(इनफोकस - InFocus) ई-सिम (e-SIM)


(इनफोकस - InFocus) ई-सिम (e-SIM)



सुर्ख़ियों में क्यों?

हाल ही में, हरियाणा पुलिस ने ई-सिम फ़्रॉड केस में पांच लोगों को गिरफ्तार किया है. पुलिस का कहना है कि इस फ़िशिंग रैकेट ने बहुराज्यीय बैंक धोखाधड़ी किया है, जिसमें इन्होंने क़रीब 300 बैंक खातों को चपत लगाई है। मामले का खुलासा होने के बाद, एक बार फिर से इंटरनेट और साइबर सुरक्षा तंत्र पर सवाल उठना लाज़मी है।

क्या होता है ‘ई-सिम’?

ई-सिम मोबाइल वाले सिम (SIM) का ही एक इलेक्ट्रॉनिक रूप है. SIM का पूरा नाम होता है सब्सक्राइबर आइडेंटिटी मॉड्यूल (Subscriber’s identity module).

  • SIM के अंदर आपकी वो जानकारी होती है, जो टेलीकॉम ऑपरेटर को आपकी पहचान बताती है.
  • उसके बाद ही ऑपरेटर आपको नेटवर्क उपयोग करने की अनुमति देता है. इस तरह आप अपने फोन से कॉल या इंटरनेट का इस्तेमाल कर पाते हैं.
  • ‘ई-सिम’ का फुल फॉर्म ‘एंबेडेड सब्सक्राइबर आइडेंटिटी मॉड्यूल’ (Embedded Subscriber Identity Module) है।
  • ये एक ऐसा सिस्टम होता है जिसमें फिजिकल सिम कार्ड डालने की आवश्यकता नहीं होती. इसमें बस एक चिप लगता है, जिसे टेलीकॉम नेटवर्क पर रजिस्टर करवा दिया जाता है. और आप सामान्य सिम की तरह ही फोन कॉल या इंटरनेट का इस्तेमाल कर सकते हैं।
  • परंपरागत सिम से अलग, ई-सिम आपके फोन में अनावश्यक जगह नहीं घेरता.
  • इसके अलावा, इसका इस्तेमाल स्मार्टवाच जैसी छोटी मशीनों में भी किया जा सकता है।

ई-सिम के इस्तेमाल से बैंक धोखाधड़ी कैसे ?

ई-सिम के ज़रिये धोखाधड़ी के लिए अपराधी सबसे पहले ढेर सारे मोबाइल नंबरों को हासिल करते हैं. फिर, इन नम्बरों के जरिए वे बैंक खातों में लॉग-इन की कोशिश करते हैं।

  • इस कोशिश में, संयोगवश अगर किसी नंबर पर बैंक द्वारा OTP भेजने का संकेत मिलता है, तो अपराधी उस नंबर पर ग्राहक सेवा अधिकारी होने का बहाना करते हुए फोन करते हैं.
  • वे पीड़ित व्यक्ति से सिमकार्ड अपग्रेड करने या उसकी पहचान से जुड़ी जानकारी जानने की कोशिश करते हैं।
  • इसके बाद, अपराधी पीड़ित को एक इ-मेल भेजते हैं, जिसे आधिकारिक ग्राहक सेवा नंबर पर भेजना होता है।
  • दरअसल, यह पीड़ित व्यक्ति के फोन नंबर से अपनी Email-id जोड़ने की अपराधियों की एक चाल होती है.
  • इसके जरिए अपराधी पीड़ित व्यक्ति को उसके सिम को ‘ई-सिम’ में बदलने के लिये आधिकारिक आवेदन डलवा देता है।
  • यह प्रक्रिया पूरी होने के बाद अपराधी न केवल पीड़ित व्यक्ति के नंबर से जुड़े बैंक खातों तक पहुंच जाते हैं, बल्कि सिम से संबंधित दूसरी सभी सेवाओं तक उनकी पहुंच हो जाती है।
  • आरबीआई द्वारा जारी एक आंकड़े के मुताबिक, वित्तीय वर्ष 2019-20 में भारतीय बैंकों द्वारा इंटरनेट और क्रेडिट या डेबिट कार्ड धोखाधड़ी से जुड़े कुल 2,678 मामले दर्ज किये गए थे। ये मामले कुल 195 करोड़ रुपए से जुड़े थे.

बैंक धोखाधड़ी पर लगाम के प्रयास

इस समस्या से निपटने के लिए रिजर्व बैंक द्वारा तमाम डेटाबेस और सूचना प्रणालियों को जोड़ने की कोशिश की जा रही है।

  • साथ ही, RBI द्वारा ‘इलेक्ट्रॉनिक बैंकिंग जागरूकता और प्रशिक्षण’ या ‘ई-बात’ यानी Electronic Banking Awareness And Training जैसे कार्यक्रमों के जरिए लोगों को जागरूक किया जा रहा है।
  • इसके अलावा, देश के केंद्रीय बैंक द्वारा डिजिटल भुगतान प्रणाली के सुरक्षित उपयोग, महत्वपूर्ण निजी जानकारी मसलन पिन, ओटीपी, पासवर्ड, आदि को दूसरों से छिपाकर रखने के लिए दूसरे कई जागरूकता अभियान चलाए जा रहे हैं।

आगे क्या किया जाना चाहिए?

पुलिस के मुताबिक, बैंकों और टेलीकॉम कंपनियों की ओर से तत्परता में कमी के चलते ऐसे मामले बढ़ रहे हैं। इसलिए इन बैंकों और टेलीकॉम कंपनियों को जन जागरूकता के लिए और अधिक प्रयास करना चाहिए.

  • विशेषज्ञों का कहना है कि इस समस्या से निपटने का सबसे बड़ा उपाय है ग्राहक जागरूकता. लोगों को किसी संदेहप्रद लिंक पर क्लिक करने और अपनी निजी जानकारी को दूसरों से साझा करने से बचना चाहिये।
  • सरकार की भी ज़िम्मेदारी बनती है कि बैंकिंग क्षेत्र में टेक्नोलॉजी के इस्तेमाल को बढ़ावा देने के साथ-साथ वह इससे जुड़ी सुरक्षा तंत्र को मज़बूत करे।