यूपीएससी और सभी राज्य लोक सेवा आयोग परीक्षाओं के लिए हिंदी में डेली करेंट अफेयर्स (17 सितंबर 2020)

Daily Current Affairs for UPSC, IAS, UPPSC/UPPCS, BPSC, MPPSC, RPSC and All State PCS Examinations


यूपीएससी और सभी राज्य लोक सेवा आयोग परीक्षाओं के लिए हिंदी में डेली करेंट अफेयर्स

Daily Hindi Current Affairs for UPSC, IAS, UPPSC/UPPCS, BPSC, MPPSC, RPSC and All State PCS Examinations


आयुर्वेद शिक्षण और अनुसंधान संस्थान विधेयक, 2020

चर्चा में क्यों?

  • हाल ही में आयुर्वेद शिक्षण और अनुसंधान संस्थान विधेयक,2020 को संसद द्वारा पारित कर दिया गया है।

आयुर्वेद शिक्षण एवं अनुसंधान संस्‍थान (आईटीआरए) विधेयक, 2020 के बारे में

  • आयुर्वेद शिक्षण और अनुसंधान संस्थान विधेयक,2020 के पारित होने से एक अति आधुनिक आयुर्वेदिक संस्‍थान की स्‍थापना का मार्ग प्रशस्‍त हुआ है।
  • जामनगर, गुजरात में स्‍थापित होने वाले इस संस्‍थान का नाम आयुर्वेद शिक्षण एवं अनुसंधान संस्‍थान (आईटीआरए) होगा।
  • इसे राष्‍ट्रीय महत्‍व के संस्‍थान (आईएनआई) का दर्जा दिया जाएगा।
  • इस आईटीआरए की स्‍थापना गुजरात आयुर्वेद विश्वविद्यालय परिसर, जामनगर में वर्तमान में विद्यमान आयुर्वेद संस्थानों को मिलाकर की जाएगी। यह बहुत प्रख्‍यात संस्‍थानों का समूह है,यथा
    1. आयुर्वेद स्नातकोत्तर शिक्षण और अनुसंधान संस्थान
    2. श्री गुलाब कुंवरबा आयुर्वेद महाविद्यालय
    3. आयुर्वेदिक औषधि विज्ञान संस्थान
    4. महर्षि पतंजलि योग नेचुरोपैथी शिक्षा और अनुसंधान संस्थान (इसे प्रस्तावित आईटीआरए के स्‍वस्‍थवृत्त विभाग का हिस्सा बनाया जाना है)
  • उपर्युक्त ये चारों संस्थान पिछले कई दशकों के दौरान स्‍थापित हुए हैं और एक-दूसरे के निकट स्थित होने से आयुर्वेद संस्थानों के एक विशिष्‍ट परिवार का निर्माण करते हैं।

महत्व

  • इस प्रस्ताव से आईटीआरए संस्‍थान को आयुर्वेद और फार्मेसी में स्‍नातक और स्‍नातकोत्तर शिक्षा में शिक्षण की पद्धति को विकसित करने के लिए अधिक स्‍वायत्तता मिलेगी।
  • विभिन्न घटक संस्थानों के बीच समन्‍वय से आईटीआरए को इस प्रकार की शिक्षा के उच्‍च मानकों का प्रदर्शन करने और पूरे आयुष क्षेत्र में एक प्रकाश स्‍तंभ संस्‍थान के रूप में उभरने में मदद मिलेगी।
  • इससे फार्मेसी सहित आयुर्वेद की सभी प्रमुख शाखाओं में कर्मियों को उच्‍च स्‍तर का प्रशिक्षण प्राप्‍त होने और आयुर्वेद के क्षेत्र में गहन अध्‍ययन और अनुसंधान किए जाने की उम्‍मीद है।
  • आईटीआरए आयुष क्षेत्र में राष्‍ट्रीय महत्‍व के संस्‍थान (आईएनआई) के दर्जे वाला पहला संस्‍थान होगा। इससे संस्‍थान को पाठ्यक्रम सामग्री और शिक्षाशास्‍त्र के मामले में निर्णय लेने में स्‍वतंत्र और नवाचारी बनने में मदद मिलेगी। यह निर्णय ऐसे समय आया है जब परंपरागत ज्ञान पर आधारित स्‍वास्‍थ्‍य समाधानों में वैश्विक दिलचस्‍पी अप्रत्‍याशित रूप से बहुत ऊंचे स्‍तर पर है और आईटीआरए आयुर्वेद शिक्षा को नई ऊंचाइयों पर ले जाने के लिए तैयार है।

विद्युत (उपभोक्ताओं के अधिकार) नियम 2020

चर्चा में क्यों?

  • केंद्रीय विद्युत मंत्रालय ने पहली बार विद्युत उपभोक्ताओं के अधिकारों के लिए विद्युत (उपभोक्ताओं के अधिकार) नियम 2020 नियमों का मसौदा तैयार किया है।

विद्युत (उपभोक्ताओं के अधिकार) नियम 2020 ड्राफ्ट के बारे में

  • विद्युत क्षेत्र में बिजली उपभोक्ता सबसे महत्वपूर्ण हितधारक हैं। सभी नागरिकों को बिजली प्रदान करना और उपभोक्ता संतुष्टि पर ध्यान देना महत्वपूर्ण है। इसके लिए, प्रमुख सेवाओं की पहचान करना, इन सेवाओं के संबंध में न्यूनतम सेवा स्तर और मानकों को निर्धारित करना तथा उपभोक्ताओं के अधिकारों के रूप में उन्हें पहचानना अनिवार्य है। इस उद्देश्य के साथ, विदुयत (उपभोक्ताओं के अधिकार) नियम, 2020 का एक मसौदा सरकार द्वारा पहली बार तैयार किया गया है।

ड्राफ्ट की मुख्य विशेषताएं हैं –

  • सेवा की विश्वसनीयता: बिजली वितरण कंपनियों डिस्कॉम के लिए प्रति वर्ष उपभोक्ताओं की औसत संख्या और आउटेज की अवधि तय करने के लिए राज्य विद्युत नियामक आयोग (एसईआरसी)।
  • कनेक्शन के लिए समय पर और सरलीकृत प्रक्रिया: 10 किलोवाट भार तक के विद्युत कनेक्शन के लिए केवल दो दस्तावेज और कनेक्शन देने में तेजी लाने के लिए 150 किलोवाट तक भार के लिए कोई अनुमानित मांग शुल्क नहीं।
  • नया कनेक्शन प्रदान करने और मौजूदा कनेक्शन को संशोधित करने की समय अवधि मेट्रो शहरों में अधिक से अधिक 7 दिन, अन्य नगरपालिका क्षेत्रों में 15 दिन तथा ग्रामीण क्षेत्रों में 30 दिन से ज़्यादा नहीं होगी।
  • साठ दिनों या अधिक की देरी के साथ सेवारत बिलों पर 2 से 5 प्रतिशत की छूट।
  • नकद, चेक, डेबिट कार्ड और नेट बैंकिंग आदि से बकाया बिलों का भुगतान करने का विकल्प लेकिन 1000 रुपये या उससे अधिक के बिल का ऑनलाइन भुगतान किया जा सकता है।
  • डिस्कनेक्शन, पुन: संयोजन, मीटर बदलवाना, बिलिंग और भुगतान आदि से संबंधित प्रावधान।
  • उपभोक्ताओं की उभरती हुई श्रेणी को "प्रॉज्यूमर/पेशेवर" के रूप में मान्यता देना। ये ऐसे व्यक्ति हैं जो बिजली उपभोक्ता तो हैं और साथ ही उन्होंने अपनी छतों पर सौर ऊर्जा इकाइयां स्थापित की हैं या फिर अपने सिंचाई पंपों को सोलराइज़ किया है। राज्य विद्युत नियामक आयोग (एसईआरसी) द्वारा निर्धारित सीमा तक कनेक्शन के एक ही बिंदु का उपयोग करके उन्हें स्व-उपयोग के लिए बिजली का उत्पादन करने का अधिकार होगा। साथ ही वे ग्रिड को शेष विद्युत की आपूर्ति भी कर सकते हैं।
  • बिजली वितरण कंपनियों- डिस्कॉम द्वारा सेवा में देरी के लिए मुआवजा या दंड का प्रावधान; जहां तक संभव हो, मुआवजे का भुगतान बिल में किया जाए।
  • 24x7 टोल फ्री कॉल सेंटर, वेब-आधारित सहायता और सामान्य सेवाओं के लिए मोबाइल एप्लीकेशन जैसे कि नया कनेक्शन, डिस्कनेक्शन, पुन: संयोजन, कनेक्शन के स्थान में बदलाव, नाम और विवरण में परिवर्तन, लोड में बदलाव, मीटर को बदलवाना, विद्युत आपूर्ति में बाधा, इन सब के लिए एसएमएस और ई-मेल अलर्ट सुविधा, ऑनलाइन स्टेटस ट्रैकिंग और स्वचालित प्रक्रिया की व्यवस्था।
  • उपभोक्ता की शिकायत निवारण में आसानी लाने के लिए सब- डिवीजन से शुरू होने वाले विभिन्न स्तरों पर उपभोक्ताओं के 2-3 प्रतिनिधियों के साथ उपभोक्ता शिकायत निवारण फोरम।
  • विद्युत मंत्रालय ने 30 सितंबर 2020 तक उपभोक्ताओं से सुझाव/विचार/ टिप्पणी आमंत्रित की हैं। मंत्रालय ने इस सम्बन्ध में 9 सितंबर 2020 को यह मसौदा जारी किया था। आने वाले सभी सुझावों और प्रस्तावों को ध्यान में रखते हुए उन्हें अंतिम रूप दिया जाएगा।

कोरल रीफ (प्रवाल भित्तियाँ)

चर्चा में क्यों?

  • सऊदी अरब के सुल्तान की अध्यक्षता में जी-20 देशों के पर्यावरण मंत्रियों की बैठक में भू- क्षरण और कोरल रीफ के संरक्षण कार्यक्रम के वैश्विक पहल की शुरुआत की गयी।

सम्मलेन से जुड़े तथ्य

  • पर्यावरण मंत्री प्रकाश जावडेकर ने भारत के राष्ट्रीय तटीय मिशन कार्यक्रम द्वारा किए गए प्रयासों पर प्रकाश डाला। इसके तहत सरकार ने देश में कोरल रीफ़ की रक्षा और उन्हें बचाने के लिए कई कदम उठाए हैं। उन्होंने भू-क्षरण रोकने की दिशा में उपायों और जलवायु परिवर्तन पर नियंत्रण के वैश्विक लक्ष्यों की प्राप्ति के लिए भारत के प्रयासों को भी साझा किया।
  • भू-क्षरण कम करने के लिए वैश्विक पहल का उद्देश्य जी 20 सदस्य देशों में भू- क्षरण को रोकने की मौजूदा कार्य योजना पर काम करना है। इसके अलावा वैश्विक स्तर पर टिकाऊ विकास के लक्ष्य-एसडीजी की उपलब्धि पर संभावित प्रभाव को ध्यान में रखते हुए और किसी को नुकसान न पहुंचाने के सिद्धांत का पालन करने के लिए मौजूदा ढांचे के कार्यान्वयन को मजबूत करना है।
  • वैश्विक कोरल रीफ अनुसंधान और विकास में वृद्धि का मंच एक अभिनव पहल है जिसका उद्देश्य वैश्विक अनुसंधान और विकास (आरएंडडी) कार्यक्रम तैयार करना है, जो कोरल रीफ संरक्षण, बहाली और अनुकूलन के सभी पहलुओं में अनुसंधान, नवाचार और क्षमता निर्माण को गति देकर इस दिशा में किये गए प्रयासों को मजबूत करता है। इसके अलावा इस पहल का प्रयास कोरल रीफ के संरक्षण और उनके नुकसान को रोकने के लिए किए गए उपायों और प्रतिबद्धताओं को मज़बूती प्रदान करना है।

क्या होते है कोरल रीफ़

  • कोरल रीफ़ को प्रवाल भित्तियाँ या मूंगे की चट्टान के नाम से भी जाना जाता है। ये समुद्र के भीतर स्थित चट्टान हैं जो प्रवालों द्वारा छोड़े गए कैल्सियम कार्बोनेट से निर्मित होती हैं।
  • प्रवाल भित्तियों को सागरीय जैव विविधता का उष्णस्थल (Hotspot) माना जाता है।
  • संरचना के आधार पर प्रवाल भित्तियाँ मुख्यतः तीन प्रकार की होती हैं: तटीय, अवरोधक तथा एटॉल।
    1. तटीय प्रवाल भित्तियाँ समुद्र तटों पर पाई जाती हैं।
    2. अवरोधक प्रवाल भित्तियाँ समुद्र तटों से दूर समुद्र में पाई जाती हैं।
    3. एटॉल प्रवाल भित्तियाँ लैगूनों के किनारों पर पाए जाते हैं।

कोरल निर्माण की आवश्यक दशाएँ

  • कोरल रीफ़ प्रायः उष्णकटिबंधीय या उपोष्णकटिबंधीय समुद्रों में मिलती हैं, जहाँ तापमान 20-30 डिग्री सेल्सियस रहता है।
  • ये शैल-भित्तियाँ समुद्र तट से थोड़ी दूर हटकर पाई जाती हैं, जिससे इनके बीच छिछले लैगून बन जाते हैं।
  • प्रवाल उथले सागर में पाए जाते हैं और इनके विकास के लिये स्वच्छ एवं अवसादरहित जल आवश्यक है, क्योंकि अवसादों के कारण प्रवालों का मुख बंद हो जाता है और वे मर जाते हैं।

प्रवाल विरंजन

  • प्रवाल विरंजन का कारण गर्म पानी या गर्म तापमान हो सकता है। जब पानी अत्यधिक गर्म होता है तो प्रवाल अपने ऊतकों में रहने वाले सूक्ष्म शैवाल (zooxanthellae) को त्याग देते हैं जिस कारण वे पूरी तरह से प्रवाल विरंजित (पूरी तरह सफेद) हो जाते हैं। यह प्रवाल विरंजन कहलाता है।

ब्लैक होल

चर्चा में क्यों?

  • हाल ही में भारतीय खगोल भौतिकी संस्थान के वैज्ञानिकों ने बहुत बड़े ब्लैक होल की जांच करने का एक नया तरीका खोजा है - जिससे उसके द्रव्यमान और घूमने जैसे गुणों का पता लगाकर तारों को भेदने के बारे में निरीक्षण किया जा सके।

ब्लैक होल के जांच के नए मॉडल के बारे में

  • भारतीय खगोल भौतिकी संस्थान के वैज्ञानिकों ने एक मॉडल तैयार किया है जिससे ब्लैक होल के द्रव्यमान और घूमने/घूर्णन के बारे में जानकारी हासिल कर यह अनुमान लगाया जा सकता है कि कुछ ब्लैक होल बड़ी आकाशगंगाओं के केंद्र में पाए जाने वाले उच्च गुरुत्वाकर्षण क्षेत्र में खगोलीय पिंडों के आसपास आने पर तारों को कैसे भेदते हैं।
  • अधिकांश ब्लैक होल अलग-थलग होते हैं और उनका अध्ययन करना असंभव होता है। खगोलविद, इन ब्लैक होल के पास के तारों और गैस पर प्रभावों को देखकर उनका अध्ययन करते हैं।
  • बड़े ब्लैक होल अपनी गुरुत्वाकर्षण क्षमता से सितारों की परिक्रमा को नियंत्रित करते हैं और उसकी ज्वारीय ताकतें अपने आस-पास आने वाले तारों को अलग कर सकती हैं या भेद सकती हैं। भारतीय खगोल भौतिकी संस्थान के वैज्ञानिकों ने पहले तारों के विघटन की दर और उसके आंकड़ों की गणना की थी।

ज्वारीय विघटन घटना (टीडीई)

  • जब ब्लैक होल का ज्वारीय गुरुत्वाकर्षण(tidal gravity), तारों के अपने गुरुत्वाकर्षण से अधिक हो जाता है, तो तारे विघटित(disrupted) हो जाते हैं और इस घटना को ज्वारीय विघटन घटना (tidal disruption events - TDE) कहा जाता है।
  • भारतीय खगोल भौतिकी संस्थान के वैज्ञानिकों के मॉडल से तारे के ज्वारीय विघटन के बाद उसका अवलोकन किया जा सकता है । इससे ब्लैक होल के द्रव्यमान और नक्षत्रीय द्रव्यमान के बहुमूल्य आंकड़ों के अलावा भौतिकी के बारे में हमारी जानकारी बढ़ाने में मदद मिलेगी। महत्व
  • ज्वारीय विघटन की घटनाएं महत्वपूर्ण और उपयोगी घटनाएं हैं जो अर्ध- आकाशगंगाओं में बड़े ब्लैक होल्स के द्रव्यमान का पता लगाने और भविष्यवाणी करने के लिए महत्वपूर्ण हैं।
  • भारतीय खगोल भौतिकी संस्थान (आईआईए) इस मॉडल से ब्लैक होल के गुरुत्वाकर्षण के बारे में जानकारी प्रपट होगी।

क्या होता है ब्लैक होल?

  • सामान्य सापेक्षिता सिद्धान्त के अनुसार , ब्लैक होल ऐसा खगोलीय पिंड है जिसके गुरुत्वाकर्षण खिंचाव से प्रकाश सहित कुछ भी नहीं बच पाता है। चूँकि ब्लैक होल पर गिरने वाला प्रकाश भी इनसे बाहर नहीं निकल सकता, इसलिए ब्लैक होल हमें दिखाई भी नहीं देते हैं ।
  • 1960 के दशक में सबसे पहले ब्लैक होल शब्द का इस्तेमाल अमेरिकी वैज्ञानिक ‘जॉन व्हीलर’ ने किया था।