गुटनिरपेक्ष आंदोलन और भारत की विदेश नीति - यूपीएससी, आईएएस, सिविल सेवा और राज्य पीसीएस परीक्षाओं के लिए समसामयिकी लेख

चर्चा में क्यों?

  • हाल ही में भारत के विदेश मंत्री ‘एस जयशंकर’ ने अपने बयान में कहा है कि भारत की विदेश नीति में गुटनिरपेक्ष आंदोलन (Non Aligned Movement-NAM) का तत्त्व (Element) एक विशेष काल एवं संदर्भ (Specific era and content) में ही प्रासंगिक था। भारत अब गुटनिरपेक्षता ( NAM) से आगे निकल गया है, ये आंदोलन एक खास दौर के लिए था, अब भारत एक अलग दौर में है।

गुटनिरपेक्ष आंदोलन के बारे में

  • द्वितीय विश्व युद्ध के बाद विश्व धीरे-धीरे मुख्यतः दो गुटों में बँट गया था। एक गुट का नेतृत्व पूँजीवादी देश अमेरिका कर रहा था जबकि दूसरे गुट का नेतृत्व साम्यवादी देश सोवियत संघ कर रहा था।
  • इन दोनों गुटों की प्रतिद्वंदिता को शीत युद्ध (Cold war) के युग से जाना जाता है। शीत युद्ध का दौर द्वितीय विश्व युद्ध के बाद से शुरू होकर सोवियत संघ के विघटन (वर्ष 1990-91) तक चला था।
  • 1940-50 के दशकों (मुख्यतः द्वितीय विश्व युद्ध के पश्यात्) वैश्विक पटल पर कई देश उपनिवेशवाद की दासता से स्वतंत्र हुए थे। भारत भी इसी श्रेणी में शामिल था, क्योंकि भारत को भी द्वितीय विश्व युद्ध के बाद ब्रिटिश उपनिवेशवाद से 1947 में स्वतंत्रता मिली थी।
  • अमेरिका और सोवियत संघ के बीच होड़ लगी हुई थी कि ज्यादा से ज्यादा देशों को अपने-अपने गुटों में शामिल किया जाये। किन्तु उपनिवेशवाद से स्वतंत्र हुए नवीन देश किसी भी ग्रुप में शामिल नहीं होना चाहते थे, उन्हें लगता था कि यदि किसी ग्रुप में शामिल हुए तो वे किस सैन्य संघर्ष में फिर से फँस सकते हैं। इससे उन्हें हाल ही में मिली स्वतंत्रता का कोई मतलब नहीं रह जायेगा।
  • इसलिए उपनिवेशवाद से स्वतंत्र हुए इन नवीन देशों ने ‘गुटनिरपेक्ष आंदोलन’ की स्थापना की। गुटनिरपेक्ष आंदोलन में शामिल देश अमेरिका या सोवियत संघ के समूह से दूर थे।
  • भारत ने भी अपनी विदेश नीति में गुटनिरपेक्षता के तत्त्व को अपनाया और गुटनिरपेक्ष आंदोलन में शामिल हो गया, ताकि अमेरिका व सोवियत संघ के बीच के किसी भी तरह के संघर्ष से दूर रहकर देश के विकास पर ध्यान केन्द्रित कर सके। इसके अतिरिक्त, भारत ने गुटनिरपेक्ष आंदोलन में शामिल होकर अपनी विदेश नीति में काफी हद तक स्वतंत्रता को सुनिश्चित किया।
  • गौरतलब है कि सन् 1961 में गुटनिरपेक्ष आंदोलन का प्रथम सम्मेलन बेलग्रेड में आयोजित किया गया था।
  • गुटनिरपेक्ष आंदोलन की स्थापना के बाद से इसमें लगातार सदस्यों की संख्या बढ़ी है।
  • इस समय भारत सहित गुटनिरपेक्ष आंदोलन के 120 विकासशील देश सदस्य हैं। इसके अलावा, इस समूह (गुटनिरपेक्ष आंदोलन के समूह) में 10 अंतर्राष्ट्रीय संगठनों व 17 देशों को पर्यवेक्षक का दर्जा मिला हुआ है।
  • वैश्विक स्तर पर संयुक्त राष्ट्र संघ (यूएनओ) के बाद ‘गुटनिरपेक्ष आंदोलन’ सबसे बड़ा राजनीतिक समन्वय और परामर्श का मंच है।

गुटनिरपेक्ष आंदोलन के उद्देश्य

  • शीत युद्ध की राजनीति में शामिल नहीं होना और अमेरिका या सोवियत संघ के किसी भी गुट में शामिल नहीं होना।
  • जो देश अभी उपनिवेशवाद से आजाद हुए हैं, उनकी स्वतंत्रता का अनुरक्षण करना तथा जो देश अभी उपनिवेशवाद के चंगुल से नहीं निकल पाये हैं, उनकी आजादी के लिए प्रयत्न करना।
  • सार्वभौमिक परमाणु निरस्त्रीकरण (Universal Nuclear Disarmament) को बढ़ावा देना।
  • वैश्विक स्तर पर सैन्य संघर्षों को हतोत्साहित करना तथा इससे दूरी भी बनाये रखना।
  • रंगभेद की नीति का विरोध करना। गौरतलब है कि उस समय दक्षिण अफ्रीका जैसे देशों में रंगभेद की नीति काफी तीव्र थी।
  • वैश्विक स्तर पर मानवाधिकारों के संरक्षण पर बल देना।

सोवियत संघ के विघटन के बाद गुटनिरपेक्ष आंदोलन

  • सोवियत संघ का विघटन 1990-91 में हुआ था और नब्बे के दशक आते-आते गुटनिरपेक्ष के अधिकतर उद्देश्य अप्रासंगिक हो चले थे।
  • सोवियत संघ के विघटन के बाद शीत युद्ध की समाप्ति हो गयी। इससे गुटनिरपेक्ष आंदोलन की किसी भी गुट/ग्रुप में न शामिल होने का उद्देश्य/लक्ष्य अप्रासंगिक हो गया।
  • नब्बे के दशक तक विश्व के सभी देश स्वतंत्र हो चुके थे। इससे गुटनिरपेक्ष आंदोलन की साम्राज्यवाद व उपनिवेशवाद के विरोध का लक्ष्य अप्रासंगिक हो गया।
  • गुटनिरपेक्ष आंदोलन का एक प्रमुख उद्देश्य था कि सार्वभौमिक परमाणु निरस्त्रीकरण को बढ़ावा देना। लेकिन द्वितीय विश्व युद्ध के बाद परमाणु सम्पन्न देशों ने परमाणु निरस्त्रीकरण के बजाय अपने परमाणु हथियारों के जखीरे को बढ़ाने पर अधिक ध्यान केन्द्रित किया। गुटनिरपेक्ष आंदोलन के सदस्य देश ही परमाणु परीक्षणों को अंजाम दे रहे थे।

गुटनिरपेक्ष आंदोलन और भारत

  • भारत, गुटनिरपेक्ष आंदोलन का एक प्रमुख देश है अतः इस आंदोलन की स्थापना के बाद से ही भारत इसके सिद्धांतों का पालन करता आया है। हालाँकि कुछ देशों ने भारत के परमाणु परीक्षण और सोवियत संघ से आपसी मित्रता संधि को लेकर सवाल खड़े किये थे।
  • गुटनिरपेक्ष आंदोलन की स्थापना के बाद से इसके शिखर सम्मेलन में भारत के प्रधानमंत्री भाग लेते आ रहे थे। किन्तु वर्ष 2016 और 2018 में भारतीय प्रधानमंत्री ने गुटनिरपेक्ष आंदोलन (नैम) के शिखर सम्मेलन में भाग नहीं लिया तो ऐसा माना जाने लगा कि शायद भारत के लिए नैम का महत्त्व कम हो गया है।
  • हालाँकि कोविड-19 महामारी के दरम्यान नैम के मई, 2020 में आयोजित आभासी शिखर सम्मेलन में भारतीय प्रधानमंत्री ने भाग लिया था।

नब्बे के दशक के बाद भारतीय विदेश नीति (गुटनिरपेक्ष आंदोलन से विचलन)

  • नब्बे के दशक में जब गुटनिरपेक्ष आंदोलन (नैम) कमजोर पड़ा तो भारतीय विदेश नीति में इस आंदोलन का महत्त्व भी कम हो गया अर्थात् अब यह भारत की विदेश नीति का प्रमुख तत्त्व नहीं रह गया।
  • नैम के तत्त्व की जगह देश की विदेश नीति में रणनीतिक स्वायत्तता (Strategic Autonomy) पर बल दिया गया। किन्तु चाहे नैम हो या फिर रणनीतिक स्वायत्तता, दोनों में ही एंटी यूएसए की झलक देखने को मिलती थी, अतः विशेषज्ञ इस नीति को भी उपयुक्त नहीं मानने लगे।
  • इसके, बाद सरकार ने मल्टी अलायमेंट (Multi-alignment) पर जोर दिया अर्थात् भारत अपने हितों के मुताबिक कई संगठनों में शामिल होने लगा। लेकिन इससे भारत की छवि एक अवसरवादी देश के रूप में रूपान्तरित होने का खतरा व्याप्त हो गया।
  • मल्टी अलायमेंट के बाद ‘मुद्दा आधारित साझेदारी या गठबंधन’ (issue based partnership or coalition) पर जोर दिया गया। लेकिन भारत की विदेश नीति का यह तत्त्व भी धीरे-धीरे ठण्डे बस्ते में चला गया।
  • अभी हाल ही में भारत के विदेश मंत्री एस-जयशंकर ने कहा कि हमारी विदेश नीति में ‘एडवांसिंग प्रोस्पेरिटी एण्ड इन्फ्रलुएंस’ (Advancing Prospertiy and Influence) के तत्त्व को प्रमुखता से अपनाया जायेगा। हालाँकि विदेश मंत्री ने अपने बयान में यह भी स्पष्ट किया कि भारतीय विदेश नीति में नैम (NAM) के तत्व पर कम बल देने का यह तात्पर्य नहीं है कि भारत किसी गठबंधन का हिस्सा होने जा रहा है। फिलहाल भारत किसी भी गठबंधन का हिस्सा नहीं बनेगा।
  • कुछ विशेषज्ञों का कहना अभी जिस तरह के लद्दाख में हालात हैं, उन्हें देखते हुए भारत को अपनी झिझक छोड़कर पूरी तरह से अमेरिका के गुट में शामिल हो जाना चाहिए। हालाँकि भारत सरकार अभी इस मामले में किसी भी तरह की जल्दबाजी में नहीं है।

गुटनिरपेक्ष आंदोलन की चुनौतियां

  • गुटनिरपेक्ष आंदोलन प्रारंभ हुआ था तब शक्ति के आधार पर विश्व दो ध्रुवों में बटा हुआ था लेकिन वर्तमान वैश्विक राजनीति में हुए परिवर्तन ने विश्व को बहु-ध्रुवीय बना दिया है। क्षेत्रीय प्रतिद्वंदिता एवं भूमंडलीकरण के कारण राष्ट्रों के बीच में निर्भरता को बढ़ावा दिया है जिससे गुटनिरपेक्ष आंदोलन के मुख्य विषय वस्तु के तत्व को कमजोर कर दिया है।
  • बहुत सारे वैश्विक एवं क्षेत्रीय मुद्दों पर गुटनिरपेक्ष आंदोलन के सदस्य देशों के मध्य ना केवल व्यापक असहमति है बल्कि कई सारे सदस्य गुटनिरपेक्ष आंदोलन के मूल मूल्यों को तिलांजलि देते हुए कई क्षेत्रीय एवं प्रतिस्पर्धी और गुटों में शामिल हो गए हैं। यूरोपीय यूनियन जहाँ आर्थिक और राजनीतिक प्रतिबद्धताओं के फलस्वरूप एकीकृत हो रहा है, वहीं दक्षिण एशिया में आसियान, सार्क जैसे गुट सक्रिय हैं
  • गुटनिरपेक्ष आंदोलन वर्तमान की समस्याओं को लेकर भी गंभीर प्रयास नहीं कर रहा है और आतंकवाद, जलवायु परिवर्तन, शरणार्थी समस्याओं पर इस समूह का कोई एजेंडा नहीं दिख रहा है
  • गुटनिरपेक्ष आंदोलन के सदस्य देशों अपने आपसी मतभेदों को भी दूर करने में नाकाम रहे हैं जिससे सदस्य देशों में संगठन के प्रति आकर्षण कम हो गया है। उदाहरण के लिए इराक-ईरान युद्ध, भारत और चीन के मध्य मतभेद
  • गुटनिरपेक्ष आंदोलन मेंअग्रणी भूमिका रखने वाले देशों में कई अवसरों पर गुटनिरपेक्षता के सिद्धांतों से समझौता किया है। उदाहरण के लिए भारत द्वारा परमाणु परीक्षण, अमेरिकी सैन्य समझौता, क्वाड (भारत,अमेरिका, जापान तथा ऑस्ट्रेलिया) समझौता इत्यादि।

गुटनिरपेक्ष आंदोलन का महत्व

  • द्वितीय विश्व युद्ध के बाद कई संस्थाएं अस्तित्व में आई लेकिन धीरे-धीरे यह संस्थान बदलते वैश्विक परिवेश में स्वयं को ढालने में ना केवल असफल साबित हुई बल्कि विश्व को अंतरराष्ट्रीय नेतृत्व प्रदान करने में भी इनकी विफलता सामने आई है जिससे सदस्य देशों में इन संगठनों के प्रति काफी रोष व्याप्त हुआ है। इसे निम्न तरीकों से समझा जा सकता है-
  1. संयुक्त राष्ट्र संघ कई मुद्दों पर युद्ध रोकने में ना केवल असफल हुआ है वही बदलते वैश्विक परिवेश के अनुसार इसमें अपने संगठन के ढांचे एवं पारदर्शिता में अपेक्षित सुधार नहीं किया है उदाहरण के लिए संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में।
  2. कोविड-19 महामारी को लेकर विश्व स्वास्थ्य संगठन की कार्य प्रणाली को संदेह के घेरे में खड़ा कर दिया है
  3. विश्व बैंक, विश्व व्यापार संगठन, G20 इत्यादि जैसे संगठन की महामारी, वैश्विक मंदी इत्यादि जैसे मुद्दों पर अप्रभावी साबित हुए हैं
  • वैश्विक संगठनों कीअसफलता से मोहभंग हुए राष्ट्रों को तमाम वैश्विक मुद्दों पर एक साथ लाने के संदर्भ में गुटनिरपेक्ष आंदोलन का महत्व बढ़ जाता है क्योंकि 120 सदस्य देशों के साथ इस संगठन का आधार बहुत ही व्यापक है। निम्न वैश्विक मुद्दों के संदर्भ में गुटनिरपेक्ष आंदोलन के महत्व को समझा जा सकता है जोकि भारत के लिए भी उतनी ही महत्वपूर्ण है जितनी अन्य देशों के लिए-
  1. दुनिया से गरीबी और भुखमरी के उन्मूलन में
  2. जलवायु परिवर्तन पर एक समग्र दृष्टिकोण विकसित करने में
  3. आतंकवाद, मादक पदार्थ एवं मानव तस्करी जैसे अपराधों को दूर करने में
  4. क्षेत्रीय प्रतिस्पर्धा एवं क्षेत्रीय गुटबाजी को रोकने में
  5. गरीब देशों को नव साम्राज्यवाद से मुक्ति दिलाने हेतु

निष्कर्ष

  • वर्तमान में मानवता कई दशकों के सबसे बड़े संकट से गुजर रही है। इस समय गुट निरपेक्ष देश वैश्विक एकजुटता को प्रोत्साहित करने में सहायक हो सकते हैं। गुट निरपेक्ष देश हमेशा विश्व का नैतिक स्वर रहे हैं और इस भूमिका को निभाने के लिए गुट निरपेक्ष देशों को समावेशी रहना होगा। कोविड-19 महामारी से उबरने के बाद दुनिया को वैश्वीकरण की एक नई व्यवस्था की आवश्यकता होगी। कोविड-19 ने हमें वर्तमान अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था की सीमाओं से परिचित कराया है। कोविड-19 से उबरने के बाद के विश्व में हमें पारदर्शिता, समानता और मानवता पर आधारित वैश्वीकरण की नई व्यवस्था की आवश्यकता होगी। हमें ऐसे अंतरराष्ट्रीय संस्थानों की आवश्यकता है जो आज के विश्व का बेहतर ढंग से प्रतिनिधित्व कर सकें।
  • इसके अलावा आज की अंतर्राष्ट्रीय परिस्थितियों में गुटनिरेपक्ष देशों को अपना अस्तित्व कायम रखने के लिये और अधिक सक्रिय सजग भूमिका निर्वाह करना होगा। गुटनिरपेक्ष देशों के निःशस्त्रीकरण की भावना को प्रोत्साहित करते हुये अविकसित देशों में हस्तक्षेप की नीति को कम करने का प्रयास करने होगें। नवीन अंतर्राष्ट्रीय अर्थव्यवस्था के निर्माण में गुट निरपेक्ष देशों को विकासशील राष्ट्रों के मध्य आर्थिक सहयोग को प्रोत्साहित करना होगा। शीत युद्ध एंव वारसा पैक्ट की समाप्ति के पश्चात गुटनिरपेक्षता का कोई ठोस राजनीतिक महत्व नहीं रह गया इसलिये इन राष्ट्रों को अपनी सार्थकता बनाये रखने के लिये आर्थिक क्षेत्र में प्रभावशील करने की आवश्यकता है।
  • भारत को केवल आर्थिक उन्नति ही नहीं बल्कि मानव कल्याण को भी प्रोत्साहित करना चाहिए। भारत ने लंबे समय तक इन चुनौतियों का सफलतापूर्वक सामना किया है। गुटनिरपेक्ष आंदोलन को सशक्त बनाने मे भारत की भूमिका महत्वूपर्ण रही है एवं भारत को हमेशा यह प्रयास करना चाहिये कि गुटनिपरेक्ष देश अंतर्राष्ट्रीय राजनीति में महत्वपूर्ण भूमिका का निर्वाह करें।

मुख्य परीक्षा प्रश्न :

  • गुटनिरपेक्ष आंदोलन क्या है? इसकी भारतीय विदेश नीति में क्या भूमिका रही है? नब्बे के दशके के बाद भारत की विदेश नीति ने किस प्रकार के बदलावों को अनुभव किया? संक्षेप में मूल्यांकन करें।