व्यापार में संरक्षणवादी मानसिकता कहाँ तक सही है ?

  • लंबे समय से हमारी नीति दूसरे देश को अपनी बाजार से दूर रखने की हैए जबकि वर्तमान में हमें अपने नीति को दूसरे बाजारों तक पहुंच पर केंद्रित करने की आवश्यकता है। भारतीय उद्योगों को संरक्षण देने से ना केवल आयात और निर्यात में नुकसान होता है बल्कि हम वैश्विक बाजार में कम प्रतिस्पर्धी और कम गतिशील बन जाते हैं। चूँकि भारतीय उद्योग की हर जगह स्वागत और प्रतीक्षा की जा रही हैए ऐसे में आरसीईपी से बाहर होना हमारे उद्योगों को नुकसान पहुँचा सकता है।
  • चीन समेत एषिया प्रषांत महासागर क्षेत्र के 15 देषों ने रविवार (15 नवंबर) को दुनिया की सबसे बड़ी व्यापार संधि पर वियतनाम के हनोई में हस्ताक्षर कर लिया गया। इस तरह 8 वर्शों से किया जा रहा प्रयास भारत के बिना सफल हुआ।
  • अमेंरिका में डोनाल्ड ट्रम्प के हारते ही इस बात की संभावना बढ़ने लगी थी कि दक्षिण पूर्व एषिया के देष चीन के साथ अब अपने व्यापारिक संबंधों को मजबूत करेंगे क्योंकि चीन और अमेंरिका को ट्रेड वाॅर समाप्त होगा तथा चीन पर लगे प्रतिबंध खत्म होंगे।
  • यह संधि यूरोपीय संघ अमेंरिका मेक्सिको कनाडा व्यापार समझौते से भी बड़ी बताई जा रही है, जिसका नतृत्व चीन कर रहा है। इसे चीन के बढ़ते प्रभाव का एक नया रूप बताया जा रहा है।
  • समझौते के मौके पर वियतनाम के प्रधानमंत्री न्यून षुअन फूक ने इसे भविश्य की नींव बताते हुए कहा आज आरसीईपी समझौते पर हस्ताक्षर हुआ, यह गर्व की बात है, यह बहुत बड़ा कदम है कि आसियान देष इसमें केंद्रीय भूमिका निभा रहे हैं और उन्होंने सहयोगी मुल्कों के साथ मिलकर एक नये संबंध की स्थापना की है जो भविश्य में और मजबूत होगा।
  • इस नई व्यापार संधि के मुताबिक, RCEP अगले 20 सालों के भीतर कई तरह के सामानों पर सीमा षुल्क खत्म करेगा। इसमें बौद्धिक संपदा, दूरसंचार, वित्तीय सेवायें, ई काॅमर्स और अन्य व्यावसायिक सेवायें षामिल होंगी।
  • आसियान देषों ने भारत के संदर्भ में कहा है कि भारत के लिए दरवाजे खुले रहेंगे अर्थात भारत चाहे तो वह RCEP में षामिल हो सकता है।
  • 15 देषों की सदस्यता वाले देष दुनिया के निर्माण उद्योग का 30% का केंद्रण रखते हैं, ऐसे में भारत के लिए इस प्रकार के मुक्त व्यापार एग्रीमेंट बहुत महत्वपूर्ण हो जाते हैं। भारत यदि इसका भाग होगा तो अपने लिए कई संभावनायें निकाल सकता है।
  • भारत इस समय कई देषों को अपने यहाँ निवेष करने के लिए आमंत्रित कर रहा है, जिसके लिए इस प्रकार के समझौते बहुत महत्वपूर्ण हो जाते हैं।
  • भारतीय अपभोक्ताओं की खरीदने की क्षमता बढ़ रही है बावजूद कोई कंपनी जब नया निवेष करती है तो वह यह भी देखती है कि विदेषी व्यापार (निर्यात) की संभावना और लागत क्या है। इस दृश्टिकोण से भी RCEP भारत के लिए महत्वपूर्ण हो जाता है।
  • एक समय भारत, जापान और आस्ट्रेलिया के साथ मिलकर चीन को नियंत्रित करने का प्रयास कर रहा था लेकिन वह अब RCEP और चीन के साथ भारत के बिना बढ़ चुके हैं ऐसे में भारत की रणनीति एक नये सिरे से तय करना होगा।