(इनफोकस - InFocus) फ़्रांस की धर्मनिरपेक्षता (Secularism of France)


(इनफोकस - InFocus) फ़्रांस की धर्मनिरपेक्षता (Secularism of France)


सुर्ख़ियों में क्यों?

पिछले दिनों पेरिस के बाहरी इलाक़े में कुछ लोगों ने इतिहास पढ़ाने वाले एक शिक्षक की ह्त्या कर दी थी। इस घटना को लेकर फ़्रांस के राष्ट्रपति इमानुएल मैक्रों ने पैग़ंबर मोहम्मद के कार्टून दिखाने के इस शिक्षक के फ़ैसले का समर्थन किया था। सैमुएल पैटी नाम के इस शिक्षक की हत्या के बाद फ़्रांस में बड़े पैमाने पर विरोध प्रदर्शन शुरू हो गया था। विरोध प्रदर्शनों को देखते हुए फ्रांसीसी सरकार ने इस्लामिक कट्टरपंथी संगठनों के ख़िलाफ़ कार्रवाई तेज कर दी। लेकिन इस्लाम पर मैक्रों के बयान को लेकर कई मुस्लिम देश नाराज़ हैं और कई देशों में फ़्रांस के ख़िलाफ़ विरोध प्रदर्शन भी हुए हैं। इस पूरी घटना के बाद 'लैसिते' शब्द फ़्रांस में काफी चर्चा में है।

लैसिते क्या है?

'लैसिते' फ़्रांसीसी शब्द laity से निकला है, जिसका अर्थ है- आम आदमी या ऐसा शख़्स, जो पादरी नहीं है। लैसिते सार्वजनिक मामलों में फ़्रांस की धर्मनिरपेक्षता का सिद्धांत है, जिसका उद्देश्य धर्म से मुक्त समाज को बढ़ावा देना है।

  • इस सोच का विकास फ़्रांसीसी क्रांति के दौरान शुरू हो गया था।
  • इस विचारधारा को अमलीजामा पहनाने के लिए साल 1905 में एक क़ानून लाया गया। इस क़ानून में धर्म और राज्य को अलग-अलग कर दिया गया।
  • आसान भाषा में कहें तो ये विचार संगठित धर्म के प्रभाव से नागरिकों और सार्वजनिक संस्थानों की स्वतंत्रता को दर्शाता है।
  • दरअसल सदियों तक यूरोप के दूसरे देशों की तरह फ़्रांस में भी रोमन कैथोलिक चर्च का बोलबाला रहा है। शासन में चर्च के दबदबे को कम करने के लिए धर्म से मुक्त समाज की अवधारणा विकसित होनी शुरू हुई।
  • इसी क्रम में, 20वीं शताब्दी के शुरू में लैसिते एक क्रांतिकारी सोच बनकर उभरी, लेकिन इसे राष्ट्रीय स्तर पर लोकप्रिय बनाने में दशकों लग गए।
  • इसे लोगों तक पहुँचाने के लिए राज्य ने एक संस्था बनाई, जिसे फ़्रांसीसी भाषा में 'ऑब्ज़र्वेटॉइर डे लैसिते' या 'धर्मनिरपेक्षता की संस्था' कहा जाता है।
  • इस संस्था की वेबसाइट पर लैसिते की परिभाषा में कहा गया है कि 'लैसिते' अंतरात्मा की स्वतंत्रता की गारंटी देता है.

फ्रांस में लैसिते को मज़बूत बनाने की मांग क्यों उठ रही है?

लैसिते को और भी दृढ़ बनाने की कोशिश का मुख्य कारण फ़्रांस और यूरोप में कट्टर इस्लाम का पनपना है। मैड्रिड या लंदन में आतंकवादी हमले हों या फिर डच फ़िल्म निर्माता थियो वैन गॉग की हत्या या हाल ही में पैग़ंबर मोहम्मद के कार्टून को नापसंद करने पर हिंसा और विरोध। इन सभी घटनाओं को फ़्रांस के धर्मनिरपेक्ष मूल्यों पर हमले की तरह से देखा जा रहा है। इसके अलावा, जब फ्रांस में सार्वजनिक जगहों पर हिजाब और बुर्क़े पर प्रतिबंध लगाए गए, तो मुसलमानों ने इसे अपने धर्म पर अंकुश की तरह से देखा, जिससे मामला और भी उलझ गया।

क्या 'लैसिते' अब कमज़ोर पड़ रहा है?

अगर हम फ्रांस की मौजूदा राजनीतिक तानेबाने को समझें तो एक तरफ़ यहाँ इस्लामी कट्टरपंथ में उछाल आया है, तो दूसरी तरफ़ गोरी नस्ल के फ़्रांसीसी समाज में इस्लाम विरोधी विचार बढ़ा है।

  • यानी जिस मजहबी कट्टरपंथ के ख़िलाफ़ लैसिते को आगे बढ़ाया गया है, वो कट्टरपंथ दोनों तरफ बढ़ता हुआ नज़र आ रहा है।
  • ऐसे में, न केवल राज्य बल्कि बौद्धिक वर्ग की भूमिका काफी अहम हो जाती है।
  • सहिष्णुता एक ऐसी नीति है, जो एक बहुसांस्कृतिक समाज के साथ वास्तव में तालमेल बिठाती है।

भारतीय धर्मनिरपेक्षता और यूरोपीय धर्मनिरपेक्षता में फ़र्क़

ग़ौरतलब है कि भारत की प्रस्तावना में 42वें संविधान संशोधन के बाद पंथनिरपेक्ष शब्द जोड़ा गया, लेकिन धर्मनिरपेक्ष शब्द का प्रयोग भारतीय संविधान के किसी भाग में नहीं किया गया है.

  • वैसे संविधान में कई ऐसे अनुच्छेद मौजूद हैं जो भारत को एक धर्मनिरपेक्ष राज्य साबित करते हैं मसलन अनुच्छेद 25 से 28 के बीच वर्णित धार्मिक स्वतंत्रता का अधिकार।
  • जहाँ पश्चिम की धर्मनिरपेक्ष अवधारणा पूरी तरह से अलगाववादी नकारात्मक है यानी पश्चिम के मुताबिक राज्य धर्म से पूरी तरह अलग है वहीँ भारत की धर्मरिपेक्षता समग्र रूप से सभी धर्मों का सम्मान करने की संवैधानिक मान्यता पर आधारित है।
  • इसके अलावा, भारतीय धर्मनिरपेक्षता धर्म और राज्य के बीच संबंध विच्छेद पर बल नहीं देती है बल्कि अंतर-धार्मिक समानता पर जोर देती है।
  • इसका मतलब भारतीय धर्मनिरपेक्षता धर्म से एक सैद्धांतिक दूरी की बात करता है।