बाह्य अंतरिक्ष: संभावनाएं एवं चुनौतियाँ - यूपीएससी, आईएएस, सिविल सेवा और राज्य पीसीएस परीक्षाओं के लिए समसामयिकी लेख

सन्दर्भ:-

  • कोविड-19 महामारी के दौरान भी विभिन्न देशों की अंतरिक्ष एजेंसियों व निजी कम्पनियों (यथा-स्पेस एक्स आदि) ने बाह्य अंतरिक्ष (Outer Space) में कई अभियान भेजे हैं।

परिचय

  • बाह्य अंतरिक्ष को मानव उपयोग में लाने तथा इसके बारे में और अधिक पता लगाने के लिए, पिछले काफी लम्बे समय से विभिन्न देशों की सरकारी अंतरिक्ष एजेंसियाँ प्रयासरत हैं।
  • शीत युद्ध के दौरान बाह्य अंतरिक्ष में अन्वेषण की प्रतिद्वंदिता संयुक्त राज्य अमेरिका और सोवियत संघ में देखने को मिलती थी। उस समय सोवियत संघ ने जहाँ ‘स्पूतनिक’ (Sputnik) अभियान भेजा तो वहीं अमेरिका ने ‘अपोलो-11’ अभियान भेजा।
  • लेकिन अब अंतरिक्ष क्षेत्र में वैश्विक स्तर पर कई शक्तियाँ मजबूती के साथ उभरकर सामने आयी हैं, यथा-चीन, भारत, जापान, फ्रांस आदि। इसके अतिरिक्त, अंतरिक्ष क्षेत्र के दोहन हेतु कई निजी कम्पनियाँ भी सामने आयी हैं, यथा- स्पेस-एक्स (Space-X), अमेजन आदि।

कोविड-19 महामारी के दरम्यान प्रमुख अंतरिक्ष अभियान

  • कोविड-19 महामारी के दौरान भी अंतरिक्ष गतिविधियाँ अनवरत रूप से जारी रहीं। विभिन्न देशों की सरकारी एजेंसियों व निजी कम्पनियों ने बाह्य अंतरिक्ष में अपने कई अभियान भेजे हैं।
  • चीन और संयुक्त राज्य अमेरिका ने हाल ही में अपने-अपने मार्श मिशन (Mars Mission)भेजे हैं।
  • अरब क्षेत्र में संयुक्त अरब अमीरात ने बाह्य अंतरिक्ष क्षेत्र में काफी प्रगति की है। संयुक्त अरब अमीरात ने भी हाल ही में मार्श आर्बिटर मिशन भेजा है।
  • कोविड-19 महामारी के दरम्यान ही चीन ने अपने बेइदू नेविगेशन सिस्टम को पूर्ण किया है।
  • अमेरिका के स्पेस कमांड (Space Command) का कहना है कि रूस ने हाल ही में अंतरिक्ष आधारित एंटी-सैटेलाइट हथियार (Space based anti-satellite weapon) का परीक्षण किया है।
  • ‘स्पेस एक्स’ कम्पनी के द्वारा अंतर्राष्ट्रीय अंतरिक्ष स्टेशन (आईएसएस) में भेजे गये दो अंतरिक्ष यात्री अगस्त, 2020 को सुरक्षित वापस लौट आये हैं। दरअसल नासा (NASA) ने निजी कम्पनी ‘स्पेस-एक्स’ के रॉकेट (फॉल्कन-9) से दो अंतरिक्ष यात्रियों को आईएएसस भेजा था। यह दुनिया की प्रथम ‘वाणिज्यक अंतरिक्ष यात्रा’ थी।

अंतरिक्ष उद्योग की वृद्धि (Space Industry Growth)

  • वर्तमान में स्पेस इंडस्ट्री (अंतरिक्ष उद्योग) काफी तेजी से फल-फूल रहा है। आज निम्न-भू कक्षा (Low Earth Orbit-LEO) में सैटेलाइट को भेजना काफी सस्ता हो गया है। स्पेस-एक्स जैसी निजी कम्पनियाँ एलईओ में सैटेलाइट को भेजने हेतु लगभग 2770 डॉलर प्रति किलोग्राम का मूल्य निर्धारित करती हैं।
  • आज मानव के अंतरिक्ष पर्यटन के सिद्धांत ने भी जोर पकड़ा है। इसके लिए कई एजेंसियाँ सुविधा उत्पन्न करा रही हैं या इसकी ओर अग्रसर हैं।
  • बैंक ऑफ अमेरिका का कहना है कि वर्तमान में बाह्य अंतरिक्ष मार्केट लगभग 350 बिलियन डॉलर की है जिसके 2050 तक 2-7 ट्रिलियन डॉलर तक पहुँचने की संभावना है।
  • विशेषज्ञों का कहना है कि जैसे सॉफ्टवेयर उद्योग ने जिस तर्ज पर अपनी उन्नति की है, उसी तर्ज पर अंतरिक्ष उद्योग भी उन्नति कर सकता है। सॉफ्टवेयर उद्योग के प्रारंभिक दिनों में एप्पल ने निजी ऐप डेवलपर्स (App Developers) को अपने प्लेटफॉर्म पर ऐप स्टोर (Store) करने की अनुमति दी थी, जिसके कारण इस क्षेत्र में बूम आया था और फिर गूगल (गूगल प्ले स्टोर) आदि ने भी इस ओर अपने कदम बढ़ाये।
  • ‘स्पेस-एक्स’ कम्पनी की स्टारलिंक (Starlink) परियोजना है, जिसमें वह छोटे-छोटे लगभग 10 हजार सैटेलिाइट को ‘निम्न भू कक्षा’ में लॉन्च करेगी ताकि पूरे विश्व में इंटरनेट कनेक्टिविटी को बढ़ाया जा सके। इसी प्रकार से अमेजन का भी ‘प्रोजेक्ट कूपिअर’ (Project Kuiper) है जिसके तहत यह कम्पनी लगभग 3000 माइक्रो सैटैलाइट लॉन्च करेगी।
  • स्पेस-एक्स और अमेजन के अतिरिक्त, अंतरिक्ष क्षेत्र में अन्य भी महत्वपूर्ण निजी कम्पनियाँ हैं, यथा- प्लेनेट (Planet), ए स्पायर ग्लोबल (Spire Global), ए आइसी (Iceye) आदि। ये कम्पनियाँ आर्बिटल वेन्टेज प्वाइंट (Orbital Vantage Points) का इस्तेमाल करके आँकड़ों को एकत्र व विश्लेषित कर रही हैं ताकि मौसम पूर्वानुमान, वैश्विक स्तर पर लॉजिस्टिक, फ़सल हार्वेस्टिंग, आपदा प्रबंधन आदि को सुदृढ़ किया जा सके।

बाह्य अंतरिक्ष क्षेत्र में चुनौतियाँ

  • अभी बाह्य अंतरिक्ष क्षेत्र में लोकतांत्रिक भावना देखने को मिलती है अर्थात यहाँ सभी देशों का बराबर हक है और किसी एक देश या समूह का प्रभुत्व नहीं है। जिस देश के पास तकनीक है, वह बाह्य अंतरिक्ष क्षेत्र का दोहन करता है (बिना किसी हस्तक्षेप के)। किन्तु अब धीरे-धीरे बाह्य अंतरिक्ष क्षेत्र भी भीड़-भाड़ युक्त (Crowded) होता जा रहा है अर्थात् यहाँ अब अधिक संख्या में सैटेलाइट लॉन्च किये जा रहे हैं। सघन होते अंतरिक्ष क्षेत्र के रेगुलेशन व गवर्नेंस हेतु बहुपक्षीय फ्रेमवर्क (Multilateral Framework) पुराना है, जो एक चिंता का विषय है।
  • एक अध्यनन के अनुसार छोड़े गए उपग्रहों में से मात्र 5 प्रतिशत ही वर्तमान में चालू अवस्था में हैं, जबकि शेष 95 प्रतिशत उपग्रह कचरे का रूप में अभी भी अपनी कक्षाओं में निरंतर चक्कर लगा रहे हैं। बाह्य अंतरिक्ष क्षेत्र भी भीड़-भाड़ एवं कचरे के बढ़ने से विशेषज्ञों ने केसलर सिंड्रोम की अवधारणा को सामने रखा है जो वाह्य अंतरिक्ष में बढ़ते प्रदुषण को बताता है। केसलर सिंड्रोम की अवधारणा के अनुसार एक ऐसी स्थिति है जिसमें पृथ्वी की निम्न कक्षा में वस्तुओं का घनत्व अत्यधिक बढ़ जाने से दो वस्तुओं के बीच टकराव की सम्भावना बढ़ जाती है जोकि एक बड़े पैमाने पर विनाश पैदा कर सकता है क्योकि सैटेलाइट टके आपस में टकराने से काफी मलबा उत्पन्न होगा जो पुनःजो आगे चलकर टकराव की संभावना को बढ़ाएगा।
  • अंतरिक्ष क्षेत्र को विनियमित करने हेतु अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर 1960 व 1970 के दशक के कई कानून एवं संधियाँ हैं, उदाहरणस्वरूप 1967 की बाह्य अंतरिक्ष संधि आदि। अब इन कानून व संधियों के प्रावधान अप्रासंगिक हो चले हैं।
  • 1979 की चंद्रमा संधि (Moon Treaty) को अभी तक बड़ी-बड़ी अंतरिक्ष शक्तियों (अर्थात् देशों) ने अनुमोदित नहीं किया है, जो इसकी प्रासंगिकता पर सवाल खड़ा करता है।
  • अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर ऐसा कोई कानून या संधि नहीं है जो बाह्य अंतरिक्ष से संबंधित विवादों के लिए एक ‘विवाद निवारण मैकेनिज्म’ उपलब्ध कराती हो। यदि कोई देश ने गलती से या जानबूझकर किसी अन्य देश के सैटेलाइट को नष्ट कर दिया तो इसका समाधान कैसे किया जायेगा, इसके लिए अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर कोई समाधान तंत्र नहीं है।
  • अभी तक अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर जितने भी लीगल फ्रेमवर्क बने थे वो विभिन्न देशों की सरकारी अंतरिक्ष एजेंसियों को ध्यान में रखकर बनाये गये थे किन्तु अब इस क्षेत्र में बहुत सी निजी कम्पनियाँ भी आ गयी हैं।
  • विभिन्न देशों द्वारा अंतरिक्ष का सैन्यीकरण भी किया जा रहा है अर्थात् वह अपनी सैन्य गतिविधियों को संचालित करने हेतु अंतरिक्ष उपयोग कर रहे हैं, जो भविष्य में अंतरिक्ष का युद्ध को जन्म दे सकता है।
  • भविष्‍य में स्‍पेस वॉर (Space War) की आशंकाओं के मद्देनजर दुनिया के बड़े मुल्‍कों ने अपनी तैयारियों को तेज कर दिया है। इन्‍हीं प्रयासों के तहत पिछले वर्ष अमेरिका ने अंतरिक्ष में अपने हितों की रक्षा करने के लिए स्‍पेस कमांड (Space Command- अंतरिक्ष कमान) की स्थापना की है जोकि अंतरिक्ष में सैन्य प्रतिस्पर्धा को तीव्र करेगा।

बाह्य अंतरिक्ष और भारत

  • भारत की स्पेस एजेंसी ‘इसरो’ ने पिछले कुछ समय में अंतरिक्ष क्षेत्र में भावी उपलब्धियाँ हासिल की हैं। इसरो ने चन्द्रयान व मंगलयान जैसे महत्वपूर्ण मिशनों को लॉन्च किया है।
  • भारत सरकार ने अंतरिक्ष क्षेत्र में देश में निजी कम्पनियों को बढ़ावा देने हेतु ‘इन-स्पेस’ (IN- SPACe, Indian National Space Promotion and Authorization Centre) संस्था का गठन किया है। यह संस्था अंतरिक्ष विभाग (भारत सरकार) के अंतर्गत कार्य करती है।
  1. अंतरिक्ष गतिविधियों में निजी क्षेत्र की भागीदारी से न केवल इस क्षेत्र में तेजी आएगी बल्कि भारतीय उद्योग विश्व की अंतरिक्ष अर्थव्यवस्था में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकेगा। इसके साथ ही प्रौद्योगिकी के क्षेत्र में बड़े पैमाने पर रोजगार की संभावनाएं हैं और भारत एक ग्लोबल टेक्नोलॉजी पावरहाउस बन रहा है।
  2. नवसृजित भारतीय राष्ट्रीय अंतरिक्ष संवर्धन तथा प्रमाणीकरण केंद्र (इन-स्पेस) भारतीय अंतरिक्ष अवसंरचना का उपयोग करने हेतु निजी क्षेत्र की कंपनियों के लिए समान अवसर उपलब्ध करायेगा।
  • भारत निम्नलिखित भावी अभियानों को आगे चलकर अंतरिक्ष क्षेत्र में लॉन्च करेगा-
  1. चन्द्रयान-3 के तहत लैंडर को भेजा जायेगा
  2. प्रथम अंतरिक्ष मानव मिशन (स्वदेशी)
  3. 2050 तक भारत का खुद का स्पेस स्टेशन
  • हालाँकि भारत में भी अभी तक स्पेस क्षेत्र को रेगुलेट करने हेतु कोई व्यापक कानून या नीति नहीं है।

आगे की राह

  • वर्तमान में बाह्य अंतरिक्ष क्षेत्र के गवर्नेंस हेतु एक अंतर्राष्ट्रीय कानून व संधि की नितांत आवश्यकता है ताकि इस क्षेत्र में भविष्य में किसी भी प्रकार के संघर्ष को टाला जा सके। बाह्य अंतरिक्ष क्षेत्र का शांतिपूर्ण उपयोग पूरी मानवता की भलाई हेतु होना चाहिए। सभी देशों को अंतरिक्ष में बढ़ते प्रदूषण के साथ-साथ अंतरिक्ष के सैन्यीकरण को नियंत्रण लगाने हेतु सम्मिलित रूप से प्रयास करने होंगे जिससे मानव जाति के कल्याण हेतु अंतरिक्ष के सुरक्षित उपयोग को प्रोत्साहित किया जा सके। भारत को अंतरिक्ष क्षेत्र के विकास हेतु न सिर्फ देश में ही व्यापक कानून बनाने की आवश्यकता है बल्कि भारत को अंतर्राष्ट्रीय मंचों पर अंतरिक्ष के सुरक्षित उपयोग के लिए पुरजोर कोशिश करनी चाहिए।

मुख्य परीक्षा प्रश्न :

  • पिछले कुछ समय से वैश्विक स्तर पर देखने में आया है कि बाह्य अंतरिक्ष क्षेत्र में गतिविधियाँ काफी बढ़ी हैं। बाह्य अंतरिक्ष क्षेत्र में व्याप्त चुनौतियों के साथ-साथ इसके भावी उपयोग हेतु रणनीति पर भी चर्चा करें।