‘लक्ष्मण रेखा’ का उल्लंघन करने की अनुमति किसी को भी नहीं - समसामयिकी लेख

की-वर्डस :- राजद्रोह, शक्तियों के पृथक्करण का सिद्धांत, न्यायिक सक्रियता, न्यायिक अतिक्रमण, हितों का टकराव।

चर्चा में क्यों?

  • हाल ही में भारत के सर्वोच्च न्यायालय ने अपने आदेश के माध्यम से देशद्रोह कानून के संचालन पर रोक लगा दी है।
  • सर्वोच्च न्यायालय ने अपने आदेश में कहा है कि जब तक इसकी पुन: जांच की प्रक्रिया पूरी नहीं हो जाती, तब तक सरकारों द्वारा देशद्रोह कानून का इस्तेमाल जारी रखना उचित नहीं होगा।
  • सर्वोच्च न्यायालय की इस कार्यवाही पर प्रतिक्रिया देते हुए कानून मंत्री ने कहा है कि किसी को भी 'लक्ष्मण रेखा' पार नहीं करना चाहिए और न्यायालय को सरकार और विधायिका का सम्मान उसी प्रकार करना चाहिए, जिस प्रकार सरकार न्यायालय का सम्मान करती है।

शक्तियों के पृथक्करण का सिद्धांत :-

  • यह सिद्धांत राज्य की शक्तियों को विधायिका, कार्यपालिका और न्यायपालिका में विभाजित करता है। हालांकि विद्वान भिन्न-भिन्न प्रकार से इसे परिभाषित करते हैं, सामान्य तौर पर इस सिद्धांत की निम्नलिखित तीन विशेषतायें हैं :-
  1. प्रत्येक अंग में विशेष क्षमता वाले विशिष्ट व्यक्ति होने चाहिए, अर्थात एक अंग में कार्य करने वाला व्यक्ति दूसरे अंग का हिस्सा नहीं होना चाहिए।
  2. एक अंग को दूसरे अंगों के कामकाज में हस्तक्षेप नहीं करना चाहिए।
  3. एक अंग को दूसरे अंग का कार्य नहीं करना चाहिए I

इस प्रकार, इन तीनों अंगों का व्यापक क्षेत्र निर्धारित होता है, लेकिन भारत जैसे विशाल और विविधता वाले देश में, तीनों अंगों के मध्य संघर्ष और अतिक्रमण अक्सर देखने को मिलता है।   

संवैधानिक प्रावधान :-

  • अनुच्छेद 50 :- यह अनुच्छेद न्यायपालिका को कार्यपालिका से पृथक करने का दायित्व राज्य पर डालता है। लेकिन, चूंकि यह राज्य के नीति निदेशक तत्वों के अंतर्गत आता है, इसलिए यह न्यायालय द्वारा वादयोग्य नहीं है।
  • अनुच्छेद 53 और 154 :- ये प्रावधान करते हैं कि संघ और राज्य की कार्यकारी शक्ति राष्ट्रपति और राज्यपाल में निहित होगी और वे दीवानी और आपराधिक दायित्व से छूट प्राप्त करेंगे।
  • अनुच्छेद 121 और 211 :- ये प्रावधान करते हैं कि विधायिका सर्वोच्च न्यायालय या उच्च न्यायालय के न्यायाधीश के आचरण पर चर्चा नहीं कर सकती है। वे ऐसा केवल महाभियोग की स्थिति में ही कर सकते हैं।
  • अनुच्छेद 123 :- राष्ट्रपति, देश के कार्यकारी प्रमुख होने के नाते, कुछ शर्तों में विधायी शक्तियों का प्रयोग करने की शक्ति रखते हैं।
  • अनुच्छेद 361 :- राष्ट्रपति और राज्यपालों को न्यायालयी कार्यवाही से छूट प्रदान की गयी है, वे अपने कार्यालय की शक्तियों और कर्तव्यों के प्रयोग और प्रदर्शन के लिए किसी भी न्यायालय के प्रति जवाबदेह नहीं होंगे।

न्यायिक उच्चारण :-

  • केशवानंद भारती बनाम केरल राज्य (1973) :-
  • इस मामले में, सर्वोच्च न्यायालय ने कहा कि संसद की संविधान संशोधन की शक्ति बुनियादी विशेषताओं अर्थात मूलभूत ढाँचे के अधीन है। इसलिए, बुनियादी ढाँचे का उल्लंघन करने वाले किसी भी संशोधन को असंवैधानिक घोषित किया जाएगा।
  • स्वर्ण सिंह केस (1998) :-
  • इस मामले में सर्वोच्च न्यायालय ने एक दोषी को, यूपी के राज्यपालों द्वारा माफी दिए जाने की प्रक्रिया को असंवैधानिक करार दिया था।

  • राम जवाया कपूर बनाम पंजाब राज्य (1955) :-
  • इस मामले में, यह माना गया कि भारतीय संविधान ने वास्तव में शक्तियों के पृथक्करण के सिद्धांत को अपनी पूर्ण कठोरता में मान्यता नहीं दी है, लेकिन सरकार के विभिन्न भागों या शाखाओं के कार्यों में पर्याप्त रूप से अंतर/ विभाजन किया गया है। इसके परिणामस्वरूप यह निष्कर्ष निकाला जा सकता है कि भारतीय संविधान किसी भी एक अंग को किसी दूसरे अंग की शक्तियों में अनावश्यक हस्तक्षेप को स्वीकार नहीं करता है।
  • इंदिरा नेहरू गांधी बनाम राज नारायण (1975) :-
  • जब प्रधानमंत्री के चुनाव के संबंध में विवाद सर्वोच्च न्यायालय के समक्ष लंबित था, ऐसे में यह माना गया कि एक विशिष्ट विवाद का निर्णय एक न्यायिक कार्य है जिसमें संसद, संविधान संशोधन की शक्ति के माध्यम से हस्तक्षेप नहीं कर सकती है।

न्यायिक सक्रियता :-

  • प्रगतिशील और नई सामाजिक नीतियों के पक्ष में पारंपरिक उदाहरणों से हटने के लिए प्रेरित करता है।
  • न्यायिक सक्रियता न्यायाधीशों को अन्याय को रोकने के लिए, अपनी शक्तियों का उपयोग करने की शक्ति देती है, विशेषकर जब सरकार की अन्य शाखाएं अपने दायित्वों का निर्वहन नहीं करती हैं।
  • न्यायालयों को नागरिक अधिकारों, व्यक्तिगत अधिकारों की सुरक्षा, राजनीतिक अन्याय और सार्वजनिक नैतिकता जैसे मुद्दों पर सामाजिक नीति को आकार देने में सक्रिय भूमिका निभानी चाहिए।

न्यायिक अतिरेक :-

  • जब न्यायपालिका, विधायिका और कार्यपालिका की भूमिकाओं और कार्यों का निर्वहन स्वयं करती है, जिससे शक्तियों के पृथक्करण की अवधारणा कमजोर होती है, तो यह न्यायिक अतिरेक बन जाती है। न्यायपालिका की ओर से अनर्गल सक्रियता अक्सर इसे न्यायिक अतिरेक की ओर ले जाती है।

न्यायिक अतिरेक से संबंधित मुद्दे :-

  • 'शक्तियों के पृथक्करण' के सिद्धांत को कमजोर करता है :- यह संविधान में निहित 'विधायी, कार्यपालिका और न्यायपालिका के बीच शक्तियों के पृथक्करण' की भावना को कमज़ोर कर देता है।
  • सीमित अनुभव :- कई मामलों में, न्यायालय को विशेषज्ञता प्राप्त नहीं हैं। शराब पर प्रतिबंध जैसे मामलों में, न्यायपालिका के द्वारा दिए गये निर्णय में आर्थिक, पर्यावरणीय और राजनीतिक कीमत के मापन संबंधी अनुभव की कमी झलकती है।
  • कोई बाहरी विनियमन नहीं :- 5 साल की चुनाव प्रक्रिया के माध्यम से कार्यपालिका लोगों के प्रति "जवाबदेह" रहती है, लेकिन न्यायाधीश स्व-नियमन का प्रयोग करते हैं और किसी भी बाह्य नियंत्रण से स्वतंत्र होते हैं और इस प्रकार केवल स्वयं के प्रति जवाबदेह होते हैं, न कि जनता के प्रति।
  • हितों का टकराव :- कभी-कभी जब न्यायिक सक्रियता का प्रयोग किया जाता है तो यह केवल स्वार्थी, राजनीतिक या व्यक्तिगत कारणों से किया जाता है।
  • संसद में विश्वास को कम करता है :- यह संसद और निर्वाचित प्रतिनिधियों में लोगों के विश्वास को कम करता है क्योंकि बार-बार अतिरेक कार्यकारी निष्क्रियता और अक्षमता की ओर संकेत करती है।
  • अलोकतांत्रिक शासन :- न्यायिक अतिरेक लोकतंत्र में 'अनिर्वाचित के अत्याचार' के कार्य के रूप में प्रकट होता है।
  • न्यायालय के समय की बर्बादी :- यह न्यायालय के समय की बर्बादी है, जिसका उपयोग न्यायालय के समक्ष लंबित सार्वजनिक महत्व से संबंधित अन्य महत्वपूर्ण मामलों के निर्णय के लिए किया जा सकता है।

निष्कर्ष :-

  • कठोर शब्दों में शक्तियों के पृथक्करण का सिद्धांत अवांछनीय और अव्यावहारिक है और इसलिए अब तक इसे किसी भी देश में पूरी तरह से स्वीकार नहीं किया गया है, लेकिन इसका अभिप्राय यह नहीं है कि यह सिद्धांत आज की दुनिया में प्रासंगिक नहीं है। इस सिद्धांत के पक्ष में दिए जाने वाले तर्क अभी भी मान्य है।
  • सिद्धांत के पीछे तर्क कठोर वर्गीकरण के बजाय ध्रुवता का है, जिसका अर्थ है कि निरपेक्ष सत्ता से बचने के लिए शक्ति का विकेंद्रीकरण किया जाना चाहिए। लॉर्ड एक्टन का कथन है, "शक्ति भ्रष्ट करती है और पूर्ण शक्ति पूर्णतया से भ्रष्ट करती है”। इसलिए शक्ति को एक हाथ में केंद्रित नहीं होना चाहिए, सुचारू कामकाज के लिए परीक्षण और संतुलन की एक प्रणाली को बनाए रखना आवश्यक है।
  • न्यायपालिका से अपेक्षा की जाती है कि वह कानून और संविधान के प्रति अपनी प्राथमिक निष्ठा बनाए रखे।

स्रोत :-

सामान्य अध्ययन प्रश्नपत्र 2:
  • सरकार के अंगों के बीच शक्तियों के पृथक्करण का सिद्धांत।

मुख्य परीक्षा प्रश्न:

  • हाल ही में, राजद्रोह कानून के मामले पर कार्यपालिका और न्यायपालिका के बीच मतभेद देखने को मिला है। इस संदर्भ में, न्यायपालिका द्वारा शक्तियों के पृथक्करण के सिद्धांत की विभिन्न मामलों में जो व्याख्या की गई है, उस पर चर्चा कीजिये। साथ ही, न्यायिक सक्रियता और न्यायिक अतिरेक से उत्पन्न होने वाले मुद्दों की व्याख्या कीजिये।