प्रश्नकाल एवं शून्य काल - यूपीएससी, आईएएस, सिविल सेवा और राज्य पीसीएस परीक्षाओं के लिए समसामयिकी लेख

संदर्भ

  • लोकसभा और राज्यसभा सचिवालय ने अधिसूचित किया है कि संसद के मानसून सत्र के दौरान 'प्रश्नकाल' नहीं होगा तथा 'शून्यकाल' कुछ प्रतिबंधों (अवधि घटा कर 30 मिनट) के साथ दोनों सदनों में सुचारु रूप से होगा। सचिवालय ने स्पष्ट किया कि कोरोना काल में शारीरिक दूरी की आवश्यकता के मद्देनजर संसद की गैलेरी में भीड़ से बचने के लिए यह कदम उठाया गया है जबकि विपक्ष ने इसकी कड़ी आलोचना की है।
  • आमतौर पर जून के अंत में संसद का मानसून सत्र आयोजित किया जाता है किन्तु इस साल कोविड -19 महामारी के कारण सत्र में देरी हुई है । ये अधिसूचनाएँ 14 सितंबर और 1 अक्टूबर के बीच लागू रहेंगी । संसदीय रिकॉर्ड बताते हैं कि 1962 में चीनी आक्रमण के दौरान भी शीतकालीन सत्र में प्रश्नकाल नदारद था।

प्रश्नकाल क्या है ?

  • सामान्यत: लोकसभा की बैठक का पहला घंटा प्रश्नों के लिए होता है और उसे प्रश्‍नकाल कहा जाता है। इसका संसद की कार्यवाही में विशेष महत्व है। प्रश्नकाल के दौरान संसद सदस्य प्रशासन और सरकार के कार्यकलापों के प्रत्येक पहलू पर प्रश्न पूछ सकते हैं।
  • प्रश्नकाल के दौरान सरकार को कसौटी पर परखा जाता है और प्रत्येक मंत्री, जिसकी प्रश्‍नों का उत्तर देने की बारी होती है, को अपने प्रशासनिक कृत्यों में भूल चूक के संबंध में उत्तर देना होता है।
  • प्रश्‍नकाल संसदीय कार्यवाही का एक रोचक भाग है। यद्यपि प्रश्‍न में मुख्यतः जानकारी मांगी जाती है और एक विषय विशेष पर तथ्यों की जानकारी प्राप्त करने का प्रयत्न किया जाता है फिर भी कई बार प्रश्‍न पूछने वाले सदस्यों और उत्तर देने वाले मंत्रियों के बीच जीवंत और द्रुत हाजिरजवाबी देखने को मिलती है।
  • पिछले 70 वर्षों में, सांसदों ने सरकारी कामकाज पर प्रकाश डालने के लिए इस संसदीय उपकरण का सफलतापूर्वक उपयोग किया है। उनके सवालों ने वित्तीय अनियमितताओं को उजागर किया है और सरकारी कामकाज के बारे में डेटा और जानकारी को सार्वजनिक डोमेन पर लाया है। 1991 के बाद प्रश्नकाल के प्रसारण के साथ, प्रश्नकाल संसदीय कार्यप्रणाली का सबसे महत्वपूर्ण पहलू बन गया है।
  • भारत ने यह पद्धति इंग्लैंड से ग्रहण की है जहाँ सबसे पहले 1721 में इसकी शुरुआत हुई थी. भारत में संसदीय प्रश्न पूछने की शुरुआत 1892 के भारतीय परिषद् अधिनियम के तहत हुई.आज़ादी से पहले भारत में प्रश्न पूछने के अधिकार पर कई प्रतिबंध लगे हुए थे. लेकिन आज़ादी के बाद उन प्रतिबंधों का खत्म कर दिया गया।

प्रश्नकाल के दौरान पूछे जाने वाले प्रश्न

  • तारांकित प्रश्‍न: वह होता है जिसका सदस्य सभा में मौखिक उत्तर चाहता है और पहचान के लिए उस पर तारांक बना रहता है। जब प्रश्‍न का उत्तर मौखिक होता है तो उस पर अनुपूरक प्रश्‍न पूछे जा सकते हैं। मौखिक उत्तर के लिए एक दिन में केवल 20 प्रश्‍नों को सूचीबद्ध किया जा सकता है।
  • अतारांकित प्रश्‍न : वह होता है जिसका सभा में मौखिक उत्तर नहीं मांगा जाता है और जिस पर कोई अनुपूरक प्रश्‍न नहीं पूछा जा सकता। ऐसे प्रश्‍न का लिखित उत्तर प्रश्‍न काल के बाद जिस मंत्री से वह प्रश्‍न पूछा जाता है, उसके द्वारा सभा पटल पर रखा गया मान लिया जाता है। इसे सभा की उस दिन के अधिकृत कार्यवाही वृत्तान्त (ऑफिशियल रिपोर्ट) में छापा जाता है। लिखित उत्तर के लिए एक दिन में केवल 230 प्रश्‍नों को सूचीबद्ध किया जा सकता है।
  • अल्प सूचना प्रश्‍न : वह होता है जो अविलम्बनीय लोक महत्व से संबंधित होता है और जिसे एक सामान्य प्रश्‍न हेतु विनिर्दिष्ट सूचनावधि से कम अवधि के भीतर पूछा जा सकता है। एक तारांकित प्रश्‍न की तरह, इसका भी मौखिक उत्तर दिया जाता है जिसके बाद अनुपूरक प्रश्‍न पूछे जा सकते हैं।
  • गैर सरकारी सदस्‍य हेतु प्रश्‍न स्‍वयं सदस्‍य से ही पूछा जाता है और यह उस स्‍थिति में पूछा जाता है जब इसका विषय सभा के कार्य से संबंधित किसी विधेयक, संकल्‍प या ऐसे अन्‍य मामले से संबंधित हो जिसके लिए वह सदस्‍य उत्तरदायी हो। ऐसे प्रश्‍नों हेतु ऐसे परिवर्तनों सहित, जैसा कि अध्‍यक्ष आवश्‍यक या सुविधाजनक समझे जाएं, वही प्रक्रिया अपनायी जाती है जो कि किसी मंत्री से पूछे जाने वाले प्रश्‍न के लिए अपनायी जाती है।

शून्य काल एवं उसका महत्व

  • शून्यकाल की अवधारणा भारतीय संसद के पहले दशक में शुरू हुई, जब सांसदों को महत्वपूर्ण निर्वाचन क्षेत्र और राष्ट्रीय मुद्दों को उठाने की आवश्यकता महसूस हुई। शून्यकाल एक भारतीय संसदीय नवाचार है। शून्य काल का संसदीय प्रक्रिया के नियमों में उल्लेख नहीं है।
  • शून्यकाल का समय प्रश्नकाल के तुरंत बाद अर्थात दोपहर 12 बजे से 1 बजे तक होता होता है। इस अवधि में बिना अग्रिम सूचना के सांसद राष्ट्रीय मुद्दों को उठा सकते हैं। वर्षों से, दोनों सदनों के पीठासीन अधिकारियों ने इसे और भी प्रभावी बनाने के लिए शून्यकाल के काम को सुव्यवस्थित करने के निर्देश दिए हैं।
  • इसके महत्व का अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि इसे नियम पुस्तिका का हिस्सा नहीं होने के बावजूद नागरिकों, मीडिया, सांसदों और पीठासीन अधिकारियों से समर्थन प्राप्त है।

प्रश्‍नकाल का महत्व

  • प्रश्‍नकाल के माध्यम से सरकार राष्ट्र की नब्ज को तुरन्त पहचान लेती है और तदनुसार अपनी नीतियों और कृत्यों को उसके अनुरूप ढाल लेती है।
  • चूंकि सदस्य प्रश्‍नकाल के दौरान प्रासंगिक जानकारी प्राप्त करने का प्रयास करते हैं इसलिए राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय परिदृश्यों संबंधी सरकारी नीतियों पर पूरा ध्यान केन्द्रित होता है।
  • संसद में प्रश्‍नों के माध्यम से सरकार लोगों से संपर्क रख पाती है क्योंकि इसके माध्यम से ही सदस्य प्रशासन से संबंधित मामलों में लोगों की समस्याओं को प्रस्तुत कर पाते हैं। प्रश्‍नों से मंत्रालय अपनी नीति और प्रशासन के बारे में लोकप्रियता का अनुमान लगा लेते हैं।
  • प्रश्‍नों से मंत्रियों के ध्यान में ऐसी कई गलतियां सामने आ जाती हैं जिनपर शायद ध्यान नहीं जाता। कई बार जब उठाया गया मामला इतना गंभीर हो कि वह लोगों के दिमाग को आंदोलित कर दे और वह व्यापक लोक महत्व का हो तो प्रश्‍नों के माध्यम से किसी आयोग की नियुक्ति, न्यायालयी जांच अथवा कोई विधान भी बनाना पड़ जाता है।

आगे की राह

  • प्रश्नकाल का महत्व केवल सांसदों के प्रश्न पूछने के अधिकार तक सीमित नहीं है। इसका राजनीतिक प्रभाव भी है। संसद के इतिहास में प्रश्नकाल के कारण कई घोटाले सामने आए हैं। लोक सभा एवं राज्य सभा सचिवालय द्वारा यह कदम ऐसे समय में उठाया गया है जब जीडीपी में 23 प्रतिशत की गिरावट हुई है साथ ही भारत और चीन के बीच तनाव बढ़ रहा है , इसके अलावा राज्यों में बाढ़ ने कई लोगों की जान ले ली है, और कोविड के संकट का कोई हल निकट समय में दिखाई नहीं पड़ रहा है। ऐसे में आवश्यकता इस बात की है कि सरकार की जवाबदेहिता सुनिश्चित हो और संसदीय कार्यवाही संविधान की भावना के अनुरूप चले।

मुख्य परीक्षा प्रश्न :

  • प्रश्नकाल के माध्यम से सरकार राष्ट्र की नब्ज को तुरन्त पहचान लेती है और तदनुसार अपनी नीतियों और कृत्यों को उसके अनुरूप ढाल लेती है। चर्चा कीजिये ।