(Video) Daily Current Affairs for UPSC, IAS, State PCS, SSC, Bank, SBI, Railway, & All Competitive Exams - 02 August 2020


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आधुनिक दासता (Modern Slavery) क्या है?

  • व्यक्ति अपने जीवन में क्या करना चाहता है क्या नहीं यह चयन करना उसका अधिकार है। हमारे देश के साथ-साथ लगभग अधिकांश देशों में इसे व्यक्ति का निजी फैसला माना जाता है। यह व्यक्ति के मानवाधिकार का भाग है। जिसे कोई व्यक्ति/संस्था/संगठन /कंपनी नहीं छीन सकती है।
  • मानवाधिकार के यह मूल्य आज से 500 साल या हजार साल पहले इतने प्रचलित नहीं थे और व्यतियों की खरीद- फरोख्त होती थी, कुछ रकम देकर उन्हें जीवन भर के लिए गुलाम बना लिया जाता था, कई बार गुलामी पैतृक होती थी, बंधुआ मजदूरी या बलातश्रम करवाया जाता था।
  • 1950 के दशक से इस प्रकार के अमानवीय प्रथाओं को रोकने के लिए विश्व समुदाय एकजूट होने लगा लेकिन सभी देशों को एक साथ सहमत कर लेना कठिन था। फलस्वरूप आज भी कई देशों में दासता (Slavery) मौजूद है जिसे आधुनिक दासता (Modern Slavery) के नाम से जाना जाता है।
  • आधुनिक दासता या गुलामी उस परिस्थिति को इंगित करती है जिसमें उसकी स्वतंत्रता उससे छीन ली जाती है। अर्थात वह क्या करेगा क्या नहीं यह निर्णय लेने की वह स्वतंत्रता खो देता, उसका शोषण होता है, उसके साथ हिंसा, बलात्कार की घटना होती है, उसे घमकी दी जाती है।
  • उदाहरण स्वरूप वेश्यावृत्ति, बलात भिक्षावृत्ति, जबरन विवाह, बाल विवाह, बंधुआ मजदूरी आदि इसके रूप माने जाते हैं।
  • भारत में व्यक्ति की स्वतंत्रता की घोषणा की गई है, कई प्रकार के कानूनी और विधिक अधिकार लोगों को दिये गये है बावजूद इसके आधुनिक दासता की शिकार सबसे बड़ी आबादी भारत में निवास करती है।
  • वर्ष 2018 के आंकड़ों के अनुसार लगभग 4 करोड़ 3 लाख लोग आधुनिक दासता के शिकार हैं इसमें से 2.5 करोड़ लोग जबरन मजदूरी और 54 लाख लोग जबरन शादी के शिकार हुए है।
  • आधुनिक दासता से पीड़ित हर 4 व्यक्ति में से एक पीडित बच्चा है।
  • लगभग 48 लाख लोगों को जबरदस्ती यौन शोषण के क्षेत्र में धकेल दिया गया है।
  • हर साल 30 जुलाई को World Day Against Trafficking in Persons के रूप में मनाया जाता है।
  • इसी अवसर पर कॉमनवेल्थ ह्यूमन राइटस इनिशिएटिव (CHRI) तथा वॉक फ्री (Walk Free) द्वारा दासता (Slavery) के संदर्भ में एक रिपोर्ट प्रस्तुत की गई।
  • इस रिपोर्ट में यह कहा गया है कि आधुनिक दासता से ग्रसित 40 प्रतिशत लोग राष्ट्रमंडल देश से संबंधित है।
  • राष्ट्रमंडल देशों द्वारा वर्ष 2018 में बलपूर्वक श्रम, बाल श्रम, मानव तस्करी को समाप्त करने, आधुनिक दासता को वर्ष 2030 तक समाप्त करने एवं सतत विकास लक्ष्य (लक्ष्य 8.7) आदि की समीक्षा दरअसल इस रिपोर्ट में की गई है।
  • रिपोर्ट कहती है कि राष्ट्रमंडल देश के प्रत्येक 150 व्यक्ति में से एक व्यक्ति आधुनिक दासता का शिकार है।
  • राष्ट्रमंडल देशों द्वारा आधुनिक दासता उन्मूलन के प्रति बहुत प्रतिबद्धता नहीं दिखाई गई है।
  • राष्ट्रमंडल के 1/3 देशों में जबरन विवाह एवं बहुत से देशों में व्यावसायिक यौन शोषण होता है।
  • भारत के पास आधुनिक दासता से निपटने के लिए न कोई राष्ट्रीय कार्य योजना (National Action Plan) है और न ही राष्ट्रीय समन्वय निकाय (National Coordinating Body) है।
  • विश्व की कुल बाल वधुओं का कुल एक तिहाई भारत में है।
  • भारत द्वारा अंतर्राष्ट्रीय श्रम संगठन के 2011 के घरेलू कामगारों पर कन्वेंशन तथा 2014 के Forced Labour Protocol (FLP) की पुष्टि नहीं की गई है।
  • Forced Labour Protocol राज्य सरकारों को इस बात के लिए बाध्य करता है कि बलात श्रम से पीड़ितों को सुरक्षा और उचित श्रम प्रदान करें। इसके साथ ही जबरन और अनिवार्य श्रम को समाप्त करने के लिए कठोर कदम उठाने का भी प्रावधान करना होगा।
  • हालांकि भारत कई कन्वेंशन और प्रोटोकॉल का हस्ताक्षरकर्ता है जिसमें महिलाओं और बच्चों की सुरक्षा करने की प्रतिबद्धता प्रकट की गई है।
  • भारत द्वारा महिलाओं एवं बच्चों की तस्करी एवं वैश्यावृत्ति रोकने के लिए सार्क (SAARC) कन्वेंशन की पुष्टि की गई है।
  • इसी प्रकार भारत यूनाइटेड नेशंस कन्वेंशन ऑन ट्रांसनेशनल ऑर्गनाइज्ड क्राइम का हस्तक्षरकर्ता है जिसमें महिलाओं/बच्चों की तस्करी रोकने की बात की गई है।
  • वर्ष 2006 में गृह मंत्रलय द्वारा एक नोडल सेल का निर्माण किया गया है जो राज्य द्वारा मानव तस्करी को रोकने के प्रयासों को देखता है।
  • न्यायालय द्वारा भी न्यायिक अधिकारियों को प्रशिक्षत एवं संवेदनशील बनाने के लिए सम्मेलनों का आयोजन किया जाता है।
  • प्रशासन के कई भागों द्वारा इस विषय पर जागरूकता पैदा करने के लिए कई प्रकार के आयोजन एवं कार्यक्रम चलाये जाते हैं।
  • कई जिलों में एंटी हुयूमन ट्रेफिकिंग इकाइयों की स्थापना की गई है।
  • भारतीय दंड संहिता के विभिन्न धाराओं 366A, 366B, 370, 374 में इसे रोकने के प्रावधान है।
  • इसके अलावा बाल श्रम अधिनियम 1956, बंधुआ मजदूरी (उन्मूलन) अधिनियम 1976, किशोर न्याय अधिनियम, 2015 एवं सूचना प्रौद्योगिकी (IT) अधिनियम 2000 में भी इससे संबंधित प्रावधान किये गये है।
  • इसके अलावा भारतीय संविधान के मूल अधिकार खण्ड में अनुच्छेद 21, 23 एवं 24 तथा नीति निदेशक तत्व के अनुच्छेद 39 एवं 42 में इससे संबंधित प्रावधान दिये गये है।

Challenge Accepted मूवमेंट क्या है?

  • हर तकनीकी समाज में कुछ न कुछ परिवर्तन लाती है। इसी तकनीकी परिवर्तन का एक रूप सोशल साइट्स का विकास है।
  • आज अधिकांश लोग सोशल साइट्स के किसी न किसी प्लेटफॉर्म पर जुड़े है। लोग इन साइट्स के माध्यम से अपने मनोभाव एवं सामाजिक सरोकार को कई तरह से व्यक्त करते है।
  • इन सोशल साइट्स की एक महत्वपूर्ण भूमिका हमें उनके आंदोलनों के लिए इनके उपयोग के संदर्भ में दिखाई देती है। पर्यावरण, कानून व्यवस्था, महिला सुरक्षा, राजनीतिक- सामाजिक मुद्दे आदि से संबंधित मुद्दों को आजकल इस प्रकार के प्लेटफॉर्म से उठाया जाता है।
  • अभी कुछ समय पहले एक बहुत ही प्रसिद्ध आंदोलन मी-टू (Me-Too) इसी वजह से सफल हो पाया क्योंकि सोशल साइट्स पर इसे व्यापक सहमति मिली।
  • वर्तमान समय में ऐसा ही एक आंदोलन पुनः सुर्खियों में बना हुआ है जिसका नाम चैलेंज एसेप्टेड (Challenge Accepted) है।
  • हैशटैग Challenge Accepted एवं हैशटैग Women Supporting Women के माध्यम से महिलायें अपनी ब्लैक एंड व्हाइट तस्वीरों को साझा कर के महिलाएं सोशल जस्टिस में अपनी भागीदारी सुनिश्चित कर रही है।
  • ब्लैक एंड व्हाइट फोटो को ट्रेंड या हैशटैग के साथ शेयर करने के पीछे कई प्रकार के तर्क है।
  • कुछ लोगों का मानना है कि यह नस्लवाद के आधार पर होने वाले भेदभव के विरोध में है।
  • कुछ लोगों का कहना है कि यह उस पुरानी सोच पर प्रहार है कि समाज में बहुत कुछ तो बदल गया है लेकिन सोच लोगों की पुरानी है, पितृ सप्तात्मक है।
  • कुछ लोगों का कहना है कि यह महिला हिंसा के खिलाफ है क्योंकि हिंसा के बाद पेपर में ब्लैक एंड व्हाइट फोटो का उपयोग किया जाता है।
  • कुछ लोगों का कहना है कि महिला की खुबसूरती को रंग से जोड़कर देखा जाता है और रंग को लेकर कई प्रकार की हिंसा महिलाओं के साथ होती है।
  • कुछ समीक्षक यह कह रहे है कि महिलाओं पर होने वाली हिंसा पुराने समय से होती आ रही है जब ब्लैक एंड व्हाइट फोटो चला करते थे इसलिए हम अपना सहयोग/साथ/ सहानुभूति उन महिलाओं के साथ खड़ा करना चाहते है जिनके साथ हिंसा हो चुकी है।
  • कुछ समीक्षक इसे इस रूप में देख रहे है कि महिलाओं को अभी भी दोयम दर्जे (रंगीन मतलब सम्मान) का माना जाता है इसलिए वह इसका विरोध कर रही है।
  • उपरोक्त विचारों का सार यह हो सकता है कि महिलायें अपना सशक्तिकरण कर रही हैं, अपने साथ होने वाले अन्याय का विरोध कर रही है।
  • यह आंदोलन कहां से कैसे प्रारंभ हुआ इसे लेकर एकमत का अभाव है।
  • वर्ष 2016 में भी केंसर के प्रति जागरूकता पैदा करने के लिए यह हैशटैग चैलेंज एस्सेप्टेड ट्रेंड कर चुका है।
  • इसके बाद कई बार सकारात्मकता फैलाने के लिए यह प्रयोग हो चुका है।
  • कुछ अखबारों के अनुसार इसका प्रारंभ हाल में ब्राजीलियन जर्नलिस्ट Ana Paula Padrao द्वारा अपनी फोटो शेयर करने के साथ हुआ।
  • कुछ लोग हाउस ऑफ Representative में दिये गये Alexandria Ocasio Cortez की स्पीच से जोड़कर देख रहे है।
  • कुछ लोगों का कहना है कि यह तुर्की में हुई एक घटना से प्रारंभ हुई है। दरअसल यहां महिलाओं की हत्या के सैकड़ों केस हर साल आते है।
  • यहाँ लिंग आधारित हत्या की कई आये दिन यहां के समाचारों में बनी रहती है।
  • हाल ही में Pinar Gutelkin नाम एक 27 वर्षीय महिला की हत्या उसके एक्स ब्यायफ्रेंड द्वारा किये जाने के बाद यहां आक्रोश फूट पड़ा है। इसी कारण तुर्की से यह आंदोलन बाहर फैला जिसमें महिलायें एक दूसरे के साथ खड़ी हो रही है।
  • पूरे विश्व की हजारों महिला सेलिब्रेटी ने इसे अपना समर्थन दिया ही और सभी समुदाय की महिलाओं एक दूसरे के साथ अपने को खड़ा कर के यह संदेश दे रही है कि इस असामाजिक कृत्य/व्यवहार के वह खिलाफ है।
  • यहां पर इंस्ताबुल कन्वेंशन भी चर्चा में बना हुआ है। 1990 के दशक में यूरोप मे यह विचार फैलने लगा कि महिलाओं के खिलाफ होने वाली हिंसा के खिलाफ एक कानूनी रूप से बध्यकारी समझौता किया जाये। और महिलाओं की सुरक्षा के लिए सभी देशों को ठोस कदम उठाना चाहिए।
  • कांउसिल ऑफ यूरोप (47 सदस्य) ने इस पर कार्य करना प्रांरभ किया इसका मुख्यालय फ्रांस के स्ट्रासबर्ग शहर में है।
  • इस कांउसिल द्वारा एक कन्वेंशन लाया गया जिसे इस्तांबुल कन्वेंशन के नाम से जाना जाता है। इसका अधिकारिक नाम- Council of Europe Convention on Preventing and combating violence against Women and domestic violence है।
  • वर्ष 2011 से इस पर हस्ताक्षर प्रारंभ हुआ और तुर्की पहला देश बना जिसने हस्ताक्षर एवं रेटिफाई किया। ऐसे देशों की संख्या इस समय 34 है।
  • 1 अगस्त 2014 से यह प्रभावी हुआ। वर्ष 2017 में यूरोपीय यूनियन ने भी इस पर हस्ताक्षर कर दिया 12 देश ऐसे है जिन्होंने इस पर हस्ताक्षर तो किया है लेकिन रेटिफाई नहीं किया है। यह देश पूर्वी यूरोप से है। यहां आर्थोडोक्स क्रिश्चियनिटी का प्रभाव ज्यादा है।
  • रूस एवं अजरबैजान ने हस्ताक्षर करने से ही मना कर दिया था।
  • यह महिलाओं की सुरक्षा के लिए कदम उठाने के लिए कानूनी बाध्यकारी पहली संधि है।
  • इस संधि के अनुसार महिला हिंसा को मानवाधिकार का हनन माना गया है।
  • इसमें हिंसा के प्रकार, स्वरूप, रोकथाम की विस्तृत से व्याख्यायित किया गया है।
  • हाल ही में पोलेंड एवं तुर्की ने इस समझौते/क्वेंशन से बाहर होने की घोषणा की हैं आने वाले समय में यह दोनों देश बाहार हो सकते है।