राष्ट्रीय लोक अदालत (National Lok Adalat) : डेली करेंट अफेयर्स

राष्ट्रीय लोक अदालत (National Lok Adalat)

चर्चा में क्यों?

  • वर्ष 2020 में वर्चुअल और प्रत्यक्ष रूप (Virtual And Physical Mode) में आयोजित की राष्ट्रीय लोक अदालत(National Lok Adalat) के जरिये 10 लाख से अधिक मामले निपटाए गए हैं।

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प्रमुख बिन्दु

  • राष्ट्रीय विधिक सेवा प्राधिकरण(National Legal Services Authority) के तत्वावधान में वर्ष 2020 की अंतिम राष्ट्रीय लोक अदालत का 12 दिसम्‍बर, 2020 को वर्चुअल और प्रत्यक्ष रूप में आयोजन किया गया। कोविड-19 महामारी को देखते हुए दिनभर चलने वाली इस लोक अदालत के आयोजन के दौरान सभी एसएलएसए(State Legal Services Authority- SLSAs) और डीएलएसए(District Legal Services Authority- DLSAs) ने आवश्‍यक सुरक्षा प्रोटोकॉल का कड़ाई से अनुपालन किया गया।
  • राष्ट्रीय लोक अदालत आयोजित करने के लिए 31 एसएलएसए द्वारा कुल मिलाकर 8152 खंडपीठों का गठन किया गया था। इस लोक अदालत में 10,42,816 मामलों का सफलतापूर्वक निपटान किया गया। निपटान किए गए मामलों में कुल 5,60,310 मामले प्री-लिटिगेशन(pre-litigation) चरण के थे और 4,82,506 मामले ऐसे थे जो विभिन्‍न न्‍यायालयों में लंबित थे।
  • एनएएलएसए पोर्टल(NALSA portal) पर राज्यों द्वारा उपलब्‍ध किए गए विवरण के अनुसार कुल निपटान राशि लगभग 3227.99 करोड़ रुपये थी।
  • उपरोक्‍त राष्ट्रीय लोक अदालत में श्रम विवाद, धन वसूली, भूमि अधिग्रहण, वैवाहिक विवाद (तलाक को छोड़कर), वेतन, भत्तों और सेवानिवृत्ति आदि से संबंधित मामलों की सुनवाई की गई।

क्या होते है लोक अदालत (Lok Adalat)?

  • राष्ट्रीय विधिक सेवा प्राधिकरण (National Legal Services Authority-NALSA) द्वारा आयोजित लोक अदालत, विवादों का निपटान करने का एक वैकल्पिक तरीका है(Alternative Method Of Dispute Resolution)।
  • यह एक ऐसा मंच है, जहां न्‍यायालयों में लंबित वाद-विवाद/मुकदमे या प्री-लिटिगेशन चरण के मामलों का सौहार्दपूर्ण निपटारा किया जाता है।
  • लोक अदालतों को विधिक सेवा प्राधिकरण अधिनियम, 1987(Legal Services Authorities Act, 1987) के तहत वैधानिक दर्जा दिया गया है। इस अधिनियम के तहत, लोक अदालतों द्वारा दिए गए निर्णय को सिविल न्यायालय का निर्णय माना जाता है, जो सभी पक्षों पर अंतिम और बाध्यकारी होता है। ऐसे निर्णयों के बीच किसी भी अदालत के कानून के समक्ष अपील नहीं की जा सकती है।
  • भारत के सर्वोच्च न्यायालय से लेकर तालुक न्यायालयों(Taluk Courts) तक सभी न्‍यायालयों में मुकदमों (प्री-लिटिगेशन और पोस्ट-लिटिगेशन दोनों) के निपटारे के लिए एक दिन के लिए राष्ट्रीय लोक अदालतें आयोजित की जाती हैं।
  • विवादों के समाधान हेतु समाज के सभी वर्गों के लिए इस वैकल्पिक विवाद निवारण (ADR forum) को सुलभ बनाने एवं कोविड-19 महामारी के द्वारा प्रस्तुत चुनौतियों को दूर करने के लिए, विधिक सेवाएं प्राधिकरणों(Legal Services Authorities) द्वारा वर्ष 2020 में वर्चुअल लोक अदालत यानी ई-लोक अदालत शुरू की गईं।
  • प्रौद्योगिकी का लाभ उठाकर ई-लोक अदालतों ने लाखों लोगों को अपने विवाद निपटाने के लिए एक मंच उपलब्‍ध कराया है। नवंबर 2020 तक इन कथित ई-लोक अदालतों के माध्यम से कुल 3,00,200 मामलों का निपटारा किया गया है।

क्या होते ई-लोक अदालत (e-Lok Adalat)?

  • ऑनलाइन लोक अदालत या ई-लोक अदालत न्‍यायिक सेवा संस्‍थानों का एक नवाचार है, जिसमें अधिकतम लाभ के लिए टैक्‍नोलॉजी का उपयोग किया गया है।
  • यह लोक अदालत का ही एक वर्चुअल प्रारूप है जो लोगों को घर बैठे ही न्‍याय प्राप्त करने के लिए एक मंच प्रदान करता है।
  • ई-लोक अदालतों के संचालन में खर्च कम होते है, क्‍योंकि इसमें परम्परागत रूप से केस से संबंधी खर्चों की जरूरत समाप्‍त हो जाती है।

क्या होता है वैकल्पिक विवाद समाधान (Alternative dispute resolution: ADR)?

  • वैकल्पिक विवाद समाधान (एडीआर) विवादों को सुलझाने के सन्दर्भ में उन विभिन्न प्रकार की प्रक्रियाओं को संदर्भित करता है जो संबधित पार्टियों को बिना ट्रायल या बगैर मुकदमेबाजी के विवादों को हल करने में मदद करता है। वैकल्पिक विवाद समाधान (एडीआर) के प्रचलित स्वरूपों में मध्यस्थता, पंचाट, तटस्थ मूल्यांकन, लोक अदालत इत्यादि शामिल हैं।

विधिक सेवा प्राधिकरण अधिनियम, 1987 के बारे में

  • वर्ष 1987 में संसद ने विधिक सेवा प्राधिकरण अधिनियम पारित किया जिसने विभिन्न स्तरों पर विधिक सेवा प्राधिकरण का निर्माण किया गया ताकि समाज के कमजोर तबकों को निःशुल्क और सक्षम विधिक सेवा प्राप्त हो सके, जिससे यह सुनिश्चित हो कि आर्थिक या अन्य असमर्थता के कारण कोई भी नागरिक न्याय प्राप्त करने के अवसर से वंचित न हो।
  • यह कानून निःशुल्क विधिक सहायता को मूर्तरूप देता है। यह कानून वैसे व्यक्ति जो निर्धनता या जाति, पंथ या लिंग संबंधी संवेदनशीलता के कारण कोई मामला दर्ज करने या मामले का बचाव करने के लिए एक वकील की सेवा लेने में समर्थ नहीं हैं, को कानूनी सहायता प्रदान करता है ताकि न्यायालय में उन्हें भी वकील की सेवा मिल सके।
  • यह अधिनियम विभिन्न स्तरों पर विधिक सेवा संस्थान स्थापित करता है, जिसके प्रकार निम्नलिखित हैं-
  1. केन्द्रीय स्तर पर राष्ट्रीय विधिक सेवा प्राधिकरण (नालसा) है। राष्ट्रीय प्राधिकरण उच्चतम न्यायालय विधिक सेवा समिति का गठन करता है।
  2. राज्य स्तर पर राज्य विधिक सेवा प्राधिकरण (सालसा) है। राज्य प्राधिकरण राज्य के उच्च न्यायालय के लिए उच्च न्यायालय विधिक सेवा समिति तथा प्रत्येक तालुक के लिए तालुक विधिक सेवा समिति गठित करता है।
  3. जिला स्तर पर जिला विधिक सेवा समिति होती है।

लोक अदालत के लाभ

  • न्‍यायिक सेवा अधिकारियों द्वारा आयोजित लोक अदालतें (राज्‍य स्‍तरीय और राष्‍ट्रीय) वैकल्पिक विवाद समाधान का एक तरीका है।
  • इसमें मुकदमाबाजी से पूर्व और अदालतों में लंबित मामलों को मैत्रीपूर्ण आधार पर सुलझाया जाता है।
  • इन अदालतों में निःशुल्क सुनवाई होती है, जिससे वादियों पर अनावश्यक आर्थिक भार नहीं पड़ता है। यदि न्यायालय में लंबित मुकदमें में कोर्टं शुल्क जमा करवाया गया होता है तो लोक अदालत में विवाद के निपटारे के बाद वह शुल्क वापस कर दी जाती है।
  • इनके माध्यम से मुकदमों की तीव्र सुनवाई होती है, मुकदमे से संबंधित पक्षों को तेजी से एक राय पर लाया जाता है। इससे दोनों पक्ष कठिन न्‍यायिक प्रणाली के बोझ से छुटकारा मिलता है।

लोक अदालत के कार्यान्वयन से जुड़ी चुनौतियाँ

  • भारत की एक बड़ी आबादी अशिक्षित है जो न तो कानूनी प्रक्रिया व उसकी प्रणालियों से परिचित है और न ही संवैधानिक अधिकारों के प्रति सजग है।
  • भारत में एक बड़ी आबादी ऐसी है जो कानूनी मदद इसलिए नहीं प्राप्त होती क्योंकि वे सामाजिक और आर्थिक रूप से पिछड़े हैं।
  • यह एक आम धारणा है कि निःशुल्क विधिक सेवा की गुणवत्ता अपेक्षाकृत अच्छी नहीं है। कई बार ऐसा भी देखा गया है कि सरकारी वकील बड़े नामचीन वकीलों के समक्ष अपने प्रकरण को ठीक ढंग से पेश नहीं कर करते हैं जिससे फरियादी का कानून के प्रति अविश्वास बढ़ने लगता है।
  • विधिक सेवा देने के लिए वकीलों की कमी भी एक मुख्य चुनौती है।
  • भारत में डिजिटल डिवाइड अधिक होने और डिजिटल इन्फ्रास्ट्रक्चर कमजोर होने से ई-लोक अदालत का उच्चतम लाभ नहीं मिल पा रहा है।