महात्मा गाँधी की 150वीं जयंती: राष्ट्रपिता आज भी प्रासंगिक - यूपीएससी, आईएएस, सिविल सेवा और राज्य पीसीएस परीक्षाओं के लिए समसामयिकी


महात्मा गाँधी की 150वीं जयंती: राष्ट्रपिता आज भी प्रासंगिक - यूपीएससी, आईएएस, सिविल सेवा और राज्य पीसीएस  परीक्षाओं के लिए समसामयिकी


चर्चा का कारण

2 अक्टूबर को महात्मा गाँधी की भारत एवं पूरे विश्व में 150वीं जयंती मनाई गई। इसके अलावा गाँधी शांति प्रतिष्ठान, राष्ट्रीय गाँधी संग्रहालय और कस्तूरबा गाँधी स्मृति ट्रस्ट की पहल पर लोक शक्ति में जागरुकता फैलाने के मकसद से संस्थाओं और लोगों को जोड़कर गाँधी जी के विचारों को उनकी ही रणनीति से जन-जन तक पहुँचाने की कोशिश की जा रही है।

परिचय

महात्मा गाँधी का जन्म 2 अक्टूबर, 1869 को गुजरात राज्य के पोरबंदर में हुआ था। इनके पिता का नाम करमचन्द गाँधी था जो पोरबंदर के ‘दीवान’ थे। इनकी माता पुतलीबाई एक धार्मिक महिला थीं। गाँधी जी के जीवन पर उनकी माता का बहुत अधिक प्रभाव था। गाँधी जी का विवाह 13 वर्ष की उम्र में ही हो गया था और इनकी पत्नी का नाम कस्तूरबा था। गाँधी जी ने नवम्बर, 1887 में मैट्रिक की परीक्षा उत्तीर्ण की और जनवरी, 1888 में उन्होंने भावनगर के सामलदास कॉलेज में दाखिला लिया। इसके बाद उन्होंने लंदन से बैरिस्टर की डिग्री हासिल की।

वर्तमान समय में गाँधी की प्रासंगिकता

महात्मा गाँधी के विचार केवल गाँधी युग तक ही प्रासंगिक नहीं थे अपितु उनके विचारों की प्रासंगिकता वर्तमान परिप्रेक्ष्य में और बढ़ जाती है। आज समाज में हिंसा, लूट-पाट, हत्या, बलात्कार जैसी आपराधिक प्रवृत्तियाँ बढ़ रही हैं। मानव इतना स्वार्थी हो गया है कि वह पराए तो क्या अपने संबंधियों की भावनाओं को भी ठेस पहुँचाने में संकोच नहीं कर रहा है। ऐसे में गाँधीजी के विचारों का आलोक ही हमें उचित मार्ग-दर्शन और प्रेरणा दे सकता है, जिसे निम्न शीर्षकों के अंतर्गत समझा जा सकता है-

राजनीति के क्षेत्र में: वर्तमान राजनीति में भ्रष्टाचार, अपराध और अनैतिकता का साम्राज्य चारों ओर व्याप्त है। इसके अलावा नेताओं की छवि धूमिल हुई है और सामान्य जनता का राजनीति एवं राजनीतिक व्यक्तित्व से मोह भंग हुआ है। आज नेता केवल सत्ता और वोटों की राजनीति करते हैं। इसके लिये वे साम, दाम, दण्ड, भेद सभी का प्रयोग करते हैं।

गौरतलब है कि दुनिया की राजनीति में संभवतः महात्मा गाँधी ही एक ऐसे अपवाद रहे हैं, जो आजादी के कर्त्ता-धर्त्ता होकर भी आजादी के बाद भी सत्ता से दूर रहे। भारत के साथ-साथ दुनिया के जिन राष्ट्रों में स्वतंत्रता का आगाज हुआ वहाँ सबसे महत्वपूर्ण बात यह रही कि आजादी की लड़ाई का नेतृत्व करने वाले बाद में सत्ता में भी शामिल हुए। कुछ तो जीवित रहने तक सत्ता के प्रमुख बने रहे। रूस में लेनिन, तुर्की में मुस्तफा कमालपाशा, पाकिस्तान के निर्माता मुहम्मद अली जिन्ना, मिस्र में अब्दुल नासिर, चीन में माओ तथा चाऊ एन लाई, बर्मा में जनरल यांग सन, श्रीलंका में भंडार नायके और बांग्लादेश में मुजीबुर्रहमान जैसे कई उदाहरण हैं।

आज महात्मा गाँधी से प्रेरणा लेने वाले नेताओं में मार्टिन लूथर किंग जूनियर, दलाई लामा और डेसमंड टूटू जैसे नेता शामिल हैं। इसके अलावा नेल्सन मंडेला, आन सान सू की और अमेरिकी राष्ट्रपति बराक ओबामा भी उनसे प्रभावित हुए बिना नहीं रह सके हैं।

सामाजिक क्षेत्र में: समाज में व्याप्त घृणा, आतंक, प्रतिरोध के वातावरण में गाँधी के विचारों का महत्त्व और अधिक बढ़ जाता है। आज पूरा विश्व शरणार्थियों की समस्या, धार्मिक टकराव, सांप्रदायिकता, कट्टरता जैसे- ISIS द्वारा फैलाया गया हिंसा आदि से ग्रसित हो गया है। एक भीड़ को धार्मिक उन्माद का रूप दे देना अत्यंत सरल हो गया है जिसके चलते मॉब लीचिंग जैसी घटनाएँ बढ़ी हैं। इसके अतिरिक्त मानव संवेदना तथा भावना शून्य होते जा रहे हैं जिसके कारण एक वर्ग को दूसरे के प्रति भड़काना आसान हो गया है। इन सारी समस्याओं का कारगर इलाज गाँधीवाद सिद्धांतों से ही संभव हो सकता है।

गाँधी जी के अनुसार सांप्रदायिक सद्भावना कायम करने के लिये सभी धर्मों, विचारधाराओं को साथ लेकर चलने की जरूरत है। गाँधी जी ने कहा था कि ‘मैं ऐसे भारत के निर्माण के लिए सतत् प्रयत्नशील रहूँगा जिसमें सभी संप्रदायों का मेल-जोल होगा।य् वर्तमान में भारतीय संविधान और भारत सरकार की नीतियाँ स्वयं ही गाँधी जी के विचारों की प्रमाणिकता को सिद्ध करती है कि वे कितने प्रासंगिक हैं। आवश्यकता उनके इस सिद्धांत को व्यक्तिगत स्तर पर अपनाने की है।

आज के परिप्रेक्ष्य में महिलाओं के साथ असमानता और हिंसा की घटनाएँ कम होने की जगह बढ़ गई हैं। नेशनल क्राइम रिकॉर्ड ब्यूरो के आंकड़ों के मुताबिक बलात्कार के मामलों में वर्ष 2012 के मुकाबले वर्ष 2016 में बढ़ोत्तरी हुई है। साल 2012 में जहां बच्चियों के साथ बलात्कार के 8,541 मामले सामने आए वहीं 2016 में 19,765 मामले आए। ये आंकड़े पहले के मुकाबले दोगुने हो गए हैं।

वहीं दूसरी तरफ उनके साथ लैंगिक भेदभाव भी समाज में बढ़ा है। महात्मा गाँधी नारी स्वतंत्रता के समर्थक थे। संभवतः इसीलिए उन्हें स्वतंत्रता संग्राम में नारी सहभागिता को महत्वपूर्ण माना और उन्हें घर की चार दीवारी से निकालकर उपयुक्त वातावरण प्रदान किया। उन्होंने देश की नारी शक्ति को स्वतंत्रता आंदोलन की शक्ति बनाया और उस शक्ति का उपयोग सामाजिक सुधारों को क्रियान्वयन करने में किया। परंतु अभी तक मानसिक रूप से गाँधी जी के विचारों को हम अपने जीवन में लागू नहीं कर पाये हैं जिसको अपनाने की जरूरत है।

स्वच्छता के क्षेत्र में: जन सरोकारों से जुड़े लगभग हर संबोधन में गाँधी जी स्वच्छता के मामले को उठाते थे। उनका मानना था कि नगरपालिका का सबसे महत्वपूर्ण कार्य सफाई की व्यवस्था करना है। वे स्वच्छता को ईश्वर की भक्ति के बराबर मानते थे। वे चाहते थे कि भारत के सभी नागरिक एक साथ मिलकर देश को स्वच्छ बनाने के लिए कार्य करें। उल्लेखनीय है कि वर्तमान सरकार गाँधीवादी दर्शन से प्रभावित होकर स्वच्छ भारत अभियान चला रही है। इस अभियान के अंतर्गत 2 अक्टूबर 2019 तक ‘स्वच्छ भारत’ की परिकल्पना को साकार करने का लक्ष्य निर्धारित किया गया। उल्लेखनीय है कि इस मिशन के अंतर्गत अब तक देश में करीब 9 करोड़ शौचालय बनाए गए हैं। आंकड़ों के अनुसार 36 राज्यों और संघ शासित प्रदेशों में अब तक 27 राज्य खुले में शौच से मुक्त हो चुके हैं। समय आ गया है कि देश का प्रत्येक नागरिक गाँधी के स्वच्छ भारत के सपने को साकार करने के लिये कदम से कदम मिलाकर चले।

मद्य-निषेधः आज मद्य-निषेद के क्षेत्र में आंध्रप्रदेश, गुजरात, बिहार, राजस्थान व देश के अन्य क्षेत्रें में जो अभियान चलाया जा रहा है, वह गाँधी दर्शन की प्रासंगिकता को सिद्ध कर रहा है, आज घर की स्त्रियाँ स्वयं इस अभियान में सक्रिय भूमिका निभाकर न केवल अपने परिवार व समाज का हित कर रही हैं अपितु देश के विकास में भी योगदान दे रही हैं।

आर्थिक क्षेत्र में: गाँधी जी आर्थिक विकेन्द्रीकरण के पक्षधर थे। दरअसल इससे संसाधनों का केन्द्रीकरण होने की संभावना कम होती है। हाल ही में ‘वर्ल्ड इनिक्वेलिटी लैब- 2018 द्वारा जारी रिपोर्ट के अनुसार विश्व के 0.1% लोगों के पास दुनिया की कुल दौलत का 13% हिस्सा है। इसके अलावा पिछले 36 वर्षों में जो नई संपत्तियाँ सृजित की गईं, उनमें से भी 27% पर सिर्फ 1% अमीरों का ही अधिकार है।

संपूर्ण विश्व में व्याप्त असमानता की गंभीरता का अंदाजा इस बात से भी लगाया जा सकता है कि आय की सर्वोच्च श्रेणी में गिने जाने वाले शीर्ष 1% लोगों की कुल संख्या महज 7.5 करोड़ है, जबकि सबसे नीचे के 50% लोगों की कुल संख्या 3.7 अरब है। उपर्युक्त हालातों को देखते हुए गाँधीवादी अर्थव्यवस्था को आगे बढ़ाने की जरूरत है अर्थात् धन का संचय न हो एवं उसका लाभ आम जन तक पहुँचे। इस तरह के आर्थिक समानता वाले दर्शन को अपनाने की जरूरत है। विदित हो कि भारतीय संविधान में इस दर्शन को अनुच्छेद 39(ख), व 39(ग) में अपनाया गया है।

गाँधी के विचार इस दृष्टि से भी प्रासंगिक हो जाते हैं कि उन्होंने मशीनों की जगह मानवीय श्रम पर बल दिया। उनके अनुसार मशीन वहाँ उपयुक्त है जहाँ काम अधिक होता है परंतु भारत एक ऐसा देश है जहाँ जनसंख्या अधिक है और कार्य के अवसर कम हैं। वर्तमान परिप्रेक्ष्य में देखा जाए तो वे आज के आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस का विरोध करते हुए इसे रोजगार के लिए घातक मानते थे। इसके अतिरिक्त उन्होंने एक मजबूत व्यवस्था के लिए छोटे उद्योगों को बढ़ावा देने और स्वदेशी वस्तुओं की मांग को प्रोत्साहन देने पर बल दिया चूँकि जब तक छोटे व मझोले उद्योग मजबूत नहीं होंगे तब तक देश का विकास संभव नहीं हो सकता है।

शिक्षा क्षेत्रः आधुनिक भारत के निर्माण में महात्मा गाँधी का बहुआयामी योगदान रहा है। गाँधीजी की शिक्षा संबंधी विचारधारा उनके नैतिकता तथा स्वावलंबन संबंधी सिद्धांतों पर आधारित थी। ‘हरिजन’ पत्रिका तथा ‘वर्धा शिक्षा’ योजना में निहित उनके विचारों के माध्यम से इसे देखा जा सकता है।

वर्तमान में शिक्षा का मुख्य उद्देश्य रोजगार प्राप्त करना हो गया है। हम केवल व्यावसायिक शिक्षा को ही महत्त्व दे रहे हैं जिसका परिणाम यह हुआ कि नैतिक मूल्यों में गिरावट आयी है और आज का युवा वर्ग नैतिक रूप से कमजोर होता जा रहा है। परिवार बिखरने लगे हैं, राष्ट्र के प्रति तथा उसकी संस्थाओं के प्रति सम्मान में कमी आने लगी है।

ऐसे में व्यावसायिक शिक्षा के साथ-साथ नैतिक शिक्षा भी दी जानी चाहिए, जिससे कि आज का युवा वर्ग राष्ट्र, समाज एवं परिवार में अपना महत्वपूर्ण योगदान दे सके। अतः आज गाँधी के विचारों पर चलने की नितांत आवश्यकता है।

आधुनिकता को लेकरः गाँधीजी की नजर में आधुनिकता का मतलब गलाकाट स्पर्धा से नहीं था। एक बार एक ब्रिटिश पत्रकार ने महात्मा गाँधी से पूछा था कि आधुनिक सभ्यता पर आपकी सोच क्या है? गाँधी का जवाब था, मेरी नजर में यह एक अच्छा विचार है। इस सोच के साथ गाँधीजी ने पश्चिमी देशों के प्रति कभी द्वेष भाव नहीं रखा। उन्होंने अपने आदर्श के रूप में हेनरी सॉल्ट, जॉन रस्किन और लिओ टाल्सटॉय का कई बार जिक्र भी किया।

गाँधीवाद की एक अन्य विशेषता है कि वह विरोधाभासों को भी अपने में समेट लेते हैं जिससे अनेकता में एकता को बल मिलता है। गाँधी दर्शन के मूल में सत्य, अहिंसा, अस्तेय, अपरिग्रह, श्रम और नैतिकता मिलेगी। आज के परिप्रेक्ष्य में इन सिद्धांतों को अपनाकर स्वावलंबन, स्वदेशी, विकेंद्रीकरण, ट्रस्टीशिप, सहअस्तित्व, शोषणमुक्त व्यवस्था और सहयोग, सहभाव एवं समानता पर आधारित आधुनिक जागृति समाज का ढाँचा तैयार किया जा सकता है।

युवाओं का मार्गदर्शनः आज के युवा को अपने निजी और सामाजिक जीवन में तरह-तरह की चुनौतियों का सामना करना पड़ता है। चौतरफा अवसरवाद और भ्रष्टाचार को देखकर युवाओं को लगता है कि सत्य और कठोर परिश्रम अपने आप में सफलता के लिए अपर्याप्त हैं। ऐसे में गाँधी अपने कर्तव्यों के प्रति विमुख ऐसी युवा पीढ़ी को सजगता और भोग की बजाय सादगी में संतोष और आनंद का रास्ता दिखाते हैं। युवकों को यह समझना और जानना चाहिए कि स्वार्थ और भोग को महत्ता देने वाला जीवन समाज से ही नहीं, बल्कि हमें अपने तक से दूर कर देता है। दूसरी तरफ, यदि हम अपने क र्त्तव्यों के प्रति सजग रहें और सादगी को जीवन-यात्र का आधार बनाएं, तो चरित्रहीनता, स्वार्थ और भ्रष्टाचार जैसे खतरे अपने आप हमारा पीछा छोड देंगे।

विश्व शांति के क्षेत्र में: आज जबकि विश्व के लगभग सभी देश अशांति से जूझ रहे हैं। साथ ही, परमाणु तथा जैविक हथियारों का संभावित प्रयोग मानवता के लिए खतरा बन गया है। विज्ञान के प्रयोग ने हमारे जीवन को सुखमय अवश्य बनाया है परंतु इसके ऋणात्मक प्रभाव को भी नकारा नहीं जा सकता है। मानव समाज भौतिक सुखों के पीछे भाग रहा है और आत्मिक सुखों की अनदेखी कर रहा है। यही कारण है कि उन्नति व प्रगति के कारण भी समाज में तथा मानव जीवन में रिक्तता का अनुभव हो रहा है। यह रिक्तता तभी पूर्ण हो सकती है, जब मानव स्वयं इस पर चिंतन मनन करें और यह चिंतन आशावादी आत्मिक सुखों की दिशा में होना चाहिए। इस संदर्भ में गाँधी जी के नैतिक सिद्धांत काफी कारगर हो सकते हैं। गाँधी जी का मानना था कि केवल मानसिक, शारीरिक और भौतिक दृष्टि से ही विकास करना पर्याप्त नहीं, बल्कि इसके स्थान पर दया, प्रेम, सेवा और जीवन के नैतिक मूल्यों को महत्व देना चाहिए ताकि व्यक्ति का सर्वांगीण विकास हो सके और विश्व में शांति और सद्भाव बढ़ सके। उनका अटल विश्वास था कि जिस राष्ट्र का आधार शांति होता है उसी के पास विश्व में शांति स्थापित करने की शक्ति भी हो सकती है। गाँधी जी द्वारा संचालित आंदोलन स्वयं ही विश्व शांति के क्षेत्र में एक बड़ा अभूतपूर्व कदम था। उन्होंने अपने जीवन काल में कभी भी ब्रिटिश साम्राज्य के लिए हिंसा के प्रयोग को उचित नहीं माना और हृदय परिवर्तन पर बल दिया।

अंतर-धार्मिक और अंतर-जातीय विवाहः भारत का समाज आज भी अंतर-जातीय और अंतर-धार्मिक विवाह करने वालों को स्वीकार नहीं कर पाता है। दरअसल जाति और संप्रदायों के अलग-अलग बाड़े में बंद होकर जीने वाला समाज मानवता के एक होने के आदर्श और निश्छल प्रेम को भी एक संकीर्ण, सांप्रदायिक और जातिवादी नजरिए से देखने का अभ्यस्त हो चुका है। इस संदर्भ में गाँधी जी जानते थे कि जाति और संप्रदाय की ये मनोग्रंथियां भारत के एकजुट और सभ्य होने में सबसे अधिक बाधक हैं।

अपने शुरूआती दिनों में अंतर-जातीय विवाह का विरोध करने वाले गाँधी ने बाद में इतना तक प्रण कर लिया था कि वह ऐसी किसी शादी में शामिल नहीं होंगे जिनमें लड़का या लड़की में से कोई एक दलित न हो। वह ऐसी शादियों का आयोजन अपने आश्रम तक में करवाते थे। 8 मार्च, 1942 के ‘हरिजन’ में गाँधी लिखते हैं, जैसे-जैसे समय बीतता जाएगा, इस तरह के विवाह बढ़ेंगे, और उनसे समाज को फायदा ही होगा। फिलहाल तो हमलोगों में आपसी सहिष्णुता का अपेक्षाकृत अभाव ही है लेकिन जब सहिष्णुता बढ़कर सर्व धर्म-समभाव में बदल जाएगी, तो ऐसे विवाहों का स्वागत किया जाएगा और इससे गाँधी जी के विचारों को आज भी प्रासंगिक माना जाएगा। गाँधी जी ये सब अपने लंबे व्यावहारिक अनुभवों से जानते थे, उन्होंने जीवन-भर इन्हीं सबके खिलाफ तो संघर्ष किया था। गाँधीजी को याद करने का मतलब है उनके इन विचारों की रोशनी में समाज और राजनीति को देखना और बदलना।

निष्कर्ष

निष्कर्षतः कहा जा सकता है कि महात्मा गाँधी 20वीं शताब्दी के दुनिया के बडे़ राजनीतिक नेताओं में से एक थे। वे पूरी दुनिया में शांति, प्रेम, अहिंसा, सत्य, ईमानदारी, मौलिक शुद्धता जैसे हथियारों के सफल प्रयोगकर्त्ता के रूप में याद किये जाते हैं। इन्हीं हथियारों के बल पर उन्होंने भारत को आजाद कराने में मुख्य भूमिका निभाई। आज दुनिया के किसी भी देश में जब कोई शांति मार्च निकालता है या अत्याचार व हिंसा का विरोध किया जाता है, तो ऐसे सभी अवसरों पर पूरी दुनिया को गाँधी याद आते हैं। गाँधी जी ने स्वयं कहा था कि ‘‘गाँधी मर सकता है पर गाँधीवाद कभी नहीं मर सकता’’, जो वर्तमान परिप्रेक्ष्य में सही साबित होता दिख रहा है।

सामान्य अध्ययन प्रश्न पत्र-4

  • भारत तथा विश्व के नैतिक विचारकों तथा दार्शनिकों के योगदान।

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