कोरोना और समाज - यूपीएससी, आईएएस, सिविल सेवा और राज्य पीसीएस परीक्षाओं के लिए समसामयिकी


कोरोना और समाज - यूपीएससी, आईएएस, सिविल सेवा और राज्य पीसीएस  परीक्षाओं के लिए समसामयिकी


सन्दर्भ :-

कोरोना वायरस का भारतीय जन जीवन व समाज पर महत्वपूर्ण प्रभाव प्रदर्शित हो रहा है।

परिचय :-

महामारियों के इतिहास को देखने से पता चलता है कि जब कोई रोग दुनिया के बड़े फलक पर फैलता है तो वह न केवल लोगों के रहन-सहन को परी तरह बदल देता है, बल्कि व्यापार, राजनीति और अर्थव्यवस्थाओं के संचालन के तौरतरीकों पर भी नाटकीय असर डालता है। कोविड-19 नामक बीमारी यानी कोरोना वायरस के संक्रमण से समाज में आमूलचूल परिवर्तन होंगे जो निम्न हैं।

सामान्य जीवन व दिनचर्या :-

वह सामान्य मानव व्यवहार और हमारी दिनचर्या है। आज यह एक सामान्य मानव व्यवहार है कि लोग अपने घर-परिवार, मित्रों, सहयोगियों और सहयात्रियों के साथ ऐसी दूरी न बरतें, जैसे वे दूसरे ग्रह से आए हों। यानी जरूरत पड़ने पर उनसे हाथ मिलाएं, कोई अवसर हो तो उनसे गले मिलें। सामूहिक आयोजनों में, जैसे जन्मदिवश या प्रमोशन की पार्टी, शादी-ब्याह और अन्य सार्वजनिक समारोहों में बढ़-चढ़कर हिस्सा लें। कोरोना के आक्रामक संक्रमण के उपरांत यह आवश्यक हो गया है कि जहां तक संभव हो, कथित तौर पर इन सभी सामान्य दिनचर्याओं में तुरंत आवश्यक परिवर्तन लाया जाए। अब तो ऐसी सलाह भी दी जा रही हैं कि यदि सार्वजनिक स्थानों पर आपका व्यवहार मित्रवत न होकर थोड़ा शत्रुतापूर्ण भी है तो इस संक्रमणकालीन दौर में उसे एक सामान्य व्यवहार माना जाए। यही नहीं, संक्रामक रोग से पीड़ित रोगी से दूरी बनाने के मामले में अब यदि कोई कटुतापूर्ण व्यवहार करता दिखे तो आश्चर्य नहीं होगा। कुछ घटनाओं के कारण अभी ही ऐसे हालात बन रहे हैं कि विदेश से लौटे अपने ही पड़ोसियों और विमान सेवाओं के संचालन में लगे कर्मचारियों आदि को लेकर ऐसा सख्त रुख लोग दर्शा रहे हैं, मानो उन्होंने ऐसा करके कोई गलती कर दी है। इसी तरह मुंह पर मास्क पहनने, समय समय पर हाथ धोने की हिदायतें तो हालाँकि इसके पूर्व भी दी जा चुकी हैं , परन्तु कोरोना के उपरांत दुनिया में इन सावधानियों पर लोग ज्यादा हैं। ऐसा पाया गया है कि सामान्य खांसी जुकाम की अनदेखी के कारण कई बार बीमारियां अराजक रूप ले लेती हैं अतः संभव है की इस विषय में भी सुधार हो।

शहरीकरण पर प्रश्न चिह्न

  • उद्योगीकरण के बाद की दुनिया का सबसे ज्यादा फोकस इस बात पर रहा है कि कैसे लोगों के रहन-सहन का स्तर बढ़ाया जाए और उन सुख-सुविधाओं का प्रबंध किया जाए जिनसे प्रकृति की मार से परेशान रहने वाला इंसान अपने घरों में सुविधाजनक ढंग से रह सके। इन ज्यादातर प्रबंधों ने मनुष्य को प्रकृति से दूर कर दिया। इसी से वह शहरीकरण उपजा जिसकी बदौलत आज दुनिया की आधी से ज्यादा जनसंख्या शहरों में आबाद हो गई। शहरों में निवास की अपनी शर्ते हैं। यहां रहने को जमीन की कमी होने लगी तो ऊंची इमारतों में फ्लैट संस्कृति पनप गई।
  • इस महानगरीय संस्कृति को कोरोना के संक्रमण ने सबसे ज्यादा प्रभावित किया है। देश-दुनिया से आए आंकड़ों से स्पष्ट है कि इस बीमारी के लगभग सभी मरीज शहरी हैं। वे विदेश यात्राएं करके अपने शहर लौटे थे, जिनसे दूसरे शहरियों को यह संक्रमण हो गया। लॉकडाउन करने की घोषणाओं पर अपने मूल स्थानों की ओर ट्रेनों से लौटने वालों में से ज्यादातर शहरों का कामगार तबका है जो जान बचाने के लिए गांव-देहात कूच करना चाहता है। अजीब विडंबना है कि जो शहर रोजगार, सुख-सुविधाओं और विकास का केंद्र माने जाते हैं, आज एक ही झटके में सबसे बड़ा खतरा बन गए हैं। सिर्फ चीन का वुहान शहर ही नहीं (जहां से कोरोना का संक्रमण फूटकर बाहर निकला है), बल्कि दुनिया का हर वह शहर आज समस्या की नींव बनता नजर आ रहा है कि जहां इस ग्लोबल होती दुनिया के दूसरे शहरों और देशों से लोगों का आना-जाना लगा रहता है। बहुत मुमकिन है कि विकास और ताकत के प्रतीक बन गए शहरीकरण की ऐसी दर्गति देखकर योजनाकार भाव शहरों की कोई नई रूपरेखा प्रस्तुत करें, जिसमें सिर्फ सहूलियतों का प्रबंध नहीं किया जाएगा, बल्कि एक झटके में लोग संक्रामक बीमारियों की चपेट में न आ जाएं-इसकी व्यवस्था भी बनाई जाएगी।

विज्ञान व पर्यावरण:-

  • कोरोना की वैश्विक आपदा को लेकर एक नजरिया यह भी बना है कि चूंकि सरकारों से लेकर आम समाज तक ने वैज्ञानिकों और पर्यावरणविदों की चेतावनियों पर ध्यान देना बंद कर दिया है, इसलिए प्रकृति अपने हिसाब से बदला ले रही है।
  • पेरिस क्लाइमेट कवेंशन जैसे समझौतों पर राष्ट्र हित थोपने की प्रवृत्ति मानवता हेतु संकट बन चुकी है। यह कोई सामान्य आरोप नहीं है। बीते 50 वर्षों में ही सार्स, इबोला, स्वाइन फ्लू, बर्ड फ्लू, डेंगू, इंसेफेलाइटिस, एड्स आदि तमाम बीमारियों के प्रसार के अलावा ग्लोबल वॉर्मिंग जैसी समस्याओं ने इस धरती और इस पर बसे इंसान के जीवन की मुश्किलें बढ़ाई हैं।
  • बाढ़, सूखे, भूकंप जैसी प्राकृतिक आपदाओं की आवृत्ति बढ़ी है और उनकी ताकत में भी इजाफा हुआ है। तापमान बढ़ने से ध्रुवों के अलावा ग्लेशियरों के पिघलने की प्रक्रिया तेज हुई है। पता चल रहा है कि कार्बन डाईऑक्साइड आदि ग्रीनहाउस गैसों के उत्सर्जन में लगातार बढ़ोतरी के कारण जैसे-जैसे ग्लोबल वॉर्मिंग का असर बढ़ेगा, सूखे-बाढ़-तूफान की बारंबारता में तेजी आएगी, ग्लेशियर पिघलेंगे, समुद्र का जलस्तर उठेगा और ऊष्ण कटिबंधीय बीमारियों में इजाफा होगा। तापमान में यह उतार-चढ़ाव खेती पर भी असर डालेगा, जिससे दुनिया में 40 करोड़ लोग भुखमरी की चौखट पर पहुंच सकते हैं।
  • विश्व बैंक के पूर्व मुख्य अर्थशास्त्री निकोलस स्टेन __कहते हैं कि यदि ग्लोबल वॉर्मिंग से निपटने में और देरी की गई तो आगे चलकर हमें इस विलंब की 20 गुना ज्यादा कीमत देनी पड़ सकती है। बेकाबू होते हालात से साफ है कि प्रकृति के संकेतों को लेकर अब और ज्यादा हीलाहवाली नहीं की जा सकती। इस पूरे घटाटोप अंधकार में रोशनी की एक किरण इस रूप में बाकी है कि अब दुनिया के पास ग्रीनहाउस गैसों के उत्सर्जन को नियंत्रित करने की टेक्नोलॉजी है, लेकिन इसके इस्तेमाल और उत्सर्जन में कटौती के समझौतों से बाहर रहने की जिद के चलते जीवन ही हर वक्त संकट में पड़ा रहता है।
  • इन्हीं वजहों से कई बार छोटी सी बीमारी के महामारी में बदल जाने का खतरा बन जाता है। कोरोना प्रकरण से हो सकता है कि विज्ञान की इन चेतावनियों को अब अमेरिका समेत पूरा विश्व गंभीरता से ले और इन हालातों को बदलने के संकल्पों पर खरा उतरने की कोशिश करे।

स्वास्थय तैयारियां

  • संक्रमण के रूप में नई आपदा से जूझ रही दुनिया का संकट इसलिए भी ज्यादा बढ़ा दिखाई देता है, क्योंकि भारत जैसे आबादीबहुल देशों में न तो पर्याप्त चिकित्सा सुविधाएं हैं और न ही सरकारें नागरिकों की सेहत पर ज्यादा खर्च करती हैं। कोरोना से पैदा मुश्किलें बढ़ी तो पता चला कि देश के 1.3 अरब आबादी के लिए हमारे पास सिर्फ 40 हजार वेंटिलेटर हैं, जबकि हमसे बहुत कम आबादी वाले महाशक्ति देश अमेरिका में वेंटिलेटर की संख्या एक लाख 70 हजार है। यह फर्क ही साफ करता है कि क्यों हमारे देश को 21 दिनों तक लॉकडाउन करने की जरूरत पड़ रही है।
  • यदि लॉकडाउन का उपाय नहीं आजमाया गया और लोगों की सामान्य दिनचर्या जारी रही तो ऐसे में संक्रमित होने वाली भारी आबादी के इलाज की व्यवस्था हमारे पास नहीं है।
  • इसके अतिरिक्त पिछले 10-12 वर्षों में इलाज की लागत 300 फीसद तक बढ़ गई है और ज्यादातर परिवार इलाज खर्च का 60 से 80 फीसद हिस्सा बीमा से बाहर अपनी आय से देते हैं और इसमें कई बार उनकी आर्थिक स्थिति बद से बदतर हो जाती है। अभी तक देश के हेल्थ सेक्टर में सरकारें कोई ज्यादा योगदान नहीं करती रही हैं।
  • साथ ही देश के सरकारी स्वास्थ्य क्षेत्र में कम घपले नहीं हैं, यह बात एनआरएचएम जैसे घोटालों से साबित हो चुकी है। जरूरी दवाओं की कीमत पर समुचित नियंत्रण नहीं होने के कारण आम लोगों को अपनी सेहत की फिक्र करना भारी पड़ता जा रहा है।
  • सरकारी अस्पतालों में भर्ती आम मरीजों को लिखी जाने वाली दवाओं के बारे में आंकड़ा यह है कि फिलहाल सिर्फ 9 फीसद दवाएं ही अस्पतालों से दी जाती हैं, बाकी सारी दवाएं उन्हें बाहर से मंगानी पड़ती हैं। ये सारे तथ्य और आंकड़े साबित कर रहे हैं कि अगर कोरोना मामले से हमारी सरकारों ने कोई ठोस सबक लिया और स्वास्थ्य क्षेत्र में पर्याप्त सुधार किए तो कोई संक्रमण बदहवासी का ऐसा आलम नहीं पैदा करेगा, जैसा कि आज है।

वैश्वीकरण :-

  • कहीं न कहीं यह कोरोना का प्रभाव वैश्वीकरण की प्रवृत्ति को कम करेगा। क्योंकि विश्व में हुए मोबिलाइजेशन से ही यह वायरस चीन से विभिन्न देशों में पंहुचा है।

सामान्य अध्ययन प्रश्न पत्र- 1

  • भारतीय समाज

मुख्य परीक्षा प्रश्न :

  • कोरोना जैसी महामारियां समाज में अत्यंत महत्वपूर्ण परिवर्तन का सूचक होती हैं ? क्या आप कथन से सहमत हैं ? अपने उत्तर के पक्ष में तर्क प्रस्तुत करें ?


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