(इनफोकस - InFocus) न्यायालय की अवमानना (Contempt of Court)


(इनफोकस - InFocus) न्यायालय की अवमानना (Contempt of Court)


सुर्ख़ियों में क्यों?

  • हाल ही में, पत्रकार अर्नब गोस्वामी को पत्र लिखने और धमकाने को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने महाराष्ट्र विधानसभा के सचिव को अवमानना नोटिस जारी किया है। अदालत ने कहा कि अगर किसी नागरिक को शीर्ष अदालत आने से रोका जाय तो यह अनुच्छेद 32 का उल्लंघन होगा। इस तरह यह न्यायिक प्रशासन में गंभीर हस्तक्षेप है।
  • संविधान का अनुच्छेद 32 मौलिक अधिकारों को लागू कराने से संबंधित है। इस अनुच्छेद के मुताबिक़, अगर किसी व्यक्ति के मौलिक अधिकार का उल्लंघन होता है, तो वह व्यक्ति सीधे सर्वाेच्च न्यायालय का दरवाजा खटखटा सकता है।
  • इस अनुच्छेद के अंतर्गत उच्चतम न्यायालय को मूल अधिकारों की रक्षा करने के लिए बंदी प्रत्यक्षीकरण,परमादेश, प्रतिषेध, उत्प्रेषण और अधिकार पृच्छा रिट जारी करने की शक्तियां प्राप्त है।
  • बता दें कि महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री उद्धव ठाकरे की आलोचना को लेकर महाराष्ट्र विधानसभा के सचिव ने अर्नब गोस्वामी के खिलाफ विशेषाधिकार नोटिस जारी किया था।

अवमानना का क़ानून वज़ूद में कैसे आया?

  • साल 1949 की 27 मई को पहले इसे अनुच्छेद 108 के रूप में संविधान सभा में पेश किया गया। सहमति बनने के बाद इसे अनुच्छेद 129 के रूप में स्वीकार कर लिया गया।
  • इस अनुच्छेद के दो प्रमुख बिंदु थे- पहला कि सुप्रीम कोर्ट कहाँ स्थित होगा और दूसरा प्रमुख बिंदु था - अवमानना।
  • चर्चा के दौरान कुछ सदस्यों का तर्क था कि अवमाना का मामला अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के लिए रुकावट का काम करेगा। इन सदस्यों का कहना था कि ये मान लेना कि जज इस क़ानून का इस्तेमाल विवेक से करेंगे, उचित नहीं होगा। दरअसल जज भी इंसान हैं और ग़लती कर सकते हैं।
  • हालांकि डॉ अम्बेडकर ने इसे ज़रूरी बताया था। बहरहाल सभा में इस पर आम सहमति बनी और अनुच्छेद 129 अस्तित्व में आ गया। इसी अनुच्छेद को क्रियान्वित करने के मकसद से ‘न्यायालय की अवमानना अधिनियम, 1971’ लाया गया.
  • ग़ौरतलब है कि भारत के संविधान के अनुच्छेद 129 और 215 में क्रमशः सुप्रीम कोर्ट और हाई कोर्ट को 'कोर्ट ऑफ़ रिकॉर्ड' का दर्जा दिया गया है। साथ ही, उन्हें अपनी अवमानना के लिए किसी को दंडित करने का भी अधिकार है।
  • कोर्ट ऑफ़ रिकॉर्ड का मतलब ये हुआ कि सुप्रीम कोर्ट या हाई कोर्ट के आदेश तब तक प्रभावी रहेंगे जब तक कि उन्हें किसी क़ानून या दूसरे फ़ैसले से ख़ारिज न कर दिया जाए।

कंटेम्ट ऑफ़ कोर्ट्स ऐक्ट, 1971

  • इस क़ानून के मुताबिक़, न्यायालय की अवमानना का अर्थ किसी न्यायालय की गरिमा एवं उसके अधिकारों के प्रति अनादर प्रदर्शित करना है। 'कंटेम्ट ऑफ़ कोर्ट्स ऐक्ट , 1971' को पहली बार साल 2006 में संशोधित किया गया। इस संशोधन में दो बिंदु जोड़े गए ताकि जिसके ख़िलाफ़ अवमाना का मामला चलाया जा रहा हो तो 'सच्चाई' और 'नियत' भी ध्यान में रखा जाए।
  • इस क़ानून में दो तरह के मामले आते हैं - फौजदारी और ग़ैर फौजदारी यानी 'सिविल' और 'क्रिमिनल कंटेम्प्ट।'
  • 'सिविल कंटेम्प्ट' के तहत ऐसे मामले आते हैं जिसमे अदालत के किसी व्यवस्था, फैसले या निर्देश का उल्लंघन साफ़ नज़र आता हो।
  • वहीँ 'क्रिमिनल कंटेम्प्ट' के दायरे ऐसे मामले आते हैं, जिनमें 'स्कैंडलाइज़िंग द कोर्ट' वाली बात आती हो। 'स्कैंडलाइज़िंग द कोर्ट' का मतलब आम लोगों के बीच कोर्ट की छवि खराब करना है।

इस बारे में दूसरे देशों में क्या स्थिति है?

  • साल 2012 तक ब्रिटेन में 'स्कैंडलाइज़िंग द कोर्ट' वाले मामलों में आपराधिक कार्यवाही का सामना करना पड़ सकता था। लेकिन ब्रिटेन के विधि आयोग की सिफारिश के बाद इस मामले को अपराध की सूची से हटा दिया गया। अमेरिका में कंटेम्प्ट ऑफ़ कोर्ट के प्रावधान मौजूद है, लेकिन पहले संशोधन के तहत अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के अधिकार को इस पर तरजीह मिला हुआ है।

निष्कर्ष

इस क़ानून के समर्थकों का कहना है कि सुप्रीम कोर्ट के फैसले पूरे देश पर लागू होते हैं और सभी अदालतें और कार्यपालिका उन फैसलों को मानने के लिए बाध्य हैं। ऐसे में, अगर अवमानना का कानून न हो तो कोई भी सुप्रीम कोर्ट या दूसरी अदालतों के फैसले नहीं मानेगा।

  • वहीँ इससे अलग कुछ दूसरे विशेषज्ञों का कहना है कि अवमानना का कानून दुनिया के कई देशों में अप्रचलित हो चुका है। भारत में भी इस पर गौर किए जाने जरूरत है।
  • ज़रूरत है कि अदालतों में इस कानून का इस्तेमाल किसी तरह की आलोचना को रोकने के लिए नहीं किया जाए।