(डेली न्यूज़ स्कैन - DNS हिंदी) थ्वाइट्स ग्लेशियर अगर पिघला तो होगा जल प्रलय का खतरा (If Thwaites glacier melted, there will be danger of water catastrophe)


(डेली न्यूज़ स्कैन - DNS हिंदी) थ्वाइट्स ग्लेशियर अगर पिघला तो होगा जल प्रलय का खतरा (If Thwaites glacier melted, there will be danger of water catastrophe)



अंटार्कटिका का थ्वाइट्स ग्लेशियर (Thwaites glacier) पिछले तीन सालों में तेजी से पिघला है। अगर इस के पिघलने की यही गति रही तो दुनियाभर में 9 करोड़ से ज्यादा लोग जलप्रलय के खतरे में आ सकते हैं। दरअसल लंबे समय से जलवायु परिवर्तन के कारण थ्वाइट्स ग्लेशियर काफी तेजी से पिघल रहा है. अभी हाल ही में स्वीडन की यूनिवर्सिटी ऑफ गोथेनबर्ग के शोधकर्ताओं ने इस ग्लेशियर को लेकर कुछ नए खुलासे किए हैं. नई जानकारियों के मुताबिक इस ग्लेशियर के नीचे जो गर्म जल बह रहा है, उसके दर को लेकर हमारा पुराना अनुमान गलत था. यानी यह गर्म जल हमारे अनुमान से कहीं ज्यादा तेजी से ग्लेशियर को प्रभावित कर रहा है।

डीएनएस में आज हम आपको थ्वाइट्स ग्लेशियर के बारे में बताएंगे. साथ ही समझेंगे इससे जुड़े कुछ अन्य महत्वपूर्ण पहलुओं को भी

अंटार्कटिका के पश्चिमी इलाके में स्थित थ्वाइट्स हिमशैल समुद्र के भीतर कई किलोमीटर की गहराई में डूबा हुआ है. वहीं इसकी भीतरी चौड़ाई करीब 468 किलोमीटर है. इसका क्षेत्रफल 1,92,000 वर्ग किलोमीटर है. यानी तुलना करें तो ये ग्रेट ब्रिटेन के जितना है. इसकी विशालता का अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि यहां की बर्फ पूरी दुनिया के पहाड़ों पर इकट्ठा बर्फ से भी 50 गुना से ज्यादा है. अब आप सोचिए कि अगर इतना विशाल ग्लेशियर पिघला तो दुनिया में तबाही मच जाएगी. इसके पिघलने की गति तेज होना ही वैज्ञानिकों के लिए चिंता का सबसे बड़ा कारण बना हुआ है।

नासा के वैज्ञानिकों के मुताबिक, समुद्र के भीतर इस ग्लेशियर के भीतर बड़े-बड़े छेद हो रहे हैं. जो लगभग ग्रेट ब्रिटेन के आकार के हैं. छेद के इतने बड़े आकार को देखकर अंदाजा लगाया गया कि ये पिघली हुई बर्फ लगभग 14 खरब टन रही होगी. गौरतलब है कि ये सारी बर्फ पिछले तीन सालों के भीतर पिघली है। इस बात को पता लगाने में वैज्ञानिकों को काफी मुश्किलों का सामना करना पड़ा था. बता दें कि इस ग्लेशियर के आसपास का मौसम इतना तूफानी होता है कि इसकी सैटलाइट इमेज भी साफ नहीं आ पाती है. इसकी वजह से अमेरिका और ब्रिटेन ने केवल इस ग्लेशियर की तस्वीर निकाल सकने के लिए एक बड़ा करार किया था, जिसे इंटरनेशनल थ्वाइट्स ग्लेशियर कोलेबरेशन कहते हैं। ग्लेशियर के पिघलने की गति के बारे में पता लगाने के लिए वैज्ञानिकों ने इसमें एक छेद किया था और फिर उस छेद के जरिए एक रोबोट अंदर डाला गया था.

आम तौर पर अगर ग्लेशियर धीरे-धीरे पिघल रहा है तब यह सामान घटना मानी जाती है, लेकिन इसके पिघलने की गति बढ़ना यह चिंता का विषय हो सकता है. यही समस्या थ्वाइट्स ग्लेशियर के साथ भी है. इसके काफी बड़े-बड़े टुकड़े हो रहे हैं और फिर वे चलते हुए समुद्र के पानी के संपर्क में आकर पिघल रहे हैं. इससे समुद्र का जलस्तर बढ़ रहा है। इसके बारे में मिली नई जानकारियों के मुताबिक, इस ग्लेशियर के पिघलने की गति हमारे अनुमान से कहीं ज्यादा है. अगर यह इसी गति से पिघलता रहा तो दुनियाभर के समुद्रों का स्तर 2 से 5 फीट तक बढ़ जाएगा. इसके कारण तटीय इलाके पानी से डूब जाएंगे. इस तरह से अलग-अलग देशों की करोड़ों की आबादी या तो मारी जाएगी या फिर विस्थापन का शिकार हो जाएगी। इसका अर्थव्यवस्था पर काफी बुरा प्रभाव पड़ सकता है और साथ ही महामंदी आ सकती है। जलप्रलय के अलावा इस ग्लेशियर के पिघलने के कई दूसरे दुष्परिणाम भी होंगे, जैसे पीने के पानी की कमी होना. बता दें कि दुनिया के ताजे पानी में अंटार्कटिक की बर्फ की हिस्सेदारी नब्बे फीसदी है। अब एक बार में बर्फ पिघलने से जलस्तर जरूर बढ़ जाएगा, लेकिन दूसरे इलाकों में पानी की कमी हो जाएगी. इन्हीं सारी दिक्कतों को देखते हुए वैज्ञानिक इस ग्लेशियर को ‘डूम्सडे ग्लेशियर’ का भी नाम दे रहे हैं यानी एक ऐसा ग्लेशियर जिसका पिघलना कयामत ला सकता है। वैज्ञानिक इस पूरे हिमशैल पर काफी सतर्क नजर बनाए हुए हैं.