‘मेक इन इंडिया’: एक मूल्यांकन - यूपीएससी, आईएएस, सिविल सेवा और राज्य पीसीएस परीक्षाओं के लिए समसामयिकी


‘मेक इन इंडिया’: एक मूल्यांकन - यूपीएससी, आईएएस, सिविल सेवा और राज्य पीसीएस  परीक्षाओं के लिए समसामयिकी


चर्चा का कारण

भारत सरकार ने 25 सितंबर 2014 को ‘मेक इन इंडिया’ कार्यक्रम का शुभारंभ किया था। इस कार्यक्रम को पाँच वर्ष पूरे हो चुके हैं। यह कार्यक्रम सरकार द्वारा देशी और विदेशी कंपनियों के माध्यम से भारत में ही वस्तुओं के निर्माण पर बल देने के लिए बनाया गया है। इस लेख के माध्यम से हम ‘मेक इन इंडिया’ के सफर का विश्लेषण करेंगे।

परिचय

विनिर्माण को बढ़ावा देने एवं संवर्द्धन के लिए सरकार ने 25 सितम्बर, 2014 को ‘मेक इन इंडिया’ कार्यक्रम की शुरूआत की, जिससे भारत को महत्वपूर्ण निवेश एवं विनिर्माण, संरचना तथा अभिनव प्रयोगों के वैश्विक केंद्र के रूप में बदला जा सके।

‘मेक इन इंडिया’ मुख्यतः विनिर्माण क्षेत्र पर केंद्रित है लेकिन इसका उद्देश्य देश में उद्यमशीलता को बढ़ावा देना भी है। इसका दृष्टिकोण निवेश के लिए अनुकूल माहौल बनाना, आधुनिक और कुशल बुनियादी संरचना, विदेशी निवेश के लिए नये क्षेत्रों को खोलना और सरकार एवं उद्योग के बीच एक साझेदारी का निर्माण करना है। गौरतलब है कि ‘मेक इन इंडिया’ पहल के संबंध में देश एवं विदेशों से सकारात्मक प्रतिक्रिया प्राप्त हुई है। जापान, चीन, फ्रांस और दक्षिण कोरिया जैसे देशों ने विभिन्न औद्योगिक और बुनियादी ढांचागत परियोजनाओं में भारत में निवेश करने हेतु अपना समर्थन दिखाया है।

विनिर्माण को बढ़ावा देने के लिए लक्ष्य

  • मध्यम अवधि में विनिर्माण क्षेत्र की वृद्धि दर में प्रति वर्ष 12-14% वृद्धि करना।
  • 2022 तक देश के सकल घरेलू उत्पाद में विनिर्माण की हिस्सेदारी में 16% से 25% की वृद्धि करना।
  • विनिर्माण क्षेत्र में वर्ष 2022 तक 100 मिलियन अतिरित्तफ़ रोजगार के अवसर पैदा करना।
  • समावेशी विकास के लिए ग्रामीण प्रवासियों और शहरी गरीबों के बीच उचित कौशल का निर्माण करना।
  • घरेलू मूल्य संवर्द्धन और निर्माण में तकनीकी गहराई में वृद्धि करना।
  • भारतीय विनिर्माण क्षेत्र की वैश्विक प्रतिस्पर्द्धा बढ़ाना।
  • विशेष रूप से पर्यावरण के संबंध में विकास की स्थिरता सुनिश्चित करना।
  • मेक इन इंडिया अभियान के लिए सरकार ने प्राथमिकता वाले 25 क्षेत्र चिह्नित किए हैं, जिन्हें प्रोत्साहन दिया जाएगा।

कुछ प्रमुख क्षेत्र

  • फूड प्रोसेसिंग, अक्षय ऊर्जा, आईटी और बीपीएम, सड़क और राजमार्ग, एविएशन (विमानन), चमड़ा, अंतरिक्ष, जैव प्रौद्योगिकी,
  • मीडिया और मनोरंजन, कपड़ा और वस्त्र, रसायन, खनन, थर्मल पावर, निर्माण, तेल और गैस, पर्यटन और हॉस्पिटेलिटी, रक्षा विनिर्माण, फार्मास्यूटिकल्स, कल्याण, इलेक्ट्रिकल मशीनरी, बंदरगाह, रेलवे।

वर्तमान स्थिति

गौरतलब है कि भारत की ‘मेक-इन इंडिया’ को शुरू हुए पांच साल बीतने के बावजूद विनिर्माता कंपनियों ने भारत में कारखाने लगाने में कोई ख़ास दिलचस्पी नहीं दिखाई है। मिसाल के तौर पर चीन से पलायन कर रही कंपनियां भारत में अपने पैर पसारने में उतनी दिलचस्पी नहीं दिखाई है, जितनी दिलचस्पी वे वियतनाम जैसे छोटे से देश में ले रही हैं। विदित हो कि प्रत्यक्ष विदेशी निवेश (एफडीआई) 2013-14 में 16 बिलियन डॉलर से बढ़कर 2015-16 में 36 बिलियन डॉलर हो गया है, लेकिन इस उल्लेखनीय उपलब्धि के बावजूद एफडीआई भारत के औद्योगिकीकरण में योगदान नहीं दे रहे हैं। विनिर्माण क्षेत्र में प्रत्यक्ष विदेशी निवेश, वास्तव में कम है। विदित हो कि 2017-18 में, यह 7 बिलियन डॉलर था जबकि 2014-15 में यह 9.6 बिलियन डॉलर था। इसके दूसरे तरफ सेवा क्षेत्रों में एफडीआई 23.5 बिलियन डॉलर के बराबर है, जो कि विनिर्माण क्षेत्र के तीन गुना से अधिक है। मेक इन इंडिया औद्योगिक धरातल पर सफल अपेक्षाकृत नहीं हो पाया इसको लेकर निम्न तर्क दिए जा रहे है।

पहला, भारती में एफडीआई का एक बड़ा हिस्सा मॉरीशस स्थित शेल कंपनियों से आता है, जिसपर विशेषज्ञों और भारतीय कर अधिकारियों को संदेह है कि कैसे मॉरीशस जैसे देश विकसित राष्ट्र की तुलना में भारत में एफडीआई का सबसे बड़ा स्रोत बना हुआ है। इनमें से अधिकांश निवेश भारत का काला धन ही होता है जो ‘राउंड ट्रिपिंग’ के माध्यम से पुनः भारत में आ जाता है।

  • दूसरा, भारतीय कारखानों की उत्पादकता कम है। मैकिन्से की एक रिपोर्ट के अनुसार, "भारत के विनिर्माण क्षेत्र के श्रमिक थाईलैंड और चीन के अपने समकक्षों की तुलना में औसतन लगभग चार और पाँच गुना कम उत्पादक हैं।" यह सिर्फ अपर्याप्त कौशल के कारण नहीं है, बल्कि इसलिए भी कि आधुनिक उपकरणों में निवेश करने और आपूर्ति शृंखलाओं को विकसित करने के लिए औद्योगिक इकाइयों का आकार बहुत छोटा है। इन असफलताओं के बावजूद भी ‘मेक इन इंडिया’ भारत के लिए महत्व रखता है।

मेक इन इंडिया भारत के लिए क्यों महत्वपूर्ण है?

  • बहुत ही थोड़े समय में सरकार ने पुराने ढांचे को नवीनतम ढांचे में बदल दिया है ताकि नवाचार और कौशल विकास को बढ़ाया जा सके। भारत ने अपनी ‘व्यापार करने में आसानी’ (Ease of doing business) की रैंकिंग को वर्तमान के 130 से सुधारने के लिए विश्व बैंक के साथ बैठकों का आयोजन करके विकास का सही ढांचा विकसित करने की दिशा में कई कदम उठाये हैं।
  • ‘मेक इन इंडिया’ के माध्यम से सरकार विभिन्न देशों की कंपनियों को भारत में कर छूट देकर अपना उद्योग भारत में ही लगाने के लिए प्रोत्साहित कर रही है ताकि यहाँ के बने उत्पादों को विश्व के किसी भी कोने में बेचा जा सके।
  • ‘मेक इन इंडिया’ अभियान में बढ़ोतरी से निर्यात और विनिर्माण में वृद्धि हो सकता है निर्यात में वृद्धि से अर्थव्यवस्था में सुधार होगा और भारत को मौजूदा प्रौद्योगिकी का उपयोग करके वैश्विक निवेश के माध्यम से विनिर्माण के वैश्विक हब में बदल दिया जाएगा। विनिर्माण क्षेत्र अभी भारत के सकल घरेलू उत्पाद में सिर्फ 16% का योगदान देता है और सरकार का लक्ष्य इसे 2020 तक 25% करना है।
  • भारत के इस अभियान में उन युवा प्रतिभाओं की मदद करने की बात भी कही गयी है जो कि नवाचार और उद्यमिता कौशल में निपुण हैं। ऐसे लोगों को सरकार मुद्रा योजना जैसे कार्यक्रमों के माध्यम से वित्तीय सहायता दे रही है जिससे कि देश में नयी स्टार्टअप कंपनियों का विकास हो सके जो कि आगे चलकर रोजगार सृजन में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकेंगे।
  • इस प्रोजेक्ट में कुल 25 क्षेत्रों के विकास पर ध्यान दिया जायेगा जिससे लगभग दस मिलियन लोगों को रोजगार मिलने की उम्मीद है। यदि इतने सारे लोगों को रोजगार मिलेगा तो अर्थव्यवस्था में कई और क्षेत्रों में वस्तुओं और सेवाओं की मांग भी बढ़ेगी जो कि कुल मिलाकर पूरी अर्थव्यवस्था को समृद्धि के मार्ग पर चलाकर चहुंमुऽी विकास को बढ़ावा देगा।
  • वर्तमान समय में ‘मेक इन इंडिया’ प्रोजेक्ट के चलते विदेशी रक्षा कंपनियां अपने कारखानों को भारत में स्थापित करने पर विचार कर रही हैं। इसी क्रम में हाल ही में रक्षा मंत्रालय ने भारतीय सेना के लिए 3,300 करोड़ रुपये से अधिक के रक्षा सौदों को मंजूरी दे दी है। इसके तहत मेड इन इंडिया एंटी-टैंक गाइडेड मिसाइलें Anti-Tank Missiles) शामिल हैं, जो दुश्मन के टैंकों को नेस्तनाबूत करने में सक्षम हैं।वही इससे पूर्व अगस्त 2015 में, हिंदुस्तान एयरोनॉटिक्स लिमिटेड (HAL) ‘मेक इन इंडिया’ कार्यक्रम के तहत सुखोई Su-30MKI लड़ाकू विमान के 332 पार्ट्स की तकनीक को भारत को स्थानांतरित करने के लिए रूस के इरकुट कॉर्प (Irkut Corp) कम्पनी से वार्ता शुरू की। भारत में रक्षा मंत्रालय फाइटिंग इन्फैंट्री कॉम्बोट वाहन (एफआईसीवी) के डिजाइन और निर्माण के लिए 600 अरब डॉलर (यूएस 9.3 बिलियन) अनुबंध की नीलामी कर रहा है।

मेक इन इंडिया की सफलता की सम्भावना

‘मेक इन इंडिया’ को शुरू हुए लगभग पाँच साल से ज्यादा समय हो गया है। यह अभियान लगातार आगे बढ़ता जा रहा है। हालाँकि हाल में इसकी खामियाँ सामने आयी है, बावजूद इसके अभियान का अगर सही रूप से क्रियान्वयन किया जाए तो इसके सफल होने की काफी गुंजाइश है, क्योंकि पिछले कुछ सालों में कई देशी-विदेशी कंपनियों ने ‘मेक इन इंडिया’ में दिलचस्पी दिखाई है। इससे देश के प्रत्यक्ष विदेशी निवेश में तो इजाफा हुआ ही है, रोजगार के अवसर भी बढ़े हैं।

  • जॉब प्लेसमेंट फर्मों का अनुमान है कि मैन्युफैक्चरिंग, इंजीनियरिंग और इनसे जुड़े सेक्टर्स में इनवेस्टमेंट बढ़ने से 2022 तक करीब 10 करोड़ नई नौकरियाँ बढ़ेगी।
  • मेक इन इंडिया अभियान में स्किल डेवलपमेंट पर काफी जोर दिया जा रहा है। 100 स्मार्ट सिटी बनाने की योजना से भी नौकरियों की संख्या बढ़ने का अनुमान है।
  • भारत दुनिया की सबसे तेजी से बढ़ती अर्थव्यवस्थाओं में शामिल होने वाला है और उम्मीद की जाती है कि वर्ष 2020 तक यह दुनिया का सबसे बड़ा उत्पादक देश भी बन जाएगा।
  • वहीं अनुमानतः अगले दो तीन दशकों तक यहां की जनसंख्या वृद्धि उद्योगों के अनुकूल हो जायेगी।
  • भारत में अन्य देशों के मुकाबले जनशक्ति पर कम लागत भी इसकी सफलता को सुनिश्चित करती है।
  • इसके अलावा भारत के व्यावसायिक घराने उत्तरदायित्वपूर्ण ढंग से, भरोसेमंद तरीकों से और व्यावसायिक रूप से काम कर रहे हैं।
  • भारत के घरेलू बाजार में उपभोक्तावाद प्रवृत्ति की हवा चल रही है जो विश्व के आकर्षण का केंद्र बना हुआ है।
  • भारत में तकनीकी और इंजीनियरिंग क्षमताएँ मौजूद हैं जिनके पीछे वैज्ञानिक और तकनीकी संस्थानों का हाथ है।
  • विदेशी निवेशकों के लिए भारत का बाजार खुला हुआ है और यह काफी अच्छी तरह से विनियमित भी है।
  • सार्वजनिक-निजी भागीदारी से संचालित पंडित दीनदयाल उपाध्याय योजना के तहत नए प्रशिक्षण कार्यक्रम के अंतर्गत देशभर में 1500 से 2000 तक प्रशिक्षण केन्द्र खोले जाने का कार्यक्रम चल रहा है।
  • इस परियोजना पर 2000 करोड़ रुपए खर्च आने का अनुमान है। सरकार ने हर साल लगभग तीन लाख लोगों को प्रशिक्षित करने का लक्ष्य रखा।

चुनौतियाँ

‘मेक इन इंडिया’ अभियान अपने आप में एक क्रांतिकारी विचार है लेकिन इसके मार्ग में कई चुनौतियाँ भी मौजूद हैं, जिस कारण अपेक्षित परिणाम नहीं दे पा रही है। इन चुनौतियों का जिक्र निम्न बिंदुओं के अंतर्गत किया जा सकता है-

  • ‘मेक इन इंडिया’ का सबसे प्रमुख उद्देश्य निर्यात और रोजगार को बढ़ावा देना है। लेकिन दोनों मसलों पर ये कार्यक्रम उम्मीदों के अनुरूप नहीं रहा।
  • ‘मेक इन इंडिया’ की सफलता के लिए सरकार ने कई प्रयास किए, लेकिन योजना का असर उस स्तर पर नहीं हुआ जितना सरकार ने दावा किया था।
  • विशेषज्ञों का कहना है कि सिर्फ मैन्युफैक्चरिंग और जीडीपी में वृद्धि दर से रोजगार पैदा करने में मदद नहीं मिलेगी। भारत सबसे तेज गति वाले अर्थव्यवस्थाओं में से एक है, लेकिन रोजगार सृजन उम्मीद के मुताबिक नहीं हुआ है। इसके लिए ग्रामीण अर्थव्यवस्था में भी रोजगार सृजन के तरीके खोजने होंगे और रोजगार बढ़ाने के दूसरे उपाय भी ढूंढने होंगे।
  • मेक इन इंडिया के रास्ते में सबसे बड़ा रोड़ा भारत में रेल-सड़क यातायात और अपर्याप्त बंदरगाह भी है। अगर भारत में निर्माण इकाइयां स्थापित की जाती हैं, तो उत्पाद को गंतव्य तक पहुँचाने के लिए जरूरी ट्रांसपोर्ट सुविधा का बंदोबस्त करना जरूरी हो जाता है।
  • वहीं भारत का एक बड़ा हिस्सा ऊर्जा की कमी से जूझ रहा है, जो निवेशकों के लिए चिंता का विषय बना हुआ है।
  • सभी राज्य निवेश चाहते हैं। लेकिन निवेश के रास्ते में एक बड़ी समस्या राज्यों और केंद्र की नीतियों की जटिलता है।
  • सरकारों का नौकरशाही नजरिया और बड़े पैमाने पर फैला भ्रष्टाचार भी एक समस्या है।
  • भ्रष्टाचार के अलावा भारत के सरकारी दफ्तरों की दूसरी सबसे बड़ी समस्या लाल फीताशाही है। दरअसल ‘मेक इन इंडिया’ निवेशक जटिल प्रक्रियाओं के जाल में फंसकर अपना समय गँवाना पसंद नहीं करेंगे। लिहाजा सरकार को ऐसी आसान व्यवस्थाएँ बनानी होंगी और ‘सिंगल विंडो सिस्टम्स’ पर जोर देना होगा।
  • भारत में पिछले कई वर्षों से टैक्स व्यवस्था में सुधार की मांग की जा रही है। अब तक टेलीकॉम से लेकर कई अन्य क्षेत्र की कंपनियां टैक्स संबंधी मामलों के सिलसिले में भारतीय अदालतों के चक्कर काट चुकी हैं। ऐसे में आसान और पारदर्शी टैक्स व्यवस्था की जरूरत है।
  • देश का श्रम कानून ‘मेक इन इंडिया’ अभियान के लिए सहायक साबित नहीं हो पा रहा है। विदित हो कि अनुबंध श्रम अधिनियम, 1970 के तहत कर्मचारी के नौकरी विवरण या कर्तव्यों में सरल बदलाव के लिए सरकार और कर्मचारी की मंजूरी की आवश्यकता होती है।
  • आसान व्यापार करने के सूचकांक’ में भारत का स्थान नीचे होना एक अन्य चुनौती बनी हुई है।
  • चीन के ‘मेक इन चाईना’ अभियान से भारत की प्रतिस्पर्द्धा चल रही है लेकिन विनिर्माण क्षेत्र में अभी भी चीन का वर्चस्व बना हुआ है।

आगे की राह

निष्कर्षतः कहा जा सकता है कि ‘मेक इन इंडिया’ एक क्रांतिकारी विचार है जिसने निवेश एवं नवाचार को बढ़ावा देने, बौद्धिक संपदा की रक्षा करने और देश में विश्व स्तरीय विनिर्माण बुनियादी ढांचे का निर्माण करने के लिए प्रमुख नई पहलों की शुरूआत की है। इस पहल ने भारत में कारोबार करने की पूरी प्रक्रिया को आसान बना दिया है। नयी डी-लाइसेंसिंग और ढील के उपायों से जटिलता को कम करने और समग्र प्रक्रिया में गति और पारदर्शिता काफी बढ़ी हैं।

अब जब व्यापार करने की बात आती है तो भारत काफी कुछ प्रदान करता है। अब यह ऐसे सभी निवेशकों के लिए आसान और पारदर्शी प्रणाली प्रदान करता है जो स्थिर अर्थव्यवस्था और आकर्षक व्यवसाय के अवसरों की तलाश कर रहे हैं। लेकिन इन उपलब्धियों के बावजूद जो चुनौतियाँ बनी हुई है उसको ध्यान में रखते हुए उसको नियंत्रित किया जाना भी जरूरी है। इसके लिए न सिर्फ सरकारी प्रयास काफी है बल्कि व्यक्तिगत स्तर पर भी प्रयासों की जरूरत है।

सामान्य अध्ययन प्रश्न पत्र-3

  • भारतीय अर्थव्यवस्था तथा योजना, संसाधनों को जुटाने, प्रगति, विकास तथा रोजगार से संबधित मुद्दे।
  • उदारीकरण का अर्थव्यवस्था पर प्रभाव, औद्योगिकी नीति में परिवर्तन तथा औद्योगिक विकास पर इनका प्रभाव।

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