भारत में पहली बार मातृ मृत्यु दर 100 के नीचे आया : डेली करेंट अफेयर्स

मां बनना दुनिया का सबसे खूबसूरत अहसास होता है। ईश्वर का सबसे बड़ा वरदान। ये अहसास जितना सुखद होता है, उतना ही मां के लिए कष्टकारी भी। गर्भवती होने के साथ ही एक औरत का जीवन जहां नई उम्मीदों से भर जाता है वहीं कुछ चिंताएं भी पनपने लगती हैं। एक आंकड़े के मुताबिक साल 2014 से 2016 की अवधि में प्रति लाख जीवित बच्चों के जन्म पर 130 महिलाओं की मृत्यु हो गई थी। हालाँकि अभी हाल ही में इससे जुड़ी एक सुखद खबर आई है। दरअसल रजिस्ट्रार जनरल ऑफ़ इंडिया ने एक नयी रिपोर्ट जारी की है। वर्तमान बुलेटिन 2018-2020 की अवधि के लिए मातृ मृत्यु दर के बारे में बताता है। इसके आंकड़ों के अनुसार यह मृत्युदर 130 से कम होकर 97 पर आ गयी है। भारत के राज्यों में केरल में सबसे कम मातृ मृत्यु दर है यानी प्रति लाख पर यह दर 19 है। वंही महाराष्ट्र में 33, तेलंगाना में 43, आंध्र प्रदेश में 45, तमिलनाडु में 54, झारखंड में 56 गुजरात में 57 और कर्नाटक में 69 है।

डब्ल्यूएचओ के अनुसार मातृ मृत्यु दर का मतलब है - एक निश्चित अवधि में प्रति एक लाख बच्चों के जन्म पर माताओं की मृत्यु की संख्या। इसमें गर्भवती होने पर या गर्भावस्था की समाप्ति के 42 दिनों के भीतर गर्भावस्था या उसके प्रबंधन से संबंधित किसी भी कारण से हुई किसी महिला की मृत्यु को शामिल किया जाता है।

अब मातृ मृत्यु के कारणों की बात करें तो इसके कई कारण हैं जिनमें अस्पताल का पास न होना, सेफ डिलीवरी न होना, अन्य ज़रूरी स्वास्थ्य सुविधाओं एवं जागरूकता का अभाव, खानपान पर ध्यान न देना और प्रजनन के समय होने वाली अन्य समस्याएं आदि शामिल हैं। हालाँकि इन कारणों से निपटने के लिए सरकार द्वारा कई क़दम उठाये जा रहे हैं जिनमें राष्ट्रीय स्वास्थ्य मिशन (एनएचएम) के तहत जननी शिशु सुरक्षा कार्यक्रम, जननी सुरक्षा योजना, सुरक्षित मातृत्व आश्वासन (सुमन) योजना और प्रधानमंत्री सुरक्षित मातृत्व अभियान जैसी सरकारी योजनाएं शामिल हैं। इन योजनाओं के बावजूद अभी भी UN के सतत विकास लक्ष्य से हम दूर हैं क्योंकि UN ने 2030 तक, वैश्विक मातृ मृत्यु दर को प्रति 1 लाख पर 70 तक लाने का लक्ष्य रखा है। इसका मतलब हमें इस दिशा में और भी काम करने की ज़रूरत है।