'एमपॉक्स' (MPOX) वायरस : डेली करेंट अफेयर्स

इस साल की शुरुआत में जब मंकीपॉक्स बीमारी का प्रकोप बढ़ा, तो कई जगहों पर इसके लिए नस्लवादी और आपत्तिजनक भाषा का इस्तेमाल किया गया। कई देशों ने इसपर चिंता जताई और WHO से इस बीमारी का नाम बदलने का आग्रह किया। इसके बाद दुनिया भर के विशेषज्ञों के साथ विचार करके विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) ने मंकीपॉक्स का नाम बदलकर 'एमपॉक्स' (mpox) कर दिया। करीब एक साल तक इन दोनों नामों का इस्तेमाल किया जाता रहेगा, इसके बाद 'मंकीपॉक्स' को हटा दिया जाएगा। यहाँ आपको बता दें कि इंटरनेशनल क्लासिफिकेशन ऑफ डिज़ीसेस (ICD) के तहत, बीमारियों को नाम देने की ज़िम्मेदारी WHO की होती है।

मंकीपॉक्स एक दुर्लभ, वायरल जूनोटिक बीमारी है जिसमें चेचक के समान लक्षण प्रदर्शित होते हैं, किन्तु यह चिकित्सकीय रूप से कम गंभीर है। ह्यूमन मंकीपॉक्स का पहला मामला 1970 में सामने आया था। जबकि बंदरों में इस वायरस का पता कई साल पहले यानी 1958 में ही चल गया था। दरअसल साल 1958 में अनुसंधान के लिये रखे गए बंदरों की कॉलोनियों में चेचक जैसी बीमारी के दो प्रकोपों के बाद इसे खोजा गया था।

मंकीपॉक्स के कारण होने वाला बुखार, अस्वस्थता और सिरदर्द आमतौर पर चिकन पॉक्स के संक्रमण की तुलना में अधिक गंभीर होता है। रोग के प्रारंभिक चरण में मंकीपॉक्स के कारण लिम्फ ग्रंथि (Lymph Gland) यानी आपके गले के दोनों ओर सूजन आ जाती है और चेहरे, हथेलियों, तलवों, आंखों, मुंह, गले, जांघ और जननांग जैसे जगहों पर दाने या छाले भी हो जाते हैं।

मंकीपॉक्स वायरस ज़्यादातर जंगली जानवरों जैसे - कृन्तकों (चूहों, छछूंदर और गिलहरी आदि) और प्राइमेट्स से लोगों के बीच फैलता है, किन्तु मानव-से-मानव संचरण भी होता है। इसका संचरण टीकाकरण या प्लेसेंटा (जन्मजात मंकीपॉक्स) के माध्यम से भी हो सकता है। मानव-से-मानव संचरण की बात करें तो अभी तक मौजूद जानकारी के अनुसार यह वायरस संक्रमित इंसान को छूने, फेस टू फेस कॉन्टैक्ट करने, चुंबन करने और यौन संबंध बनाने से फैलता है। यह संक्रमित जानवरों को छूने और अधपका मांस खाने से जानवरों से इंसानों में भी फैलता है।