इमा कैथल बाजार (Ima Market) : डेली करेंट अफेयर्स

मैं अबला नादान नहीं हूँ, दबी हुई पहचान नहीं हूँ।
मैं स्वाभिमान से जीती हूँ,
रखती अंदर ख़ुद्दारी हूँ
मैं आधुनिक नारी हूँ।

पुरुष प्रधान जगत में मैंने, अपना लोहा मनवाया।
जो काम मर्द करते आये, हर काम वो करके दिखलाया
मैं आज स्वर्णिम अतीत सदृश, फिर से पुरुषों पर भारी हूँ
मैं आधुनिक नारी हूँ।।

किसी कवि द्वारा रची गई ये पंक्तियाँ मणिपुर के इमा कैथल बाजार पर बेहद ही सटीक बैठती है। शायद यहीं कारण है भारत के विदेश मंत्री एस जयशंकर भी खुद को ये कहने से नहीं रोक पाए कि ये बाजार नारी शक्ति की सबसे बेहतरीन मिसाल पेश करता है।

ये मार्केट अभी चर्चा में क्यों है?

हाल ही में भारतीय विदेश मंत्री एस जयशंकर ने 'इमा कैथल' बाज़ार को नारी सशक्तिकरण का बड़ा उदाहरण बताते हुए वहां का एक वीडियो ट्वीट किया है। दरअसल विदेश मंत्री जी मणिपुर के 'संगई महोत्सव' में भाग लेने के लिए वहां पहुंचे थे तो लगे हाथ वे मणिपुर के फेमस मार्केट 'इमा कैथल' भी पहुंचे। ये अनूठी बात है कि इस बाज़ार का सारा संचालन महिलाओं के ही हाथ में होता है।

शब्द 'इमा कैथल' का क्या मतलब है?

मणिपुरी भाषा में इमा का अर्थ होता है 'माँ' और 'कैथल' का अर्थ होता है 'बाजार' यानी इमा कैथल का शाब्दिक अर्थ हुआ माताओं का बाजार। देखा जाये तो वास्तव में यह मदर्स मार्केट ही है, क्योंकि यहाँ सिर्फ शादीशुदा महिलायें ही काम करती हैं। इस बाज़ार में काम करने वाली ज़्यादातर महिलाएं 35 से 60 वर्ष की हैं। इंडियन एक्सप्रेस में छपी एक खबर के मुताबिक यह एशिया का ऐसा सबसे बड़ा बाज़ार है जो सिर्फ़ महिलाओं द्वारा संचालित होता है। कुछ जगहों पर इसे दुनिया का सबसे बड़ा ऐसा बाज़ार बताया गया है जो पूर्णतः महिलाओं द्वारा संचालित होता है। मणिपुर की अर्थव्यवस्था का रीढ़ कहा जाने वाला यह बाजार इम्फाल के ख्वाइरबन्द नामक इलाके में स्थित है। अपनी तरह के इस अनोखे बाजार में लगभग दस हज़ार से ज़्यादा महिलाएं काम करती हैं।

इस बाजार में पुरुष विक्रेताओं और दुकानदारों को प्रतिबंधित किया गया है। मणिपुर सरकार ने 2018 में एलान किया था कि यदि कोई पुरुष विक्रेता इस बाजार में सामान बेचता पाया गया तो उसके खिलाफ मणिपुर नगर पालिका अधिनियम, 2004 के तहत कानूनी कार्रवाई की जाएगी।

इस बाज़ार में हम क्या-क्या खरीद सकते हैं?

इंफाल शहर के ख्वाईरंबन्द नामक इलाके में स्थित यह बाज़ार तीन अलग-अलग काम्प्लेक्स - पुराना बाज़ार, नया बाज़ार और लक्ष्मी बाजार - में बंटा हुआ है। नया बाजार में सब्ज़ी, मछली और फल जैसे रोज़मर्रा के खाद्य पदार्थ मिलते हैं। लक्ष्मी बाज़ार में परंपरागत कपड़े और घरेलू सामान मिलते हैं और वहीँ पुराना बाज़ार में हस्तशिल्प और सजावटी सामान वगैरह मिलता है। इमा कैथल में बाजार लगाने के लिए महिलाओं को लाइसेंस लेना पड़ता है।

इस बाजार से जुड़ा इतिहास क्या है?

आज से करीब 500 साल पहले 16वीं शताब्दी के दौरान मणिपुर में लुल्लुप-काबा का चलन था। लुल्लुप-काबा जबरन बंधुआ मजदूरी को बढ़ावा देने वाली एक प्रथा थी। इस प्रथा में लोगों से जबरदस्ती काम कराया जाता था। इसमें मेइती पुरुषों (मेइती मणिपुर का एक समुदाय है) को कुछ वक्त तक के लिए सेना और अन्य नागरिक परियोजनाओं में काम करना पड़ता था। चाहे इनका मन हो या न हो। इस तरह के काम करने के लिए मेइती समुदाय के पुरुषों को घर से दूर भेज दिया जाता था।

अब पुरुषों की अनुपस्थिति में घर-परिवार और खेती-बाड़ी की सारी जिम्मेदारियां मेइती औरतों के कंधों पर आ गई। यह महिलाएं भी कम बहादुर नहीं थी। इन्होंने इस जबरन मजदूरी की प्रथा से न तो अपने मर्दों को कमजोर पड़ने दिया और ना ही अपने परिवार को। ऐसी परिस्थितियों में इन महिलाओं ने खुद ही जीविकोपार्जन करने का फैसला लिया और यहीं से इमा कैथल अस्तित्व में आया। इन महिलाओं ने अपने दम पर जीविकोपार्जन के लिए कई तरह के हुनर सीखे और बाज़ार में इसका प्रबंधन भी किया। इस पूरी प्रक्रिया ने उस दौर में महिलाओं को न केवल आत्मनिर्भर बनाया, बल्कि एक ऐसी शानदार बाजार प्रणाली बना डाली, जो आज एशिया के सबसे बड़े महिलाओं के बाजार का रूप ले चुकी है।

इमा बाज़ार से जुडी एक और रोचक कहानी कौन सी है?

लुल्लुप-काबा प्रथा, यह भारत में अंग्रेजों के आगमन के बाद तक भी चलती रही। अपने अत्याचारी प्रक्रिया में अंग्रेजों ने इस प्रथा का लाभ उठाने की बखूबी कोशिश की। ब्रिटिश सरकार की नीतियों ने इमा बाजार के कामकाज में भी दखलअंदाजी करनी शुरू कर दी। आर्थिक सुधार के नाम पर अंग्रेजों ने इस पूरे बाजार का शोषण करना शुरू कर दिया। इमा कैथल की साहसी औरतों ने ब्रिटिश हुकूमत के दमनकारी नीतियों का जमकर मुकाबला किया। इसके लिए उन्होंने ‘नूपी लेन’ नाम का एक आंदोलन चलाया। ‘नूपी लेन’ का अर्थ होता है औरतों की जंग। तो इन बहादुर महिलाओं ने इस आंदोलन के जरिए अंग्रेजों के शोषण के खिलाफ चक्काजाम, विरोध प्रदर्शन और जुलूस का रास्ता अपनाया। अंत में अंग्रेजी सरकार को इन महिलाओं के आगे मुंह की खानी पड़ी। नूपी लेन की आग दूसरे विश्व युद्ध तक भी सुलगती रही थी।

भारतीय अर्थव्यवस्था में महिलाओं की भागीदारी की क्या है स्थिति?

भारतीय अर्थव्यवस्था की बात करें तो आज भी महिलाओं की भागीदारी औसत से कम है। भारत सरकार के एक आंकड़े के मुताबिक सिर्फ 17% महिलाएं ही स्थिर वेतनभोगी नौकरी करती हैं। भारत के शहरों में सिर्फ़ 23.6 % महिला स्नातक ही नौकरी करती हैं और आज भी श्रमबल में शीर्ष पदों पर सिर्फ 18% ही महिलायें हैं। दरअसल आज भी भारत की आधी आबादी के लिए नौकरी करना या व्यवसाय करना एक बड़ी चुनौती है, जिसके बहुत से कारण हैं जैसे कि लैंगिक भेदभाव, महिलाओं को पुरुषों से कम वेतन देना, कार्यस्थल पर यौन शोषण जैसे मुद्दे, विकृत सामाजिक सोच और ऑफिस का इंफ़्रा महिलाओं के अनुकूल न होना आदि।

अंतराष्ट्रीय श्रम संगठन की एक रिपोर्ट की माने तो अगर भारत में कार्यक्षेत्र में व्याप्त लैंगिक असमानता को 25 प्रतिशत तक भी कम कर लिया जाये तो देश की जीडीपी में 1 ट्रिलियन डॉलर की वृद्धि हो जाएगी। वर्ल्ड इकोनॉमिक फ़ोरम द्वारा जारी वर्ष 2022 में ग्लोबल जेंडर गैप इंडेक्स की रिपोर्ट में 146 देशों में भारत का स्थान 135वां है। इन आंकड़ों से जाहिर होता है कि भारत में अभी लैंगिक सुधार और महिलाओं की आत्मनिर्भरता के लिए कई ज़रूरी कदम उठाये जाने बाकी हैं।

हालाँकि भारत सरकार ने इस दिशा में कई सुधारात्मक कदम उठाये हैं जैसे अन्नपूर्णा योजना (स्टेट बैंक की ऋण योजना), ओरिएंटल महिला विकास योजना और महिला उद्यमियों के लिए मुद्रा योजना आदि। बात अगर इमा बाज़ार की करें तो यह निश्चित ही महिला सशक्तिकरण के लिए एक मिसाल है जो भारत के साथ-साथ सम्पूर्ण विश्व की महिला शक्ति के लिए प्रेरणा का स्रोत है।

आगे क्या किया जा सकता है?

वर्तमान समय में देश की अर्थव्यवस्था में महिलाओं की भागीदारी बढ़ाने और उन्हें आत्मनिर्भर बनाने के लिए विशेषज्ञ कई राह सुझाते हैं जैसे कि कार्यस्थलों पर व्याप्त भेदभाव और महिला सुरक्षा संबंधी चुनौतियों को दूर करना, असंगठित क्षेत्र में कार्य कर रही महिलाओं के लिये लक्षित योजनाएं चलाना और कार्यस्थलों पर महिलाओं की भागीदारी को प्रोत्साहित करने के लिये यातायात को सुगम बनाना आदि। इसके अलावा सार्वजनिक स्थलों पर प्रसाधन केंद्रों को बेहतर बनाना, ग्रामीण क्षेत्रों में उच्च शिक्षा को बढ़ावा देना और नीति निर्माण में इनकी भागीदारी बढ़ाये जाने जैसे कदम भी उठाये जाने चाहिए।