(इनफोकस - InFocus) क्यों बदला आवश्यक वस्तु अधिनियम? (Why did Essential Commodities Act Change?)


(इनफोकस - InFocus) क्यों बदला आवश्यक वस्तु अधिनियम? (Why did Essential Commodities Act Change?)



सुर्ख़ियों में क्यों?

हाल ही में, संसद ने आवश्यक वस्तु (संशोधन) विधेयक को पारित कर दिया है। इसका मकसद अनाज, दाल, तिलहन, खाद्य तेल, प्याज और आलू को आवश्यक वस्तुओं की सूची से हटाना है.

क्या है आवश्यक वस्तु अधिनियम, 1955?

आवश्यक वस्तुओं या उत्पादों की आपूर्ति सुनिश्चित करने और उन्हें जमाखोरी एवं कालाबाज़ारी से बचाने के लिये सरकार ने साल 1955 में आवश्यक वस्तु अधिनियम बनाया था।

  • आवश्यक वस्तु अधिनियम, 1955 में आवश्यक वस्तुओं की कोई स्पष्ट परिभाषा नहीं दी गई है। इस कानून की धारा 2 (A) में कहा गया है कि आवश्यक वस्तु का अर्थ इसी अधिनियम की अनुसूची में दिए गए वस्तुओं से है।
  • इस कानून में ऐसा प्रावधान है कि सरकार जब चाहे इसमें आवश्यक वस्तु के रूप में किसी एक खास वस्तु को जोड़ सकती है अथवा हटा सकती है।
  • यदि केंद्र सरकार को लगता है कि सार्वजनिक हित में किसी वस्तु को आवश्यक वस्तु घोषित करना जरूरी है तो वह राज्य सरकारों की सहमति से इस संबंध में अधिसूचना जारी कर सकती है।
  • किसी वस्तु को ‘आवश्यक वस्तु’ की सूची में शामिल करने से सरकार उस वस्तु के उत्पादन, आपूर्ति और वितरण को नियंत्रित कर सकती है।
  • साथ ही, सरकार उस वस्तु के संबंध में एक स्टॉक सीमा भी तय कर सकती है।

पुराने कानून में बदलाव की जरूरत क्यों पड़ी?

गौरतलब है कि सरकार ने आवश्यक वस्तु अधिनियम, 1955 को ऐसे समय में बनाया था जब पूरा देश खाद्यान्न कमी की संकट से जूझ रहा था। उस वक्त भारत ज्यादातर अपनी जरूरतों को पूरा करने के
लिये आयात और अन्य देशों से मिलने वाली सहायता पर निर्भर था। इसलिए उस वक्त खाद्य पदार्थों की जमाखोरी और कालाबाज़ारी पर लगाम लगाने के मकसद से साल 1955 में आवश्यक वस्तु अधिनियम लाया गया। लेकिन अब हालात बदल चुके हैं और देश खाद्यान्न के संकट से उबर चुका है। इसलिये इन बदली हुई परिस्थितियों में इस कानून में बदलाव भी जरूरी है।

इस विधेयक के फायदे क्या है?

यह विधेयक 5 जून 2020 को जारी किये गए अध्यादेश की जगह लेगा.

  • इसका मकसद निजी निवेशकों के व्यावसायिक कामों को सरल बनाना है.
  • दरअसल इन निवेशकों की अक्सर शिकायत रहती है कि उनके व्यावसायिक कामों में विनियामक हस्तक्षेप ज्यादा होता है।
  • संशोधन विधेयक में यह प्रावधान किया गया है कि युद्ध, अकाल, असाधारण मूल्य वृद्धि और प्राकृतिक आपदा जैसी स्थितियों में इन कृषि‍ उत्पादों की कीमतों को नियंत्रित किया जा सके।
  • भारत में ज्यादातर कृषि वस्तुओं का उत्पादन व्यापक पैमाने पर होता है. लेकिन तमाम वजहों के चलते यह उत्पाद बिना किसी इस्तेमाल के बर्बाद हो जाते हैं. अगर मौजूदा विधेयक कानून बनता है तो इस प्रकार की बर्बादी को रोका जा सकता है।
  • इस संशोधन के हो जाने के बाद उम्मीद है कि कृषि क्षेत्र में निवेश बढ़ेगा। इससे किसान की आय दोगुनी करने और ईज़ ऑफ डूइंग बिज़नेस को बढ़ावा देने में भी मदद मिलेगी।

क्या दिक्कत है नए संशोधनों के साथ?

इस कानून में नए संशोधन की वजह से किसानों की आय बढ़ेगी क्योंकि वे अपनी उपज कहीं भी बेचने को स्वतंत्र होंगे। उन्हें अपनी उपज स्थानीय मंडी में बेचने की अनिवार्यता नहीं होगी। अब बड़ी कंपनियां
गांवों में सीधे किसानों से उपज खरीदने के लिए जाएंगी।

लेकिन अगर बड़े पैमाने पर थोक खरीद या जमाखोरी के कारण जरूरी सामानों के दाम बढ़ते हैं, तो इसका दो प्रतिकूल प्रभाव भी हो सकता है। पहला ग्रामीण क्षेत्रों में महंगाई दर बढ़ेगी। परिणामस्वरूप गरीबी बढ़ेगी। दूसरा, सरकार के लिए राशन की दुकानों के लिए खरीद की लागत बढ़ेगी।