मानसून सत्र में प्रश्नकाल स्थगन - यूपीएससी, आईएएस, सिविल सेवा और राज्य पीसीएस परीक्षाओं के लिए समसामयिकी लेख

सन्दर्भ

  • महामारी को ध्यान में रखते हुए इस मानसून सत्र में संसद ने प्रश्नकाल को को स्थगित तथा शून्यकाल को समाप्त कर दिया। विपक्ष ने इसकी कड़ी आलोचना की है।

परिचय

  • लोकसभा और राज्यसभा के सचिवों ने अधिसूचित किया कि संसद के मानसून सत्र के दौरान कोई प्रश्नकाल नहीं होगा,तथा दोनों ही सदनों में शून्यकाल को भी प्रतिबंधित कर दिया गया है यह निर्णय कोविड -19 महामारी को ध्यान में रखकर लिया गया है । कोविड से निदान की रणनीतियों मे अपनी ह्रासोन्मुख भूमिका के फलस्वरूप संसद पहले से ही आलोचनाओं का शिकार थी। ऐसे में यह कदम कार्यपालिका पर संसदीय नियंत्रण को कमजोर कर रहा है। विपक्षी सांसदों ने इस कदम की आलोचना करते हुए कहा कि वे सरकार पर सवाल उठाने का अधिकार खो देंगे।
    प्रश्नकाल क्या है, प्रश्नकाल संसद का सबसे जीवंत तथा महत्वपूर्ण समय है । इसमें एक घंटे के दौरान संसद के सदस्य मंत्रियों से सवाल पूछते हैं और उन्हें अपने मंत्रालयों के कामकाज के लिए जिम्मेदार ठहराते हैं। सांसद जो प्रश्न पूछते हैं, वे सूचनाओं को तैयार करने और मंत्रालयों द्वारा उपयुक्त कार्रवाई नियंत्रित करते हैं। यह मंत्रिपरिषद पर संसद के नियंत्रण का मुख्य अवयव है।

प्रश्नकाल की प्रक्रिया :-

  • संसद में प्रश्नकाल के हर पहलू से निपटने के लिए व्यापक नियम हैं। और दोनों सदनों के पीठासीन अधिकारी प्रश्नकाल के संचालन के संबंध में अंतिम प्राधिकारी हैं। उदाहरण के लिए, आमतौर पर प्रश्नकाल एक संसदीय बैठक का पहला घंटा होता है। 2014 में, राज्यसभा के सभापति हामिद अंसारी ने सुबह 11 बजे से दोपहर 12 बजे तक सदन में प्रश्नकाल स्थानांतरित किया। यह कदम प्रश्नकाल के व्यवधान को रोकने के लिए था।
  • संसदीय नियम सांसदों द्वारा पूछे जाने वाले प्रश्नों के बारे में दिशानिर्देश प्रदान करते हैं। प्रश्नों को 150 शब्दों तक सीमित करना होगा। उन्हें सटीक होना है और बहुत सामान्य नहीं है। यह प्रश्न भारत सरकार के उत्तरदायित्व के क्षेत्र से भी संबंधित होना चाहिए। प्रश्नों को उन मामलों के बारे में जानकारी नहीं लेनी चाहिए जो गुप्त हैं या अदालतों के समक्ष निर्णय के अधीन हैं। यह दो सदनों के पीठासीन अधिकारी हैं जो अंत में तय करते हैं कि क्या सरकार द्वारा जवाब देने के लिए एक सांसद द्वारा उठाए गए प्रश्न को स्वीकार किया जाएगा।
  • 1952 में संसद की शुरुआत में, लोकसभा प्रश्न प्रतिदिन आयोजित किए जाने वाले प्रश्नकाल के लिए दिए गए थे। दूसरी ओर, राज्य सभा के पास सप्ताह में दो दिन प्रश्नकाल का प्रावधान था। कुछ महीनों बाद, इसे सप्ताह में चार दिन बदल दिया गया। फिर 1964 से, प्रश्नकाल सत्र के प्रत्येक दिन राज्यसभा में हो रहा था।
  • अब, सत्र के सभी दिनों में दोनों सदनों में प्रश्नकाल आयोजित किया जाता है। परन्तु दो स्थितियों जिस दिन राष्ट्रपति सेंट्रल हॉल में दोनों सदनों के सांसदों को संबोधित करते हैं, तथा जिस दिन वित्त मंत्री बजट पेश करते हैं उस दिन प्रश्नकाल निर्धारित नहीं होता है। वर्तमान लोकसभा की शुरुआत के बाद से, निचले सदन में लगभग 15,000 प्रश्न पूछे गए हैं।
  • मंत्रालयों को 15 दिन पहले प्रश्न मिलते हैं ताकि वे अपने मंत्रियों को प्रश्नकाल के लिए तैयार कर सकें। उन्हें ऐसे तीव्र अनुवर्ती प्रश्नों की तैयारी भी करनी होगी, जो वे सदन में पूछे जाने की अपेक्षा कर सकते हैं।
  • सांसद आमतौर पर मंत्रियों को जवाबदेह ठहराने के लिए सवाल पूछते हैं। लेकिन नियम उनके सहयोगियों को एक प्रश्न पूछने के लिए एक तंत्र भी प्रदान करते हैं। इस तरह के सवाल को एक विधेयक से संबंधित सांसद की भूमिका या उनके द्वारा प्रायोगिक किए जा रहे प्रस्ताव या सदन के कामकाज से जुड़े किसी अन्य मामले तक सीमित होना चाहिए, जिसके लिए वे जिम्मेदार हैं।

प्रश्नकाल का महत्व :-

  • पिछले 70 वर्षों में, सांसदों ने मंत्रिपरिषद पर प्रकाश डालने के लिए इस संसदीय उपकरण का सफलतापूर्वक उपयोग किया है। उनके सवालों ने वित्तीय अनियमितताओं को उजागर किया है और सरकारी कामकाज के बारे में डेटा और जानकारी को सार्वजनिक डोमेन पर लाया है। 1991 के बाद प्रश्नकाल के प्रसारण के साथ, प्रश्नकाल संसदीय कार्यप्रणाली का सबसे महत्वपूर्ण अंग बन चुका था सरकार के प्रश्न पूछना हमारे विधायी निकायों में एक लंबा इतिहास है। स्वतंत्रता से पूर्व भी यह सीमित रूप से प्रचलन में था 1893 में प्रश्नकाल का प्रथम उदहारण दृष्टिगोचर होता है।

शून्यकाल क्या है

  • शून्यकाल एक भारतीय संसदीय नवाचार है।यहाँ प्रश्नकाल की तरह नियम नहीं होते। यह वाक्यांश प्रक्रिया के नियमों में उल्लेख नहीं करता है। शून्यकाल की अवधारणा भारतीय संसद के पहले दशक में शुरू हुई, जब सांसदों को निर्वाचन क्षेत्र और राष्ट्रीय मुद्दों को उठाने की आवश्यकता महसूस हुई।
  • यह 12 बजे से 1 बजे दोपहर का समय शून्य काल हेतु निर्धारित है। वर्षों से, दोनों सदनों के पीठासीन अधिकारियों ने इसे और भी प्रभावी बनाने के लिए शून्यकाल के काम को सुव्यवस्थित करने के निर्देश दिए हैं। इसके महत्व का अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि इसे नियम पुस्तिका का हिस्सा नहीं होने के बावजूद नागरिकों, मीडिया, सांसदों और पीठासीन अधिकारियों से समर्थन प्राप्त है।

पूर्व के उदाहरण :-

  • संसदीय रिकॉर्ड बताते हैं कि 1962 में चीनी आक्रमण के दौरान, शीतकालीन सत्र उन्नत था। सदन की बैठक दोपहर 12 बजे शुरू हुई और कोई प्रश्नकाल आयोजित नहीं हुआ। सत्र से पहले, प्रश्नों की संख्या को सीमित करते हुए परिवर्तन किए गए थे। इसके बाद, सत्तारूढ़ और विपक्षी दलों के बीच एक समझौते के बाद, प्रश्नकाल स्थगित करने का निर्णय लिया गया। अतः यह प्रथम मानसून सत्र होगा जिसमे प्रश्नकाल नहीं होगा।

निष्कर्ष :-

  • महामारी की समस्या निश्चित ही व्यापक है। परन्तु जब देश की अर्थव्यवस्था , स्वास्थ्य तथा सीमा क्षेत्र तीनो ही संकट में हों ऐसे में कार्यपालिका हेतु संसदीय नियंत्रण को समाप्त करना लोकतान्त्रिक संसदीय प्रक्रिया के विरुद्ध है। यह व्यवस्था कार्यपालिका को मनमानी करने का अधिकार देगी जो शक्ति के बटवारे के सिद्धांत के विरुद्ध है। कोविड काल में अपने घटते भूमिका के चलते संसद की पहले ही आलोचना हो रही है ऐसे में यह निर्णय शीर्ष विधिक निकाय की साख को आघात करेगा। संसद को इस मामले में अपने विशेषाधिकार का पालन करते हुए जन हित में उचित निर्णय लेने की आवश्यकता है।

सामान्य अध्ययन प्रश्नपत्र 2

  • राजव्यवस्था

मुख्य परीक्षा प्रश्न :

  • प्रश्नकाल तथा शून्य काल कार्यपालिका पर संसदीय नियंत्रण के अवयव हैं इन्हे स्थगित कर कार्यपालिका, संसदीय नियंत्रण को समाप्त कर रही है। क्या आप कथन से सहमत हैं ? आपने उत्तर के पक्ष में तर्क प्रस्तुत करें ?