तालिबान और अफगान सरकार के मध्य शांति वार्ता - यूपीएससी, आईएएस, सिविल सेवा और राज्य पीसीएस परीक्षाओं के लिए समसामयिकी लेख

चर्चा में क्यों?

  • हाल ही में दोहा की राजधानी कतर में तालिबान और अफगान सरकार की शांति वार्ता की शुरुआत हो गई है। इस वार्ता के दौरान दोनों पक्ष कठिन मुद्दों को सुलझाने का प्रयास करेंगे । इनमें स्थायी संघर्ष विराम की शर्तें ,महिलाओं और अल्पसंख्यकों के अधिकार और हजारों की संख्या में तालिबान लड़ाकों का हथियार छोड़ना भी शामिल है। इस शांति समझौते को लेकर विशेषज्ञों के द्वारा अफगानिस्तान के भविष्य को लेकर जहां एक ओर काफी सारे प्रश्न उठाए गए हैंवहीं दूसरी ओर भारत के विदेश नीति के संदर्भ में भी इस समझौते को लेकर काफी चिंताएं बढ़ गई हैं।

परिचय

  • तालिबान ने अफगानिस्तान के राजनीतिक नेतृत्व के साथ वार्ता के लिए अपना एजेंडा तैयार करना शुरू कर दिया है। अफगानिस्तान में शांति प्रक्रिया को लेकर चल रही प्रकिया में इस कदम को महत्वपूर्ण माना जा रहा है। दोहा में तालिबान और अफ़गानिस्तान सरकार के प्रतिनिधियों के बीच पहली सीधी औपचारिक बातचीत हो रही है। इससे पहले तालिबान अफ़ग़ानिस्तान सरकार को 'शक्तिहीन और अमरीका की कठपुतली' बताकर, उनसे मिलने से इनकार करता रहा था । अब दोनों ही पक्ष राजनीतिक सुलह और हिंसा के दशकों लंबे दौर का अंत चाहते हैं, जो वर्ष 1979 में सोवियत आक्रमण के साथ शुरू हुआ था। क़ैदियों की अदला-बदली पर दोनों पक्षों के बीच महीनों चली रस्साकशी के बाद अब यह शांति वार्ता शुरू हो चुकी है। दरअसल, तालिबान जिन क़ैदियों की रिहाई चाहता था, उनमें से अधिकांश के बारे में अफ़गान सरकार की यह राय रही कि 'वो अपने लोगों को मारने वालों को कैसे छोड़ सकते हैं।

शांति वार्ता के मुद्दे एवं चुनौतियाँ

  • अफ़ग़ानिस्तान के कई लोग ये उम्मीद करते हैं कि सरकार को तालिबान से बातचीत में धार्मिक स्वतंत्रता, महिलाओं और अल्पसंख्यकों के अधिकार और प्रेस की स्वतंत्रता जैसी देश की प्रमुख उपलब्धियों की सुरक्षा करनी चाहिए।लेकिन, तालिबान इन मसलों पर कट्टर नज़रिया अपनाता आया है। वो शरिया लागू करने का पक्षधर रहा है। महिलाओं के अधिकारों के लिए काम कर रहे संगठनों का मानना है कि 'कहीं इस वार्ता के बाद अफ़गानिस्तान में महिलाओं के अधिकारों के क्षेत्र में बात जहाँ तक बढ़ी है, वो फिर से शून्य ना हो जाए। दोहा की बातचीत से ठीक पहले जिस तरह से आखिरी वक्त में जिस प्रकार से उदारवादी विचारधारा का प्रतिनिधित्व करने वाले शेर मोहम्मद अब्बास स्तानकजाई और मुल्ला बारादर को हटाकर कट्टरपंथी मौलवी अब्दुल हकीम हक्कानी को प्रमुख वार्ताकार बनाया गया है, उसने इन आशंकाओं को काफी ज्यादा बढ़ा दिया है।
  • कई मुद्दे ऐसे हैं जिन पर तालिबान का नज़रिया अभी बिल्कुल भी स्पष्ट नहीं है। जैसे क्या तालिबान लोकतांत्रिक प्रणाली का समर्थन करेगा? तालिबान वार्ताकारों के पास इसका अभी कोई सीधा जवाब नहीं है।
  • पिछले कुछ हफ़्तों में अफ़ग़ानिस्तान की राजधानी काबुल के आसपास कई तालिबानी हमले हुए।इससे अफ़ग़ानिस्तान के लोगों में तालिबान के हिंसा कम करने का वादा पूरा करने को लेकर चिंता बढ़ गई है।कुछ जानकारों का मानना है कि हिंसा ज़ारी रखकर तालिबान शांति वार्ता में खुद को ऊपर रखना चाहता है।शांति को लेकर "अस्पष्ट" दृष्टिकोण के लिए तालिबान की आलोचना होती रही है क्योंकि तालिबान ने शांति वार्ता को देखते हुए संघर्षविराम पर सहमति नहीं जताई। पिछले जनवरी से अब तक तालिबानी हमलों में 12000 अफगान नागरिक मारे गए वही 15,000 से ज्यादा लोग घायल हैं।
  • अमरीका-तालिबान समझौते में तय हुआ है कि अफ़ग़ान सरकार बातचीत से पहले 5,000 तालिबानी कैदियों को रिहा करेगी, जिसके बदले में चरमपंथी अपनी कैद से सुरक्षाबलों के एक हज़ार सदस्यों को रिहा करेंगे।तालिबान चाहता है कि पूरे पांच हज़ार कैदियों को रिहा किया जाए और वो जो लिस्ट दे, रिहा किए जाने वालों में वही लोग हों।लेकिन अमरीका-तालिबान वार्ता का हिस्सा नहीं रही सरकार ने इसका विरोध किया है।
  • तालिबान द्वारा हिंसा को छोड़ राजनीतिक दल में पूर्णता समाहित होना संभव नहीं है क्योंकि तालिबान का मानना है कि हिंसा से वो अपनी प्रभाव बनाए रख सकते हैं। इसके अलावा उन्हें इस बात की भी चिंता है कि अगर एक बार उनके लड़ाकों ने हथियार रख दिए तो ज़रूरत पड़ने पर उन्हें दोबारा तैनात करने में दिक़्क़त आएगी या हो सकता है कि वो इस्लामिक स्टेट समूह के उसके प्रतिद्वंद्वी चरमपंथियों की ओर चले जाएं।
  • बातचीत के बीच, तालिबान "अंतरिम" सरकार के गठन का सुझाव भी दे सकता है, जिसका वो भी हिस्सा होगा। हालांकि ये कैसे काम करेगी और ये मौजूदा राजनीतिक नेतृत्व को कहां लेकर जाएगी, फिलहाल ये स्पष्ट नहीं है।
  • हाल ही में प्रकाशित हुई संयुक्त राष्ट्र की इस्लामिक स्टेट और अलकायदा पर केंद्रित रिपोर्ट में कहा गया है कि भारतीय उपमहाद्वीप में अलकायदा तालिबान के छत्रछाया में अपने आतंकी गतिविधियों को जारी रख सकती हैं।
  • अमरीका-तालिबान समझौते के मुताबिक़, अगर तालिबान, अल-क़ायदा वाली बात मान लेता है और सरकार के साथ बातचीत शुरू करता है तो सभी अमरीकी सुरक्षाबल मई 2021 तक चले जाएंगे।दूसरे शब्दों में कहें तो उनकी वापसी अफ़ग़ान सरकार और तालिबान के बीच समझौते पर निर्भर नहीं है। आगामी चुनाव से पहले अमरीका राष्ट्रपति डोनल्ड ट्रंप ने बार बार संकेत दिया है कि वो अमरीका सैनिकों को जल्द से जल्द वापस घर लाना चाहते हैं।वो पहले ही नवंबर तक संख्या को पांच हज़ार करने का वादा कर चुके हैं, जो 2001 के बाद से सबसे कम संख्या है।

भारत की चिंता

  • अफगानिस्तान को विकसित करने के लिए भारत ने अरबों डॉलर का निवेश किया है। एक रिपोर्ट के अनुसार, भारत ने अफगानिस्तान को अबतक 3 अरब डॉलर से ज्यादा की सहायता दी है, जिससे वहां की संसद भवन, सड़कों और बांधों का निर्माण किया गया है। भारत अब भी 116 सामुदायिक विकास की परियोजनाओं पर काम कर रहा है। इनमें शिक्षा, स्वास्थ्य, कृषि, सिंचाई, पेयजल, रिन्यूएबल एनर्जी, खेल और प्रशासनिक ढांचे का निर्माण भी शामिल हैं। भारत काबुल के लिये शहतूत बांध और पेयजल परियोजना पर भी काम कर रहा है। 2016 के समझौते के तहत ईरान के चाबहार बंदरगाह से अफ़गान सीमा तक रेल चलाने की योजना है। भारत इस योजना को सफल बनाने में भी मदद करना चाहता है। ऐसे में यह शांति वार्ता विफल रहती है या उसके नतीजे भारत के अनुकूल नहीं रहते, तो भारत के लिए भी मुश्किलें बढ़ सकती हैं।
  • तालिबान पाकिस्तान के करीब है और भारत-पाकिस्तान के रिश्ते अच्छे नहीं हैं। अमरीका और तालिबान के बीच बातचीत कराने में पाकिस्तान की भूमिका भी छुपी हुई नहीं है। तालिबान के अपनी स्थिति मजबूत करते ही तहरीक-ए-तालिबान या पाकिस्तानी तालिबान अधिक आक्रामक रास्ते पर चलने और एक बड़े वैश्विक आतंकवादी नेटवर्क का हिस्सा बनने को प्रेरित हो सकता है। ये भारत के लिए गंभीर सुरक्षा चुनौतियों का कारण बन सकता है, विशेष रूप से केंद्र शासित प्रदेश जम्मू कश्मीर में, जिसे पहले ही भारी राजनीतिक और सामाजिक व्यवधानों का सामना करना पड़ा है। अफ़ग़ानिस्तान शांति समझौते का एक आयाम ये भी है कि इससे भारतीय उप महाद्वीप में इस्लामिक जिहादी समूहों को नई ताक़त मिलेगी। वो नई ताक़त से लैस होकर और हिंसक वारदातों को अंजाम दे सकते हैं ।
  • भारत की एक बड़ी चिंता यह है कि अमेरिका के बाहर निकलने से जो वैक्यूम पैदा होगा वह चीन द्वारा भरा जा सकता है। अफगान-सीमावर्ती झिंजियांग स्वायत्त क्षेत्र में उइघुर कट्टरपंथियों के साथ तालिबान के लिंक से सावधान, भारत चिंतित है कि बीजिंग इन लिंक से इस संवेदनशील क्षेत्र को बचाने के लिए पाकिस्तान से अपनी निकटता का उपयोग कर सकता है। इसने तालिबान के साथ संबंध बनाना भी शुरू कर दिया है।
  • अफगानिस्तान में जब राष्ट्रवादी सरकार स्थापित रहती है तो वह पाकिस्तान के साथ अपने सीमा विवाद को लेकर काफी मुखर रहता है जिससे पाकिस्तान सेना को पश्चिमी मोर्चे पर अपने सैनिकों की अधिक मात्रा में तैनाती करनी पड़ती है। इसका फायदा यह होता है कि वह भारत के साथ लगने वाली सीमा पर अपना सैन्य संकेंद्रण नहीं कर पाता जिससे भारत-पाकिस्तान सीमा पर पाकिस्तान सैन्य गतिविधियां और आतंकी घटनाएं कम होती हैं। तालिबान के सत्ता में आने पर यह स्थितियां प्रतिकूल हो जाएंगी जिससे भारत के साथ पाकिस्तान वाले सीमा पर और तनाव बढ़ सकता है।
  • अभी तक भारत ने ‘कोल्ड स्टार्ट’ सैन्य नीति के तहत एकीकृत युद्ध समूहों (आईबीजी) के गठन की प्रक्रिया को पूरा नहीं किया है। इसलिए अब भारत के लिए यह आवश्यक हो गया है कि पूर्व सतर्कता बनाए रखने और उचित समय पर पाक अधिकृत कश्मीर पर कब्ज़ा करने के लिए रणनीति तैयार रखी जानी चाहिए जिससे सीमा पार से आतंकवादी और अनौपचारिक लड़ाकू तत्वों की प्रगति को बाधित करना संभव हो सके,हालांकि यह काफी चुनौतीपूर्ण कार्य है।

आगे की राह

  • अफगान सरकार और तालिबान को अफगानिस्तान के भविष्य के लिये अपने निर्णयों का पुनर्मूल्यांकन करने और अपने दृष्टिकोण में अधिक सर्वव्यापी होने की आवश्यकता है। चूंकि भारत ने अभी भी तालिबान को मान्यता नहीं दी है, इस संदर्भ में देखा जाये तो बदलती राजनीतिक एवं सुरक्षा स्थिति को ध्यान में रखते देखते हुए भारत को तालिबान के साथ बातचीत शुरू करने के लिये खुलेपन की नीति को अपनाना चाहिये ।
  • भारत सरकार द्वारा किए गए कार्यों और प्रयासों ने अफगान नागरिकों के बीच भारत के लिए एक सकारात्मक माहौल तैयार करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। इसने अफगानिस्तान को एक मजबूत लोकतंत्र बनाने के लिए अफगान लोगों में सक्रिय भागीदारी को भी प्रोत्साहित किया है। अफगान लोग दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र से प्रभावित हैं और अपने देश में भी भारत जैसी लोकतांत्रिक व्यवस्था चाहते हैं। विशेषज्ञों का कहना है कि एक निकटतम पड़ोसी के तौर पर भारत अफगानिस्तान सरकार और वहां के लोगों को एक शांतिपूर्ण, लोकतांत्रिक और समृद्ध भविष्य के लिए उनकी आकांक्षाओं को साकार करने के लिए सभी तरह की सहायता देना जारी रखेगा जिसमें अफगान समाज के सभी वर्गों के हित संरक्षित हों।
  • भारत सरकार के द्वारा अफगानिस्तान में लोकतंत्र की बहाली एवं नागरिक मूल्यों की स्वतंत्र समेत महिलाओं की आजादी के पक्ष में तालिबान के रुख परिवर्तन हेतु पश्चिमी देशों के साथ मिलकर दबाव डाला जाना चाहिए जिससे एक शांति एवं समृद्धि अफगानिस्तान की स्थापना को बढ़ावा दिया जा सके।

मुख्य परीक्षा प्रश्न :

  • अफगान सरकार और तालिबान के बीच वार्ता से स्थायी युद्ध विराम, अल्पसंख्यकों, महिलाओं एवं समाज के कमज़ोर वर्गों के हितों जैसे मुद्दों को किस प्रकार संरक्षित किया जा सकता है ? चर्चा कीजिये ।