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Blog / 30 Jul 2020

(डेली न्यूज़ स्कैन - DNS हिंदी) नासा का ASTHROS मिशन (NASA's ASTHROS Mission)

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(डेली न्यूज़ स्कैन - DNS हिंदी) नासा का ASTHROS मिशन (NASA's ASTHROS Mission)



नासा ने हाल ही में एलान किया है की वो अंतरिक्ष में फुटबॉल स्टेडियम के आकार के गुब्बारे में एक टेलिस्कोप भेजेगा। इस टेलिस्कोप को स्ट्रैटो स्फीयर में काफी ऊँचाई पर स्थापित किया जाएगा ताकि धरती से उन तरंग दैर्ध्यों को देखने में आसानी हो सके जिन्हे धरती से देखने में कठिनाई होती है। इस मिशन के ज़रिये उन सवालों के जवाब आसानी से ढूंढें जा सकेंगे जिनमे आकाशगंगा में बड़े सितारों का निर्माण होता है।

इस टेलिस्कोप मिशन का नाम एसथ्रोस मिशन रखा गया है और इसे साल 2023 के दिसंबर में अंटार्टिका से भेजे जाने की योजना है। यह बर्फीले दक्षिणी महाद्वीप के ऊपर तकरीबन 3 हफ़्तों तक हवा की धाराओं में तैरता रहेगा। गुब्बारे में लगा यह टेलिस्कोप इंफ्रारेड रोशनी और ज्यादा वेबलेंथ वाली रोशनी का अध्ययन करेगा।

गुब्बारे की खासियत

आकार में यह गुब्बारा 150 मीटर चौड़ा होगा। यह एक फुटबॉल के स्टेडियम के जैसा होगा। इस गुब्बारे की 130,000 फीट की ऊंचाई तक पहुँचने की क्षमता है । हवाईजहाज जितने ऊँचाई पर उड़ते हैं यह ऊँचाई उससे चार गुना ज्यादा है। हालांकि ये गुब्बारा अंतरिक्ष तक नहीं पहुँच सकेगा लेकिन पृथ्वी के समतापमंडल या स्ट्रैटोस्फीयर में जाकर यह अंतरिक्ष से पृथ्वी की तरफ आने वाली रोशनियों के बारे में जानकारी इकठ्ठा करेगा। इस गुब्बारे में एक ऐसा उपकरण भी लगाया जाएगा जो नए सितारों के आसपास मौजूद गैस की गति को मापेगा। गुब्बारे के नीचे लगाए गए एक गोंडोला में दूरबीन और सारे उपकरण लगाए जाएंगे।

इंफ्रारेड रोशनियों के संपर्क में आने वाले उपकरणों को ठंडा रखना बेहद जरूरी होता है। ऐसे में इन्हें ठंडा रखने के लिए क्रायोकूलर का इस्तेमाल किया जाएगा। यह उपकरणों का तापमान माइनस 268.5 डिग्री सेल्सियस रखने में मदद करेगा।

इस मिशन में चार चीजों पर अध्ययन किया जाएगा। इनमें मिल्की वे आकाशगंगा में दो तारों के निर्माण के इलाके शामिल हैं। इसके अलावा अंतरिक्ष में मौजूद दो तरह के नाइट्रोजन आयन का भी अध्ययन किया जाएगा। इस गुब्बारे की लॉन्चिंग अंटार्कटिका से दिसंबर 2023 में की जाएगी। यहां चलने वाली हवाओं की मदद से 21 से 28 दिन के अंदर यह गुब्बारा स्ट्रैटोस्फीयर तक पहुंच जाएगा। नासा का कहना है कि इस मिशन में ज्यादा उपकरणों, खर्चे और समय की जरूरत नहीं पड़ेगी। इसमें किसी जटिल तकनीक की जरूरत भी नहीं पड़ेगी।

नासा को उम्मीद है की गुब्बारा दक्षिणी ध्रुव के 2-3 चक्कर तकरीबन 21 से 28 दिन में लगा लेगा। जैसे ही यह मिशन पूरा हो जायेगा इससे गोंडोला अलग हो जाएगा और इससे जुड़ा हुआ पैराशूट इसे धरती की सतह पर वापस ले आएगा। नासा के वैज्ञानिकों का कहना है की वे एस्ट्रोस को धरती के सबसे वीरान और सबसे कठोर सतह से अंतरिक्ष के मुहाने पर छोड़ेंग।

माना जा रहा है की एस्ट्रोस से उन स्थानों का पता चल सकेगा जहां बड़े taaron से आने वाली हवाओं और सुपरनोवा विस्फोट की वजह से गैस क्लाउड्स का अकार बदल जाता है। एस्ट्रोस अंतरिसख से निकलने वाली इन गैसों के घनत्व , रफ़्तार और हलचल का पहला 3D मैप बनाएगा

गौर तलब है की नासा पिछले 30 सालों से साइंटिफिक बलून प्रोग्राम चला रहा है। हर साल इस तरह के 10-15 इस तरह के मिशन को अंजाम देता है नासा। इस तरह के मिशन लागत के नज़रिये काफी फायदेमंद होते हैं साथ ही इनको संचालित करने में भी ज़्यादा लोगों और संसाधनों की ज़रुरत नहीं होती।

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