(इनफोकस - InFocus) आखिर धर्मांतरण पर कानून क्यों? (Law Against Proselytization)


(इनफोकस - InFocus) आखिर धर्मांतरण पर कानून क्यों? (Law Against Proselytization)


सुर्ख़ियों में क्यों?

अंतरधार्मिक विवाह को लेकर जारी घमासान के बीच, हाल ही में, उत्तर प्रदेश सरकार ने 'उत्तर प्रदेश विधि विरुद्ध धर्म संपरिवर्तन प्रतिषेध अध्यादेश, 2020' को मंज़ूरी दे दी।

  • सरकार के मुताबिक़, शादी के लिए जबरन धर्मांतरण के वाक़ये बढ़ रहे थे। ऐसे में, यह क़ानून ज़रूरी था। 100 से ज़्यादा ऐसे मामले सामने आए हैं, जिसमें छल से या जबरन धर्मांतरण कराए गए हैं।
  • गौरतलब है कि इसी तरह के क़ानून बनाने की बात मध्य-प्रदेश और हरियाणा राज्य की सरकारें भी कर चुकी हैं।

अध्यादेश के प्रमुख बिंदु

शादी के लिए धर्मांतरण को इस क़ानून में अमान्य क़रार दिया गया है। राज्यपाल की सहमति के बाद यह अध्यादेश लागू हो जाएगा।

  • इस क़ानून के मुताबिक़ उत्तर प्रदेश में 'जबरन धर्मांतरण' दंडनीय होगा। इसमें एक साल से 10 साल तक जेल हो सकती है और 15 हज़ार से 50 हज़ार रुपए तक का जुर्माना भी हो सकता है।
  • अगर 'अवैध धर्मांतरण' किसी नाबालिग़ या अनुसूचित जाति-जनजाति की महिलाओं के साथ होता है तो तीन से 10 साल की क़ैद और 25 हज़ार रुपए का जुर्माना भरना पड़ेगा।
  • अगर सामूहिक धर्मांतरण होता है तो सज़ा में तीन से 10 साल की जेल होगी और इसमें शामिल संगठन पर 50 हज़ार रुपये का जुर्माना लगेगा। साथ ही, उस संगठन का लाइसेंस रद्द कर दिया जाएगा।
  • अगर धर्मांतरण जबरन नहीं है, छल से नहीं किया गया है और यह शादी के लिए नहीं है, तो इसे साबित करने की ज़िम्मेदारी धर्मांतरण कराने और धर्मांतरित होने वाले की होगी।
  • अगर कोई शादी के लिए अपनी इच्छा से धर्म बदलना चाहता/चाहती है तो दो महीने पहले संबंधित ज़िले के डीएम के पास नोटिस देना होगा। ऐसा नहीं करने पर 10 हज़ार रुपये का जुर्माना लगेगा और छह से तीन साल की क़ैद भी हो सकती है।

इस बारे में इलाहाबाद हाईकोर्ट का हालिया फैसला

अदालत ने कहा है कि धर्म की परवाह न करते हुए अपनी पसंद के साथी के साथ जीवन बिताने का अधिकार जीवन के अधिकार और निजी स्वतंत्रता के अधिकार में ही निहित है।

  • अदालत ने स्पष्ट रूप से कहा कि अगर दो बालिग़ व्यक्ति अपनी मर्ज़ी से एक दूसरे के साथ रह रहे हैं तो इसमें किसी दूसरे व्यक्ति, परिवार और यहां तक कि सरकार को भी आपत्ति करने का अधिकार नहीं है।
  • यह फ़ैसला सुनाते वक़्त अदालत ने अपने उन पिछले फ़ैसलों को भी ग़लत बताया जिनमें कहा गया था कि विवाह के लिए धर्मांतरण प्रतिबंधित है और ऐसे विवाह अवैध हैं।

इस बारे में संविधान क्या कहता है?

भारत एक पंथनिरपेक्ष राष्ट्र है। यहाँ पंथनिरपेक्षता का अर्थ है कि भारत सभी धर्मों की समान रूप से रक्षा करता है और किसी भी धर्म को राज्य धर्म के रूप में स्वीकार नहीं करता।

  • भारतीय संविधान का अनुच्छेद 25-28, हमें धार्मिक स्वतंत्रता का अधिकार प्रदान करता है। इस संदर्भ में भारत में धर्मांतरण के अधिकार को देखा जाना चाहिये।
  • भारत के कई हिस्सों से धर्मांतरण के बारे में मिलने वाली सूचनाएँ आम हैं, लेकिन बल, धमकी और प्रलोभन के आरोप इसे संवेदनशील बनाते हैं। इस संबंध में धर्मांतरण विरोधी कानूनों को लाया जाता है।
  • हालांकि इस तरह के कानून विवादास्पद रहे हैं क्योंकि सांप्रदायिक ताकतों द्वारा इनका दुरुपयोग किये जाने का खतरा रहता है।

निष्कर्ष

कई मामलों में सुप्रीम कोर्ट ने साफ़ कहा है कि अनुच्छेद 25 अपने धर्म में किसी व्यक्ति का धर्म परिवर्तित कराने के लिये नहीं है, बल्कि यह अपने धर्म का प्रचार-प्रचार करने का अधिकार प्रदान करता है।

  • इस तरह, अगर हम संविधान की मूल भावना को समझें तो जबरन धर्मांतरण प्रतिबंधित है न कि स्वैच्छिक। इसके लिए ऐसे क़ानून होने चाहिए जिससे धार्मिक कट्टरपंथी इसका अनुचित लाभ न ले पाएं।
  • साथ ही, राज्य को भी ये समझना होगा कि राष्ट्र की एकता और अखंडता बचाये रखना उनका धर्म है। ऐसे में, संकीर्ण राजनीतिक उद्देश्यों के लिए इन क़ानूनों का दुरुपयोग नहीं होना चाहिए।