पुण्यतिथि विशेष : “सीमान्त गांधी” - अब्‍दुल गफ्फार खान ("Frontier Gandhi" - Abdul Ghaffar Khan) : डेली करेंट अफेयर्स

अब्‍दुल गफ्फार खान का जन्‍म 6 फरवरी 1890 में पाकिस्‍तान के पश्‍तून परिवार में हुआ था। अलीगढ़ मुस्लिम यूनीवर्सिटी से अपनी पढ़ाई करने वाले अब्‍दुल गफ्फार खान विद्रोही विचारों के व्‍यक्ति थे। इसीलिए वह पढ़ाई के दौरान से क्रांतिकारी गतिवधियों में शामिल हो गए थे। खान अब्‍दुल गफ्फार खान ने पश्‍तून लोगों को अंग्रेजों के जुल्‍म से बचाने की कसम खा ली।

20 साल की उम्र में उन्होंने अपने गृहनगर उत्मान जई में एक स्कूल खोला जो थोड़े ही महीनों में चल निकला, पर अंग्रेजी हुकूमत ने उनके स्कूल को 1915 में प्रतिबंधित कर दिया। अगले 3 साल तक उन्होंने पश्तूनों को जागरूक करने के लिए सैकड़ों गांवों की यात्रा की। कहा जाता है कि इसके बाद लोग उन्हें ‘बादशाह खान’ नाम से पुकारने लगे थे।

पश्‍तून मूवमेंट के चलते चर्चित हुए खान अब्‍दुल गफ्फार खान की मुलाकात महात्‍मा गांधी से हुई तो वह उनसे बेहद प्रभावित हो गए और अहिंसक आंदोलनों पर तरजीह बढ़ा दी।

नमक आंदोलन में शामिल होने के कारण अब्‍दुल गफ्फार खान को 23 अप्रैल 1923 में अंग्रेजों ने पेशावर में गिरफ्तार कर लिया क्योंकि उन्होंने उत्तर-पश्चिम सीमा प्रांत के उटमानज़ई (Utmanzai) शहर में आयोजित एक सभा में भाषण दिया था। अब्दुल गफ्फार खान को उनके अहिंसक तरीकों के लिये जाना जाता है, यही वजह रही कि खान की गिरफ्तारी को लेकर पेशावर सहित पड़ोसी शहरों में विरोध प्रदर्शन होने लगे।

उन्‍हें छुड़ाने के लिए वहां पहुंचे हजारों लोगों के आंदोलन को देख अंग्रेज डर गए और उन्‍होंने लोगों को रोकने के लिए फायरिंग का आदेश दे दिया। आदेश मिलते ही अंग्रेज सैनिकों ने निहत्‍थे लोगों पर गोलियां बरसा दीं। इस हत्‍याकांड में करीब 250 लोगों की मौत हो गई। इसे किस्सा ख्वानी बाज़ार (Qissa Khwani Bazaar) नरसंहार भी कहते हैं।

वहीं, हत्‍याकांड से पहले अंग्रेजों के गोली चलाने का आदेश मानन से इनकार करने वाले गढ़वाल राइफल्‍स के जवानों का कोर्ट मार्शल कर दिया गया और उन्‍हें कई साल तक जेल में बंद रहना पड़ा। इनमें उत्तराखंड के वीर चंद्र सिंह गढ़वाली का नाम प्रमुख था।

1929-30 में खुदाई खिदमतगार की एक संस्थागत आंदोलन के रूप में स्थापना स्थापना हुई थी । इसका मतलब है खुदा कि सेवा करना, मतलब इंसान की सेवा करना। आजादी के लिए लड़ने, अहिंसा, और धार्मिक एकता इसकी प्रतिबद्धता थी। इससे ही खुदाई खिदमतगार की बुनियाद तैयार हुई।

1919 के रोलेट सत्याग्रह के खिलाफ गांधीजी ने देश भर में सत्याग्रह का आह्वान किया था तो बादशाह खान भी उससे जुड़ गए थे।

बिहार और नोआखली में 1946 में जब सांप्रदायिक दंगे हुए, उस वक्त बादशाह खान और गांधी साथ-साथ वहां गए थे। साथ-साथ उन्होंने बिहार में काम किया और अंत तक उनका एक-दूसरे के साथ संबंध कायम रहा।

जब ऑल इंडिया मुस्लिम लीग भारत के बंटवारे पर अड़ी हुई थी, तब बादशाह खान ने इसका सख्त विरोध किया। जून 1947 में उन्होंने पश्तूनों के लिए पाकिस्तान से एक अलग देश की मांग की, लेकिन ये मांग नहीं मानी गई।

पाकिस्तान सरकार उन्हें अपना दुश्मन समझती थी, इसलिए वहां उन्हें कई साल जेल में रखा गया। 20 जनवरी 1988 में हाउस अरेस्ट के दौरान पाकिस्तान में ही उनका निधन हो गया।