(Wide Angle with Expert) भारत - भूटान संबंध - द्वारा विवेक ओझा (India-Bhutan Relations by Vivek Ojha)

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(Wide Angle with Expert) भारत - भूटान संबंध - द्वारा विवेक ओझा (India-Bhutan Relations by Vivek Ojha)


विषय का नाम (Topic Name): भारत - भूटान संबंध - द्वारा विवेक ओझा (India Bhutan Relations by Vivek Ojha)

विशेषज्ञ का नाम (Expert Name): विवेक ओझा (Vivek Ojha)


भारतीय प्रधानमंत्री की एक बार फिर से भूटान यात्रा अंतर्राष्ट्रीय जगत में चर्चा का विषय बनी हुई है । सामरिक मुद्दों के विश्लेषकों को इसमें चीन को भूटान को अपने प्रभाव में ना ले पाने की रणनीतिक यात्रा नजर आ रही है , जो बहुत हद तक सही भी है , लेकिन भारत भूटान संबंध को केवल चीन कारक से जोड़कर ही देखा जाना भूटान के साथ अन्याय करने जैसा हो जाएगा । यह सच है कि दक्षिण एशिया में भूटान ही एक मात्र देश है जिसका चीन के साथ कूटनीतिक संबंध नहीं है , ना ही चीन का दूतावास है और ना कांस्युलेट ऑफिस । भूटान अन्य दक्षिण एशियाई देशों की तरह चीन के वन बेल्ट वन रोड पहल का हिस्सा भी नहीं है , ना ही मैरीटाइम सिल्क रूट और मोतियों की लड़ी की नीति का हिस्सा है । वैसे भी भूटान एक लैंडलॉक्ड देश है । भूटान ने अपने यहां 2018 में जिस चुनाव का हवाला देकर बांग्लादेश , भूटान , भारत और नेपाल मोटर व्हिकल एग्रीमेंट से अपने को बाहर कर लिया था , उसमें भी चीन फैक्टर कहीं ना कहीं शामिल था । चीन के नेपाल और बांग्लादेश के साथ और इन देशों का चीन की नीतियों को खुला समर्थन देने की बात किसी से छुपी नहीं है । एक दो उदाहरणों से स्पष्ट करें तो उसमें चीन नेपाल के बीच केरूंग काठमांडू रेल लिंक , चीन द्वारा बांग्लादेश में पदमा रेल लिंक , पदमा बांध और पायरा डीप सी पोर्ट , कर्नफुली टनल बनाने में अपने को संलग्न करने से एक बात जाहिर होती है कि अवसंरचना निर्माण , सड़क निर्माण , कॉरिडोर को बनाने के चीन के मकसद में ये देश किसी ना किसी रूप में साथ रहें हैं । बीबीआईएन - मोटर व्हीकल एग्रीमेंट से जब नेपाल और बांग्लादेश से पैसेंजर और कार्गो वाहन और ट्रकों की आवाजाही भूटान में शुरू होगी तो भूटान में चीन की भी अप्रत्यक्ष रूप से उपस्थिति बढ़ेगी । विदेशी मामलों में निरपेक्ष रहने वाला और बफर स्टेट की भूमिका निभाने वाला भूटान एशियाई शक्तियों की राजनीति में उलझ कर रह जाएगा , इसलिए भूटान ने अपने को इस समझौते से बाहर कर लिया । इसके बावजूद भी चूंकि इस समझौते में भारत भी शामिल है , और यह भारत की पड़ोसी प्रथम की नीति और दक्षिण एशिया में क्षेत्रीय अंतरसंपर्कों को बढ़ावा देने वाला पहल है , इसलिए भूटान ने वर्ष 2019 में इस बात का आश्वासन भी दिया है कि वह अपने अपर हाउस में इस समझौते से जुड़ने संबंधी प्रस्ताव को फिर से पारित कराने का प्रयास करेगा ।

प्रधानमंत्री मोदी की भूटान की अगस्त यात्रा:

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी 2014 में प्रधानमंत्री बनने के बाद सबसे पहले भूटान गए थे और मई , 2019 में फिर से प्रधानमंत्री बनने के बाद वह 17 अगस्त , 2019 को दो दिवसीय यात्रा पर भूटान पहुंचे। भारत और भूटान के बीच हाइड्रो पॉवर प्रोजेक्ट, भारत के नेशनल नॉलेज नेटवर्क को भूटान से जोड़ने , मल्टी स्पेशलिएटी हॉस्पिटल, स्पेस सैटेलाइट, रूपे कार्ड के इस्तेमाल समेत 10 समझौते पर हस्ताक्षर हुए। इससे पहले प्रधानमंत्री मोदी ने भूटान के प्रधानमंत्री डॉ. लोटे शेरिंग से संसद में मुलाकात की। प्रधानमंत्री भारतीय समुदाय के लोगों से भी मिले। इस दौरान ‘भारत माता की जय’ और ‘मोदी जिंदाबाद’के नारे लगे। थिंपू के पारो इंटरनेशनल एयरपोर्ट पर प्रधानमंत्री लोटे शेरिंग ने उनका स्वागत किया। मोदी को एयरपोर्ट पर ही गार्ड ऑफ ऑनर भी दिया गया। भारत और भूटान के बीच यह निर्णय हुआ है कि इसरो भूटान में एक ग्राउंड स्टेशन लगाएगा । भारत ने इससे पहले भी भूटान को व्यक्तिगत स्तर पर सार्क सेटेलाइट का लाभ देने का प्रस्ताव किया था । प्रधानमंत्री मोदी ने भारतीय रूपे कार्ड को भी भूटान में लॉन्च किया। इससे पहले रूपे कार्ड सिंगापुर में ही लॉन्च किया गया था। प्रधानमंत्री मोदी ने 1629 में निर्मित सिमतोखा जोंग में रूपे कार्ड को लॉन्च किया । दक्षेस मुद्रा स्वैप प्रारूप के तहत भूटान के लिए मुद्रा स्वैप सीमा बढाने पर मोदी ने कहा कि भारत का रूख सकारात्मक है। विदेशी विनिमय की जरूरत को पूरा करने के लिए वैकल्पिक स्वैप व्यवस्था के तहत भूटान को अतिरिक्त 10 करोड़ डॉलर उपलब्ध कराए जाएंगे।

भारत की उभरती धार्मिक अथवा आध्यात्मिक कूटनीति:

भूटान में जोंग धार्मिक मठों और प्रशासनिक केंद्र के रूप में रहे हैं । ऐतिहासिक सिमटोखा जोंग स्थल के प्रांगण में प्रधानमंत्री मोदी ने साइप्रस के पौधे का रोपण भी किया और भूटान को पर्यावरणीय रोल मॉडल के रूप में प्रस्तुत किया जो सच भी है । तिब्बती बौद्ध लामा शब्दरूंग नामग्याल द्वारा 1629 में निर्मित सिमटोखा जोंग इस हिमालयी देश के सबसे पुराने किलों में एक है। यह इमारत बौद्धमठ और प्रशासनिक केंद्र के रूप में काम करती है। नामग्याल को भूटान के एकीकृत करने वाले के तौर पर देखा जाता है। इस स्थान को महत्व देकर भारत ने एक नई प्रकार की स्पिरिचुअल डिप्लोमेसी की शुरुआत की है । पौधे के रोपण के बाद प्रधानमंत्री ने इस ऐतिहासिक इमारत के बौद्ध भिक्षुओं से भी भेंट की । प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 18 अगस्त को भूटान में रॉयल विश्वविद्यालय के छात्रों को संबोधित किया। भारत में भूटानी छात्रों की घटती संख्या को देखते हुए , सॉफ्ट पॉवर पॉलिटिक्स और कल्चरल डिप्लोमेसी के लिहाज से ऐसा किया जाना आवश्यक था । दोनों देशों के नेताओं ने भारत के नेशनल नॉलेज नेटवर्क और भूटान के ड्रक रिसर्च एंड एजुकेशन नेटवर्क के बीच अंतर-संपर्क की ई-वॉल का भी अनावरण किया। प्रधानमंत्री मोदी ने कहा, ‘भूटान की प्रगति में बड़ा सहयोगी बनना भारत के लिए गौरव की बात है। भूटान की पंचवर्षीय योजना में भारत का सहयोग जारी रहेगा ।’ भारतीय प्रधानमंत्री ने कहा कि भारत और भूटान एक दूसरे की परंपराएं समझते हैं। भारत भाग्यशाली है कि वह राजकुमार सिद्धार्थ के बुद्ध बनने की जगह रहा। उनका कहना था कि मैं आज भूटान के भविष्य के साथ हूं। आपकी ऊर्जा महसूस कर सकता हूं। मोदी ने यह भी कहा कि मैं भूटान के इतिहास, वर्तमान या भविष्य को देखता हूं तो मुझे दिखता है कि भारत और भूटान के लोग आपस में काफी परंपराएं साझा करते हैं। भूटान के युवा वैज्ञानिक भारत आकर अपने लिए एक छोटा सैटेलाइट बनाने पर काम करेंगे। प्रधानमंत्री ने कहा, ‘‘आप दुनिया के किसी भी कोने में चले जाएं, अगर आप पूछेंगे कि भूटान के बारे में क्या जानते हो, तो जवाब हमेशा ‘ग्रॉस नेशनल हैप्पीनेस’ का कॉन्सेप्ट मिलेगा। मुझे इस जवाब पर कभी आश्चर्य नहीं होता, क्योंकि भूटान ने खुशी का भाव समझ लिया है। भूटान ने सद्भावना, एकजुटता और करुणा की भावना को समझ लिया है। यही भावना कल उन बच्चों के चेहरे पर थी, जो मेरा स्वागत करने के लिए सड़कों पर खड़े थे। मुझे हमेशा उनकी मुस्कुराहट याद रहेगी।’’

भूटान के सामाजिक आर्थिक नियोजन में भारत का योगदान:

भारत ने भूटान के सामाजिक आर्थिक नियोजन और सशक्तीकरण के लिए बहुत महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है । 1961 में भारत की वित्तीय मदद से भूटान कि पहली पंचवर्षीय योजना की शुरुआत हुई और तब से लेकर आज 2019 में भूटान अपनी 12 वीं पंचवर्षीय योजना का क्रियान्वयन कर रहा है । गौरतलब है कि 28 दिसम्बर , 2018 को नवनिर्वाचित भूटानी प्रधानमंत्री डॉ. लोटे शेरिंग भारत की यात्रा पर आए थे और यहां भारतीय प्रधानमंत्री ने भूटान की बारहवीं पंचवर्षीय योजना के क्रियान्वयन के लिए 4500 करोड़ रुपए की मदद देने की घोषणा की थी , ग्यारहवीं पंचवर्षीय योजना के लिए भी भारत ने इतनी ही धनराशि भूटान को दिया था । भूटान भारत का ऋणी है और ऐसा वह कहता है कि 1971 में भारत के प्रयास से ही उसे संयुक्त राष्ट्र संघ की सदस्यता मिली थी । इसके साथ ही भारत भूटान का अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष में भी प्रतिनिधित्व करता है । गौरतलब है कि भारत भूटान संबंधों की नींव 1949 में मैत्री और सहयोग संधि के जरिए रखी गई थी जिसका आर्टिकल 2 कहता है कि भूटान आंतरिक मामलों में तो स्वतंत्र होगा , लेकिन विदेश मामलों में भारत के मार्गदर्शन , निर्देशन में काम करेगा । 2007 में इस संधि की समीक्षा कर भूटान को स्वतंत्र विदेश नीति भी संचालित करने के लिए भारत ने बढ़ावा दिया । दोनों देशों के बीच 1968 से कूटनीतिक संबंध हैं जो आज भी मजबूत स्थिति में हैं।

भारत की उत्तर पूर्वी भारतीय राज्यों के हितों में भूटान और अन्य देशों को जोड़ने की रणनीति:

नवंबर , 2018 में भूटान के प्रधानमंत्री ने असम में आयोजित ग्लोबल इन्वेस्टर समिट में भाग लिया और परोक्ष रूप से भारत के एक्ट ईस्ट पॉलिसी और लुक ईस्ट पॉलिसी में एक सहायक की भूमिका निभाते हुए गुवाहाटी में अपने कांस्युलेट ऑफिस को खोलने की घोषणा की । भूटान ने भी अपनी पैराडिप्लोमेसी कुशलता का परिचय देते हुए राज्य सरकार में एक्ट ईस्ट डिपार्टमेंट गठित करने की घोषणा की । गौरतलब है कि असम भारत का पहला राज्य बना है जिसने एक्ट ईस्ट डिपार्टमेंट का गठन किया है । यहां यह जानना जरूरी है कि आज उत्तर पूर्वी भारतीय राज्यों को चीन के कुत्सित मंसूबों से बचाने के लिए भारत कुछ देशों को लामबंद करने की रणनीति पर चल रहा है । वर्ष 2014 में सत्ता में आने के बाद प्रधानमंत्री मोदी ने अपनी पहली विदेश यात्रा भूटान को समर्पित की । मोदी ने वहां भूटानी संसद के संयुक्त सत्र को संबोधित किया । इसी दौरे में खोलांगचू पनबिजली परियोजना का उद्घाटन किया गया । भूटान के सुप्रीम कोर्ट के नवीन भवन का भी उद्घाटन प्रधानमंत्री मोदी ने किया । उन्होंने नेहरू वांगचुक स्कॉलरशिप की राशि को प्रति वर्ष के लिए बढ़ाकर 2 करोड़ करने की घोषणा की । भूटान के सभी 20 जिलों को भारत ने डिजिटल और शैक्षिक स्तर पर मजबूती देने के लिए ई लाइब्रेरी प्रोजेक्ट के गठन की घोषणा 2014 में की थी । इसके बाद से भारत सरकार और राज्य सरकारों ने भूटान को अपने साथ संलग्न करने की नीति पर बल दिया । भूटान के प्रधानमंत्री ने 2015 में वाइब्रेंट गुजरात समिट में भाग लिया , बोधगया भ्रमण किया गया , भूटान के प्रधानमंत्री ने 2016 में दूसरे बंगाल ग्लोबल बिजनेस समिट में भाग लिया । इसी वर्ष भूटानी प्रधानमंत्री ने बिम्स्टेक ब्रिक्स आउटरीच समिट में भी भाग लिया । वर्ष 2017 में नमामि ब्रह्मपुत्र रिवर फेस्टिवल में गुवाहाटी में उन्हें गेस्ट ऑफ आनर दिया गया । दूसरे इंडिया आइडियाज कॉन्क्लेव , गोवा में भी प्रधानमंत्री शेरिंग टाबगे को मुख्य अतिथि के रूप में बुलाया गया था। इन सब बातों से एक ही बात स्पष्ट होती है कि उत्तर भारतीय राज्यों के हितों में बौद्ध धर्म प्रधान देशों को ढाल बनाया जाय । 2016 में पश्चिम बंगाल के मुख्यमंत्री के शपथ ग्रहण समारोह में भी भूटानी प्रधानमंत्री ने शिरकत किया था । भूटान इस रणनीति की अहम कड़ी बन रहा है , इसके साथ ही भारत ने जापान के साथ एक्ट ईस्ट फोरम का गठन 2017 में किया है जिसकी अक्टूबर , 2018 में दूसरी बैठक आयोजित हुई है । इस फोरम के जरिए जापान भारत के उत्तर पूर्वी राज्यों में अवसंरचनात्मक विकास के लिए परियोजनाएं चलाएगा और उन्हें वित्त पोषित भी करेगा । इस प्रकार भूटान , जापान , लुक ईस्ट पॉलिसी के तहत आसियान के देशों को उत्तर पूर्वी भारतीय राज्यों के विकास के काम में लगाने की रणनीति पर भारत काम कर रहा है । इसके साथ ही असम ने कहा है कि वह भूटान के तर्ज पर अपने सकल घरेलू उत्पाद में राज्य के नागरिकों की प्रसन्नता की गणना करने पर भी विचार कर रहा है । भूटान के साथ ही जिन देशों को उत्तर पूर्वी भारतीय राज्यों से जोड़ने का काम भारत ने किया है , वह भारत की धार्मिक और आध्यात्मिक डिप्लोमेसी का प्रमाण है , ये सभी देश बौद्ध धर्म को मानने वाले हैं , ये साझी सांस्कृतिक विरासत के भी उत्तराधिकारी हैं । तिब्बत के धर्मगुरु दलाई लामा को भारत ने पहले ही राजनीतिक शरण दे रखा है । बांग्लादेश को भी सिलीगुड़ी गलियारे यानि चिकेन्स नेक के जरिए उत्तर पूर्वी भारत से आबद्ध करने की कोशिश हाल में की गई है । त्रिपुरा में सबरूम नामक जगह पर फेनी नदी पर बांध निर्माण और उत्तर पूर्वी भारत को चटगांव पोर्ट से जोड़ने कि योजना भी बनाई गई है । इसी कड़ी में भारत बांग्लादेश के बीच अखोरा अगरतला रेल लिंक भी बनाया जाना शुरू कर दिया गया है ।

भारत भूटान के ऊर्जा संबंध और आर्थिक व्यापार:

भारत और भूटान के संबंधों का सबसे मजबूत आधार पनबिजली सहयोग रहा है । भारत के वित्तीय मदद ही भूटान की शुरुआती तीन पनबिजली परियोजनाएं कुरीछू ( 60 मेगावाट), चूखा ( 336 मेगावाट), ताला ( 170 मेगावाट) आज कार्यशील हो चुकी हैं और इनसे उत्पादित पनबिजली भारत खरीदता है । 2009 में दोनों देशों ने एक प्रोटोकॉल पर हस्ताक्षर किया जिसमें यह सहमति बनी कि भारत 2020 तक भूटान को 10 हजार मेगावाट बिजली का उत्पादन कराने में सहयोग कर उससे अधिशेष बिजली खरीदेगा । इसके बाद भारत ने भूटान के पुनातसंगछू ( 1200 मेगावाट) , वांगछु ( 570 मेगावाट) खोलांगचू परियोजना ( 600 मेगावाट) और हाल में मांगड़ेचू ( 720 मेगावाट) पनबिजली परियोजनाओं में मदद करने का काम किया है । भारतीय प्रधानमंत्री और भूटानी प्रधानमंत्री ने मिलकर मांगदेचू पनबिजली संयत्र और उसकी परियोजना का उद्घाटन किया । हाइड्रोपॉवर संबंधों को मजबूती देने में इसे एक महत्वाकांक्षी परियोजना माना गया है । इस परियोजना से एक तो भूटान की ऊर्जा जरूरतें पूरी होंगी और इससे उत्पादित सरप्लस ऊर्जा भारत को निर्यात कर दी जाएगी । धारणीय और सतत द्विपक्षीय संबंधों का इससे बेहतर उदाहरण और क्या होगा । भारत भूटान के हाइड्रोपॉवर संबंधों के पांच दशक पूरा होने के उपलक्ष्य में डाक टिकट भी जारी किया गया । 17 अगस्त , 2019 की भूटान यात्रा में दोनों देशों के बीच संकोश बहुउद्देशीय पनबिजली परियोजना चलाने पर सहमति बनी है । गौरतलब है कि भारत भूटान का सबसे बड़ा ट्रेड और डेवलपमेंट पार्टनर है । वर्तमान में दोनों देशों के बीच लगभग 9000 करोड़ रूपए का द्विपक्षीय व्यापार है । भूटान अपने कुल आयात का 80 प्रतिशत से अधिक भारत से करता है और भूटान के कुल निर्यात का 85 प्रतिशत से अधिक भारत को किया जाता है । भूटान की तीन चौथाई बिजली भारत को निर्यात की जाती है।

भूटान में भारत के सामरिक हित:

भूटान भारत के सामरिक हितों की दृष्टि से भी महत्वपूर्ण है । भूटान सार्क का सदस्य है और भारत के पक्ष में पाकिस्तान के खिलाफ वह सार्क समिट का बहिष्कार भी कर चुका है । डोकलाम जैसा प्रकरण भूटान का भारत के लिए महत्व स्पष्ट करता है । डोकलाम पठार तिब्बत की चुंबी घाटी , भूटान की हा घाटी और सिक्किम के त्रिकोणीय बिंदु पर स्थित है जहां चीन ने एक सड़क निर्माण का कार्य शुरू किया था । भारत और भूटान ने अपने साझे सामरिक हितों के आधार पर मिलकर चीन के इस कृत्य का पुरजोर विरोध किया था । चीन और भूटान के बीच इसके अलावा जकारलूंग और पारुमलुंग जैसे क्षेत्र को लेकर भी विवाद रहे हैं । भारत का भूटान के साथ बिम्सटेक के जरिए भी क्षेत्रीय सहयोग का संबंध हैं । डोकलाम इलाके की सामरिक स्थिति को लेकर भी चीन ने क्षेत्रीय असंतुलन पैदा करने की कोशिश की है । 1988 और 1998 में भूटान चीन के बीच डोकलाम को लेकर समझौता हुआ था कि आपसी सहमति और विचार विमर्श से ही इससे जुड़े किसी भी मामले को सुलझाया जाएगा । ऐसा ही समझौता भारत चीन में 2012 में हुआ था कि डोकलाम के किसी प्रश्न पर फैसला भारत भूटान और चीन सर्वसम्मति बना कर ही करेंगे । लेकिन चीन ने इन सभी समझौतों का उल्लंघन कर डोकलाम में भूटान और भारत की क्षेत्रीय अखंडता को ख़तरे में डालने की कोशिश की और अभी भी इस मुद्दे पर उसके मंसूबे बहुत साफ नहीं हैं । डोकलाम इलाका सामरिक रूप से वहां है जहां चीन और भारत के उत्तर-पूर्व में मौजूद सिक्किम और भूटान की सीमाएं मिलती हैं। भूटान और चीन दोनों इस इलाके पर अपना दावा करते हैं और भारत भूटान के दावे का समर्थन करता है। यह वही इलाका है जो भारत को सेवन सिस्टर्स नाम से मशहूर उत्तर पूर्वी राज्यों से जोड़ता है और सामरिक रूप से बेहद महत्वपूर्ण है। भारत भूटान के साथ 699 किलोमीटर लंबी सीमा साझा करता है।

भारत भूटान एशियाई विकास बैंक के क्षेत्रीय कार्यक्रम साउथ एशियन सब रीजनल इकनॉमिक कोऑपरेशन प्रोग्राम यानि सासेक कार्यक्रम से भी जुड़े रहे हैं । भारत की पड़ोसी प्रथम की नीति की सबसे मजबूत कड़ी इस समय भूटान ही है । समय और देशकाल के साथ भूटान ने अपनी भारतीय निष्ठा को व्यक्त भी किया है । तिब्बत , नेपाल , चीन को एक साथ भारतीय हितों के विपरीत काम ना करने देने में भूटान किसी ना किसी रूप में अपनी प्रभावी भूमिका निभा सकता है । भूटान और भारत के संबंधों को लेकर चीन काफी असहज रहा है। भारत भूटान के बीच मजबूत आर्थिक , सांस्कृतिक , सामरिक , राजनयिक संबंध से चीन कुपित रहा है।

दक्षिण एशिया में क्षेत्रीय एकीकरण और भारत भूटान:

2001 में भारत ने भूटान, नेपाल, बांग्लादेश व म्यांमार को जोड़ने के लिए सासेक (साउथ एशियन सब रीजनल इकोनॉमिक को-ऑपरेशन) कॉरिडोर शुरू किया था। इंफाल से मोरेह (म्यांमार) को जोड़ने वाले इस मार्ग को पूर्वी एशियाई बाजार के लिए भारत का प्रवेश द्वार माना जा रहा है। भारत की योजना इस मार्ग के जरिये पूर्वी एशियाई बाजारों को पूर्वोत्तर राज्यों को जोड़ने की है। इंफाल-मोरेह मार्ग के निर्माण के साथ ही बैंकाक तक पहुंचने के लिए भारत को एक वैकल्पिक मार्ग उपलब्ध हो जाएगा। 2014 में मालदीव और श्रीलंका भी इसके सदस्य बन गए। गौरतलब है कि वर्ष 2001 में सासेक की शुरुआत एशियाई डेवलपमेंट बैंक के तहत हुई थी। एडीबी ही सासेक के सचिवालय के रूप में काम करता है । यह एक प्रोजेक्ट आधारित पार्टनरशिप के रूप में लाया गया । एडीबी का कहना है कि अक्टूबर 2018 तक सासेक देेेशों ने 11 बिलियन डॉलर की लागत से 50 क्षेत्रीय परियोजनाओं का क्रियान्वयन किया है जो ऊर्जा , आर्थिक कॉरिडोर विकास , परिवहन , व्यापार सुगमता , सूचना और प्रौद्योगिकी से संबंधित हैं । वर्ष 2016 में सासेक देशों ने सासेक ऑपरेशनल प्लान 2016-2025 को मंजूरी दी जो कि इन देशों को क्षेत्रीय विकास के लिए 10 साल का एक सामरिक रोडमैप है । यहां यह भी जानना जरूरी है कि बांग्लादेश भूटान नेपाल भारत - मोटर व्हीकल एग्रीमेंट एडीबी के सासेक प्रोग्राम का ही हिस्सा है । इस प्रकार क्षेत्रीय अंतरसंपर्क को बढ़ावा देने का यह महत्वपूर्ण उपकरण है । चीन के महत्वाकांक्षी ओबोर परियोजना के जवाब में भारत के नेतृत्व में यह परियोजना कारगर साबित हो सकती है।

इस प्रकार कुल मिलाकर कहा जा सकता है कि भूटान भारत के चीन के संदर्भ में सामरिक हितों , दक्षिण एशिया में ऊर्जा कूटनीति , उत्तर पूर्वी भारत की सुरक्षा , हरित अर्थव्यवस्था के विकास और भूटान के बौद्ध छात्रों के प्रशिक्षण के जरिए अपनी विदेश नीति में प्रभावी बढ़त लेना चाहता है ताकि पड़ोसी प्रथम की नीति सफल हो और भारत अपने मकसद में कामयाब हो।