(इनफोकस - InFocus) जलवायु आपातकाल (Climate Emergency)


(इनफोकस - InFocus) जलवायु आपातकाल (Climate Emergency)


सुर्ख़ियों में क्यों?

हाल ही में, न्यूजीलैंड सरकार ने जलवायु परिवर्तन और ग्लोबल वार्मिंग के भयानक असर का अंदाजा लगाते हुए देश में जलवायु आपात-काल की घोषणा कर दी है। न्यूजीलैंड के ज़्यादातर सांसदों ने जलवायु आपातकालीन घोषणा के पक्ष में मतदान किया। हालांकि मुख्य विपक्षी दल नेशनल पार्टी ने इस फैसले के खिलाफ मतदान किया है।

महत्वपूर्ण बिंदु

न्यूजीलैंड ने वादा किया है कि सरकारी क्षेत्र से जुड़े उनके सारे उपक्रम साल 2025 तक कार्बन न्यूट्रल बना दिए जाएंगे। ग़ौरतलब है कि अपने पिछले कार्यकाल में अर्डर्न की सरकार ने एक शून्य कार्बन बिल पारित किया था, जिसमें 2050 तक कुल उत्सर्जन को शून्य करने की रूपरेखा तय की गयी थी।

  • बता दें कि न्यूजीलैंड के पहले कनाडा, फ्रांस, ब्रिटेन समेत 31 ऐसे देश है, जो जलवायु आपातकाल की घोषणा कर चुके हैं।
  • यूरोपीय संघ के सांसदों ने भी पिछले साल "जलवायु आपातकाल" घोषित किया था। 28-राष्ट्रों का यूरोपीय संघ जलवायु आपातकाल का आह्वान करने वाला पहला बहुपक्षीय संगठन है।

जलवायु आपात काल और इसकी ज़रूरत

ऑक्सफ़ोर्ड डिक्शनरी के मुताबिक जलवायु आपात काल एक ऐसी स्थिति है जिसमें जलवायु परिवर्तन से होने वाले या संभावित पर्यावरणीय क्षति को कम करने या रोकने के लिए तत्काल कार्यवाही की जरूरत होती है। ग़ौरतलब है कि ऑक्सफ़ोर्ड डिक्शनरी ने क्लाइमेट एमरजैंसी को साल 2019 का विश्व का दूसरा सबसे लोकप्रिय शब्द माना है।

  • जलवायु आपात-काल की यह घोषणा जलवायु परिवर्तन पर अंतर सरकारी पैनल यानी IPCC के आधार पर की गई है।
  • IPCC के मुताबिक ग्लोबल वार्मिंग में 1.5 डिग्री सेल्सियस से ज्यादा वृद्धि ना हो, इसके लिए उत्सर्जन को 2023 तक 2010 के स्तर से लगभग 45 फ़ीसदी कम करना होगा। साथ ही, साल 2050 तक उत्सर्जन को शून्य तक ले जाने की जरूरत होगी।
  • ग्रीनपीस न्यूजीलैंड के द्वारा भी न्यूजीलैंड सरकार से जलवायु आपात काल घोषित करने की मांग की गई थी।
  • ग्रीनपीस ने इसके पीछे यह तर्क यह दिया था कि वर्तमान में मानव मौसम की अत्यधिक चरम अवस्था, वन्य जीवन संपदा का क्षरण और स्वच्छ जल समेत भोजन तक पहुंच के संकट का सामना कर रहा है। ऐसे में, अब जलवायु आपात काल लागू करने की जरूरत आन पड़ी है।

जलवायु परिवर्तन और इसके प्रभाव

औद्योगिक क्रांति के बाद से पृथ्वी का औसत तापमान हर साल लगातार बढ़ रहा है। पहली बार इस बात का खुलासा आईपीसीसी ने अपनी एक रिपोर्ट में किया था। समय बीतता गया और जलवायु परिवर्तन के दुष्परिणाम धीरे-धीरे सामने आने लगे।

  • आज गर्मियां लंबी होती जा रही हैं तो सर्दियां छोटी। प्राकृतिक आपदाओं की आवृत्तियाँ बढ़ चुकी हैं तो प्रवृत्तियां बदल चुकी हैं।
  • तमाम प्रजातियाँ तेजी से विलुप्त हो रही है।
  • महासागरों का तेजी से अम्लीकरण हो रहा है और बर्फ पिघल रहे हैं, जिससे जल-स्तर बढ़ रहा है।
  • खाद्य और ऊर्जा जैसे संसाधनों की कमी से मानव संघर्ष बढ़ रहे हैं। विशेषज्ञ और वैज्ञानिक इस बारे में लगातार आगाह करते आ रहे हैं।

जलवायु परिवर्तन से निपटने के उपाय

इस मौजूदा समस्या से निपटने के लिए आज एक बहुआयामी रणनीति की जरूरत है. जिसमें सबसे पहला तरीका जीवाश्म ईंधन से अलग हमें ऊर्जा के नए विकल्पों जैसे कि सौर, पवन और बायोमास आदि पर तेजी से काम करना होगा।

  • हमें ऊर्जा और जल दक्षता बढ़ानी होगी जिसमें अत्याधुनिक और अधिक कुशल उपकरणों के इस्तेमाल की जरूरत है।
  • हमें अपने निजी जीवन में ‘ग्रीन गुड डीड्स’ की आदत डालनी होगी. ‘ग्रीन गुड डीड्स’ के अंतर्गत हम अपने दैनिक जीवन में कुछ साधारण बदलाव जैसे कि सार्वजनिक परिवहन का इस्तेमाल करना, कारपूलिंग को बढ़ावा देना और अपने घरों में अनावश्यक बिजली बर्बाद न करने जैसे छोटी-छोटी बातों का ध्यान रखते हैं.
  • खेती के दौरान प्राकृतिक संसाधनों के बेहतर उपयोग को बढ़ावा देना होगा, जिससे कि बड़े पैमाने पर वनों की कटाई और मृदा प्रदूषण को रोका जा सके.
  • रीसाइकिल्ड प्रोडक्ट्स को प्रोत्साहन दिया जाना चाहिये चाहे वो भोजन, कपड़े या फ़िर सौंदर्य प्रसाधन से जुड़े उत्पादों के बारे में ही क्यों ना हो.
  • इसके लिए हमें नए वैज्ञानिक शोधों को बढ़ावा देना और तकनीकों बेहतर बनाना होगा. इमारतों से हो रही ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन को देखते हुए हमें अपने इन्फ्रास्ट्रक्चर को भी अब अपग्रेड करने की ज़रूरत है।