(डाउनलोड) यूपीपीएससी सहायक वन संरक्षक/क्षेत्रीय वन अधिकारी मुख्य परीक्षा वैकल्पिक विषय "वानिकी" पाठ्यक्रम हिंदी में (Download) UPPSC ACF, RFO Mains Optional Subject "Forestry" Exam Syllabus in Hindi


(डाउनलोड) यूपीपीएससी सहायक वन संरक्षक/क्षेत्रीय वन अधिकारी मुख्य परीक्षा वैकल्पिक विषय "वानिकी" पाठ्यक्रम हिंदी में (Download) UPPSC ACF, RFO Mains Optional Subject "Forestry" Exam Syllabus in Hindi


:: प्रश्न पत्र - 1 (Paper - I) ::

खण्ड-क (Section - A)

1. वन वर्धन-सामान्यः

सामान्य वन वर्धन सिद्धान्त-वनस्पति को प्रभावित करने वाले परिस्थितिकी तथा शरीर विज्ञानीय कारक, वनों का प्राकृतिक तथा कृत्रिम पुनर्संचरण, प्रसार की पद्धतियां, ग्राफ्टिंक तकनीक, स्थल कारक, नर्सरी तथा रोपण तकनीक- नर्सरी क्यारियां, पोली बैग एवं अनुरक्षण, पौधों के लिए जल निर्धारण, श्रेणीकरण तथा पौधों का दृढ़िकरण, विशेष आधार, प्रस्थापनाएं तथा देखभाल।

2. वन वर्धन-प्रणालियां:

सम्पूर्ण कटान (बिलयर फैलिंग), समरूप छाया काष्ठ चयन, गुल्पवन तथा रूपान्तर पद्धति, शीतोष्ण, उप-उष्ण कटिबन्धी, आर्द्र-उष्ण कटिबन्धी, शुष्क-उष्ण कटिबन्धी तथा तटीय-उष्ण कटिबन्धी वनों के वृक्षारोपण वन वर्धन, प्रजाति चयन, मानकों की स्थापना तथा व्यवस्था, उपजाऊपन की पद्धतियां, तकनीकी अड़चनें, गहन यंत्रीकृत, पद्धतियां, हवाई बीज छिड़काव, बिरलन के विशेष सन्दर्भ में वन वर्धन प्रणालियों का प्रबन्ध।

3. वन वर्धन-कच्छ वनस्पति तथा शीत मरुस्थलः

कच्छ वनस्पति वास तथा लक्षण, कच्छ वनस्पति पौध स्थापना- निकृष्ठ कच्छ वनस्पति स्वरूपों की स्थापनों तथा पुर्नस्थापना, कच्छ वनस्पति के लिए वनवर्धन पद्धति, प्राकृतिक आपदाओं के विरुद्ध वास का संरक्षण, शीत मरुस्थल- प्रजातियों के लक्षण, पहचान तथा व्यवस्था।

4. वृक्षों का वनवर्धनः

उष्णकटिबन्धीय वन वर्धन शोध तथा व्यवहार में परम्परागत तथा नवीतनम विकास, भारत में आर्थिक रूप से महत्वपूर्ण कुछ प्रजातियों का वनवर्धन जैसे खैर/कत्था (ऐकेसिया कैटेचू), बबूल (ऐकेसिया निलोटिका), ऐकेसिया आरिंकुलीफार्मिस, सिरस (एल्बिजिया लैबेक), ऐल्बिजिया प्रोसेरा, कदंब (ऐन्थोसेफेलस कर्दबा), एनोगाइसस लैटीफोलिवा, नीम (ऐजाडिरेक्टा इण्डिका), बांस प्रजाति, ढाक/फ्लाश (व्यूटिया मोनोस्पर्मा), कैसिया सिएमिया, कैजूवाराइना इक्यूसैटीफोलिया, देवदार (सीड्रस देओदार) चुकरासिया टैबुलारिस, शीशम (डैलवर्जिया सिसो), डिप्टैरोकार्मस प्रजातियां, एम्बीलिका आकसिनालिस यूकेलिप्टस प्रजातियां, गंमारी (मेलाइना आर्बोरिया), हार्डबिकिया विनाटा, लाजसर््ट्रीपिया लैनसिवोलाटा, पाइनस (चीड़वंश) राकसवर्गी, पोप्यूलस प्रजातियां पक्षफली फलघानी (टेरोकार्पस मार्सूथियम), विलायती कीकर (पोसोथिस ज्यूलीफ्लोरा), चन्दन (सैन्टेलम एलबम) सिमिकार्पस एनाकार्डियम, साल (सोरिया रोबास्टा), सेमल (सेल्पैलिया मालाबेरिकम), सागोन (टेक्टोना ग्रैन्डिस) टर्मिनेलिया टोमेन्टोसा, इमली (टेमारिन्डस इण्डिका)।

खण्ड-ख (Section - B)

1. कृषि वानिकी, सामाजिक वानिकी संयुक्त वन प्रबन्ध तथा ट्राइबोलोजीः

कृषि वानिकीः कार्यक्षेत्र तथा आवश्यकता, जन और पालतू जानवरों के जीवन तथा समन्वित भूमि उपयोग में भूमिका, विशेष रूप से निम्नलिखित की योजना के सन्दर्भ में

(i) मृदा तथा जल संरक्षण;
(ii) जल पुनर्भरण (रीचार्ज);
(iii) फसलों में पोषण उपलब्धता;
(iv) नाशी जीव-परभक्षी के सम्बन्ध के द्वारा परिस्थितिकी संतुलन सहित प्रकृति तथा परिस्थिति तंत्र संरक्षण तथा
(v) जैव-विविधता, औषधीन तथा अन्य वनस्पति और जीव जन्तुओं के वर्धन के लिए अवसर प्रदान करना। विभिन्न कृषि-पारिस्थितिकी क्षेत्रों के अन्तर्गत कृषि वानिकी तंत्र, प्रजातियों का चयन तथा बहुउद्देशीय वृक्षों की भूमिका- और एन टी एफ पी एस प्रविधियां, अन्न, चारा तथा ईंधन सुरक्षा, अनुसंधान तथा विस्तार आवश्यकताएं।

सामाजिक/शहरी वानिकी- उद्देश्य, कार्य, क्षेत्र तथा आवश्यकता; जन सहभागिता।

जे.एफ.एम- (संयुक्त वानिकी प्रबन्ध) सिद्धान्त, उद्देश्य, प्रणाली विज्ञान, कार्यक्षेत्र, लाभ तथा एन जी ओ (गैर सरकारी संस्था) की भूमिका।

ट्राइबोलाजी-भारत में जन जातीय अवस्था; जन जातियां, प्रजातियों की अवधारणा, सामाजिक समहू न के सिद्धान्त, जन जातीय अर्थ व्यवस्था, शिक्षा, सांस्कृतिक परम्परा, रूढ़ि, प्रकृति तथा वानिकी कार्यक्रमों में सहभागिता।

2. वन मृदा, मृदा संरक्षण तथा जल-विभाजक प्रबन्धः

वनों की मृदा, वर्गीकरण, मृदा विरचन को प्रभावित करने वाले कारक, भौतिक, रसायनिक तथा जैविक गुणधर्म।

मृदा संरक्षणः परिभाषा, अपरदन के कारण; प्रकार-वायु तथा जल अपरदन, अपरदित मृदा/क्षेत्र का संरक्षण तथा प्रबन्ध, वातरोध, रक्षक मेखला, बालू टिब्बा, लवण और क्षारीय मृदाओं का उद्धार, जल प्लावन तथा अन्य व्यर्थ भूमि, मृदा संरक्षण में वनों की भूमिका, मृदा कार्बनिक द्रव्यों का रखरखाव और निर्माण, हरे पत्तों की खाद डालने के लिए कतरन की व्यवस्था; वन पर्णकरकट तथा कंपोस्टिंग, मृदा को सुधारने में सूक्ष्म घटकों की भूमिका; एन (नाइट्रोजन) और सी (कार्बन) चक्र, बी ए एम।

जल विभाजन प्रबन्धः जल विभाजनों की अवधारणाएं समग्र संसाधन प्रबन्धन व्यवस्था में लघु वनों तथा वन वृक्षों की भूमिका, वन जन विज्ञान, प्रवाह नियंत्रण के सम्बन्ध में जल विभाजकों का विकास, नदी जलमार्ग स्थिरीकरण, हिमस्खलन तथा भू-स्खलन नियंत्रण, निकृष्ट क्षेत्र का पुनर्वास, उपगिरि तथा पर्वतीय क्षेत्र; वनों का जल विभाजक प्रबन्धन तथा पर्यावरण सम्बन्धी प्रकार्य, जल शस्य तथा संरक्षण; भूमि जल पुनर्भरण तथा जल विभाजक प्रबन्ध, समन्वित वन वृ़क्षों की भूमिका, बागवानी फसलें, खेत की फसलें, घास तथा चारा।

3. पर्यावरणीय संरक्षण तथा जैव विविधताः पर्यावरणः

संघटक तथा महत्व, संरक्षण के सिद्धान्त, निर्वनीकरण, दावाग्नि तथा अन्य विभिन्न मानवकृत गतिविधियां जैसे खनन, निर्माण तथा विकास परियोजनाएं, जनसंख्या वृद्धि का पर्यावरण पर प्रभाव।

प्रदूषणः प्रकार, विश्वव्यापी तापन, ग्रीनहाउस प्रभाव, ओजोन लेयर रिक्तीकरण, अम्लीय वर्शा, प्रभाव तथा नियंत्रण के उपाय, पर्यावरणीय अनुश्रमण, सतत विकास की अवधारणा, पर्यावरण संरक्षण में वनों तथा वृक्षों की भूमिका; वायु, जल तथा रव प्रदूशण पर नियंत्रण तथा रोकथाम, भारत में पर्यावरण नीति तथा विधानः पर्यावरणीय प्रभाव मूल्यांकन, जल विभाजकों का विकास तथा साथ ही पारिस्थितिक और पर्यावरणी संरक्षण का अर्थोपाय मूल्यांकन।

वृक्ष सुधार तथा बीज प्रौद्योगिकीः वृक्ष सुधार की सामान्य अवधारणा, पद्धतियां तथा प्रविधियां, भिन्नताएं और उनके उपयोग, उद्गम क्षेत्र, बीज स्रोत, विदेशज; वन वृक्ष सुधार के परिमाणात्मक पहलू, बीज उत्पादन बीज उधान; संतति परीक्षण, प्राकृतिक वन तथा रबड़ सुधार में वृक्ष सुधार का उपयोग आनुवांशिक परीक्षण कार्यक्रम, रोगों, कीटों तथा प्रतिकूल पर्यावरण के प्रतिरोध हेतु वरण तथा प्रजनन, आनुवांशिक आधार, वन आनुवांशिक संसाधन और जीन संरक्षण ‘स्व स्थाने’ तथा ‘बाह्य स्थाने’, लागत-लाभ अनुपात अर्थोपाय मूल्यांकन।

:: प्रश्न पत्र - 2 (Paper - II) ::

खण्ड-क (Section - A)

1. वन प्रबन्ध एवं प्रबन्ध पद्धतिः

उद्देश्य तथा सिद्धान्त, प्रविधियां, रबड़ संरचना एवं गतिकी, सतत उत्पाद सम्बन्ध, आवर्तन, सामान्य वन, वर्धमान संग्रह, उत्पाद के नियमन, वन रोपण का प्रबन्धन, वाणिज्यिक वन, वन आच्छादन अनुश्रवण, आधार जैसेः (i) स्थल विशेष की योजना (ii) युक्तिपूर्ण योजना (iii) अनुमोदन, संस्वीकृति तथा व्यय (iv) अनुश्रवण (v) रिपोर्टिंग तथा अभिशासन, शामिल उपायों के विवरण: ग्रामीण वन समिति का गठन, संयुक्त वन सहभागिता प्रबन्ध।

2. वनों की कार्य योजनाः

वन योजना, मूल्यांकन तथा अनुश्रवण साधन एवं समन्वित योजना के आधार, वन संसाधनों का बहु-उद्देश्यीय विकास तथा वन उद्योग विकास; कार्य आयोजन तथा कार्य योजना, प्रकृति संरक्षण में उनकी भूमिका; जैव विविधता तथा अन्य आयाम, तैयारी तथा नियंत्रण, मण्डलीय कार्य आयोजन, कार्य संचालन का वार्षिक आयोजन।

3. वन विस्तार- कलन (मेन्सुरेशन) तथा दूर-संवेदनः

मापन पद्धतियां-पेड़ों का व्यास, घेरा, ऊँचाई तथा आयतन; रूप विधान, रबड़ (स्टैन्ड) आयतन (वाल्यूम) आकलन, वर्तमान वार्षिक वृद्धि, (माध्य) वार्णिक वृद्धि, प्रतिचयन विधि तथा प्रतिदर्श भूखण्ड (प्लाट), उपज गणना, उपज तथा रबड़ (स्टैण्ड) सारणियों, सुदूर संवेदन द्वारा वन आच्छादन अनुश्रवण; प्रबन्ध तथा प्रतिदर्श के लिए भौगोलिक सूचना तंत्र।

4. सर्वेक्षण तथा वन इंजीनियरीः

वन सर्वेक्षण- सर्वेक्षण के विभिन्न तरीके, मानचित्र तथा मानचित्र अंकन, वन इंजीनियरी के मूलभूत सिद्धान्त, भवन सामग्री तथा निर्माण, सड़कें तथा पुल, लकड़ी के पुलों के सामान्य सिद्धान्त, उद्देश्य, प्रकार, प्रतिदर्श अभिकल्पना तथा निर्माण।

खण्ड-ख (Section - B)

1. वन पारिस्थितिकी तथा नृजाति वनस्पतिः वन पारिस्थितिकीः

जैव तथा अजैव संघटन, वन परिस्थितितंत्र, वन समुदाय संकल्पना, वनस्पति संकल्पना, पारिस्थितिकी वंशक्रम तथा चरमोत्कर्ष, प्राथमिक उत्पादकता, पोषाक चक्रण तथा जल सम्बन्ध, प्रतिबल वातावरण में शरीर रचना (सूखा, जल भराव, लवणता तथा क्षारीयता), भारत में वनों के प्रकार, प्रजातियों की पहचान, संयोजन तथा सह-योजन, वृक्षविज्ञान, वर्गिकी विभाजन, वनस्पति संग्रहालय तथा वनस्पति-वाटिका (हबोरिया व आरबोरेटा) के स्थापन के सिद्धान्त, वन परिस्थितितंत्र का संरक्षण, कृन्तक उद्यान (क्लोनल पार्क), नृजाति वनस्पति की भारतीय आयुर्विज्ञान पद्धतियों में, भूमिका, आयुर्वेद तथा यूनानी सुगन्धित तथा औषधीय वनस्पतियों का परिचय, नाम पद्धति, आवास, वितरण तथा वानस्पतिक विशेषताएं, औषध वनस्पतियों के असर कारक तत्व और विषाक्तता को प्रभावित करने वाले घटक और उनके रासायनिक संघटक।

2. वन संसाधन तथा उपयोगीकरणः

वातावरणीय (प्रबल/सांद्र वन उपज प्रक्रियाएं-लॉगिन्ग तथा निस्सारण प्रविधियां और सिद्धान्त; परिवहन पद्धतियां, भण्डारण तथा बिक्री, गैर-लकड़ी वन उत्पाद (एन टी एफ पी)- परिभाषा और क्षेत्र, गोंद राल, तैलीराल रेशा, तिलहन, दृढ़फल (नट), रबड़, बेंत, बांस, औषधीय वनस्पति काठकोयला, लाख और चपड़ा कत्था और बीड़ी पत्ते-संग्रहण, संसाधन तथा निपटान, काष्ठ संशोषण और परिरक्षण की आवश्यकता और महत्व, संशोषण के सामान्य सिद्धान्त; आयु तथा भट्टा संशोषण, सौर- अनार्द्रताकरण, मापीय तापित तथा विद्युत भट्टियां, मिश्रित काष्ठ; आसंजक निर्माण, गुण, उपयोग, प्लाइवुड निर्माण, गुण उपयोग, फाइबर बोर्ड-निर्माण, गुण उपयोग; निपात (पार्टीकल) बोर्ड-निर्माण, गुण उपयोग, भारत में मिश्रित काष्ठ उद्योग की वर्तमान स्थिति और भविष्य में विस्तार की योजनाएं, लुग्दी कागज तथा रेशम; उद्योग को कच्चे माल की आपूर्ति की वर्तमान स्थिति काष्ठ प्रतिस्थापन, बागान लकड़ी की उपयोगिता; समस्याएं तथा संभाव्यताएं।

काष्ठ की कायिक रचना, काष्ठ के दोष तथा असमानताएं प्रकाष्ठ (टिम्बर) की पहचान -सामान्य सिद्धान्त।

3. वन संरक्षण तथा वन्य जीव विज्ञानः

वनों की क्षति-अजैव तथा जैव, विध्वंसक शाखाएं (एजेंसी), कीड़े-मकोड़े तथा बीमारियां, वायु प्रदूषण का वनों पर प्रभाव तथा फोरेस्ट डाई बैंक। वनों की क्षति की सुग्राहिता, क्षति का स्वरूप, कारण, रोकथाम, सुरक्षात्मक उपाय तथा रासायनिक तथा जैविक नियंत्रण से लाभ, अग्नि से वनों की सामान्य सुरक्षा-उपकरण तथा विधि, अग्नि के नियंत्रित उपयोग, आर्थिक तथा पर्यावरणी, लागत, प्राकृतिक आपदाओं के बाद टिम्बर बचाव संचालन, वन रोपण तथा वनों के पुनः संचरण की काबर्न -डाइऑक्साइड (CO2) के विलयन में भूमिका, चक्रीय तथा नियंत्रित चरान (ग्रेजिंग), घास चारक तथा पत्ता चारक जानवरों पर नियंत्रण की विभिन्न विधियां; वन्य जीवों, मानव प्रभाव, अतिक्रमण, अनाधिकार शिकार (पोचिंग), चरान बाड़ा लगाना, (लाइव फैंसिंग) चोटी, स्थानान्तरी जुताई का वनों के संचरण पर प्रभाव और नियंत्रण।

4. वन अर्थव्यवस्था तथा विधानः

वन अर्थव्यवस्था-मौलिक सिद्धान्त-लागत-लाभ विश्लेषण, मांग और पूर्ति का आकलन, राष्ट्रीय तथा अन्तर्राष्ट्रीय बाजार में विश्लेषणों का रूख तथा उत्पादन एवं उपभोक्ता प्रतिमान (पैटर्न) में परिवर्तन; बाजार संरचनाओं का मूल्य निर्धारण तथा प्रक्षेपण; निजी क्षेत्र तथा सहकारिताओं की भूमिका; निगमित वित्त पोषण की भूमिका, वनों की उत्पादकता और दृष्टिकोण का सामाजिक-आर्थिक विश्लेषण; वनों की वस्तुओं तथा सेवाओं का मूल्यांकन विधान-वन विकास का इतिहास; 1894- 1952 तथा 1990 की भारतीय वन नीति, राष्ट्रीय वन नीति 1988, जन आवेष्टन, संयुक्त वन प्रबन्ध, महिलाओं का आवेष्टन, भूमि उपयोग से सम्बन्धित वन नीतियां तथा मुद्दे; टिम्बर तथा गैर-टिम्बर उत्पाद; सतत वन प्रबन्ध; औद्योगिकीकरण नीतियां; संस्थागत तथा संरचनात्मक परिवर्तन, विकेन्द्रकरण तथा वानिकी लोक प्रशासन/ वननियम, आवश्यकता; सामान्य सिद्धान्त, भारतीय वन अधिनियम, -1927 वन संरक्षण अधिनियम 1980; वन्यजीव संरक्षण अधिनियम 1972, और उनमें संशोधन, भारतीय आचार संहिता का वानिकी में अनुप्रयोग, वनों की सूची का प्रयोजन और उद्देश्य।

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