स्वास्थ्य देखभाल सुविधाओं को समावेशी बनाने की आवश्यकता - यूपीएससी, आईएएस, सिविल सेवा और राज्य पीसीएस परीक्षाओं के लिए समसामयिकी लेख

संदर्भ

  • भारतीय स्वास्थ्य सेवा प्रणाली पिछले एक दशक में नई तकनीकों को अपनाने के साथ-साथ प्रणालीगत परिवर्तन और सेवा की गुणवत्ता पर जोर देने के कारण बहुत विकसित हुई है। हालांकि, स्वास्थ्य देखभाल मानक पूरे देश में न तो एक समान हैं और न ही समावेशी। ऐसे में कोविड महामारी ने पूरे भारत में स्वास्थ्य सेवाओं की कमियों को उजागर किया है।

भारत में स्वास्थ्य सुविधाओं में असमानता

  • देश के स्वास्थ्य ढांचे में व्यापक पैमाने पर असमानता है।
  • एक ओर शहरी क्षेत्रों में लोगों के लिए उन्नत स्वास्थ्य परीक्षण और उपचार प्रौद्योगिकियों के साथ अत्याधुनिक निजी स्वास्थ्य सुविधाएं मौजूद हैं।
  • वहीं दूसरी ओर एक शून्य है जहां बुनियादी स्वास्थ्य देखभाल सुविधाओं के लिए भी लोगों को संघर्ष करना पड़ रहा है।
  • देश की वर्तमान अनुमानित 135 करोड़ जनसंख्या में से प्रत्येक 1,445 लोगों में केवल एक डॉक्टर है। जो डबल्यूएचओ के 1,000 लोगों में लिए एक डॉक्टर के निर्धारित मानदंड से कम है।
  • ग्रामीण स्वास्थ्य अवसंरचना की स्थिति तो अत्यधिक खेदजनक है। 60 प्रतिशत प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों में केवल एक चिकित्सक है जबकि लगभग पांच प्रतिशत प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र ऐसे हैं जहाँ एक भी चिकित्सक नहीं है।
  • देश में नर्स और रोगी अनुपात 1:483 है। इसका तात्पर्य है कि देश में 20 लाख नर्सों की कमी है। ग्रामीण स्वास्थ्य सांख्यिकी–2017 के अनुसार, भारत में 156,231 उप-केंद्रों में से 78,569 पुरुष स्वास्थ्य कर्मियों के बिना थे, सहायक नर्स मिडवाइव के बिना 6,371 उप-केंद्र थे और 4,263 उपकेंद्रों में न तो पुरुष स्वास्थ्य कर्मी थे न ही सहायक नर्स मिडवाइव थे।
  • डब्ल्यूएचओ अध्ययन के मुताबिक भारत के शहरी और ग्रामीण दोनों क्षेत्रों में स्वास्थ्य-श्रमिक पर्याप्त रूप से योग्य नहीं हैं। शहरी और ग्रामीण एलोपैथिक डॉक्टरों में 58 फीसदी और 19 फीसदी डॉक्टर, चिकित्सकीय रूप से योग्य थे। ग्रामीण इलाकों में अभ्यास करने वाली नर्सों और दाइयों के लिए केवल 33 फीसदी ने माध्यमिक विद्यालय से ऊपर अध्ययन किया है और 11 फीसदी के पास मेडिकल योग्यता है, जैसा कि रपोर्ट में अनुमान लगाया गया है।
  • ध्यातव्य है कि 2018 में भारत का जन स्वास्थ्य खर्च, जीडीपी का 1.28% था। विश्व बैंक के अनुसार, 2017 में भारत की 62.4% जनसंख्या ऐसी थी जिसके पास कोई स्वास्थ्य बीमा कवर नहीं था।
  • इसका तात्पर्य यह हुआ कि इनमें से कोई व्यक्ति बीमारी से ग्रसित होता है तो उसे इसका खर्च स्वयं वहन करना पड़ेगा।
  • विश्व बैंक के मुताबिक, वैश्विक स्तर पर 2017 में आउट ऑफ पॉकेट स्वास्थ्य खर्च (out-of-pocket health expenditure) का प्रतिशत 18.2% था, जबकि भारत का 62.4% था।
  • आउट ऑफ पॉकेट स्वास्थ्य खर्च का तात्पर्य ऐसे स्वास्थ्य खर्च से है, जिसे जनता प्रत्यक्ष रूप से अपनी सेविंग (पॉकेट) से वहन करती है अर्थात जिस पर किसी भी प्रकार का स्वास्थ्य बीमा नहीं होता है।

भारत में स्वास्थ्य क्षेत्र में मौजूद प्रमुख चुनौतियां

गुणवत्तापूर्ण स्वास्थ्य सेवाओं तक पहुँच की कमी

  • ग्रामीण आबादी के बीच गुणवत्तापूर्ण स्वास्थ्य सेवा की पहुंच एक बड़ी चुनौती है।
  • इसके दो प्रमुख कारण हैं-
  • पहला ग्रामीण क्षेत्र में स्वास्थ्य सेवाओं की अनुपलब्धता
  • दूसरा कारण उपचार के लिए दूर के अस्पतालों में जाने का मतलब यात्रा में अतिरिक्त

खर्च और कम से कम एक दिन की दिहाड़ी का नुकसान।

  • स्वास्थ्य सेवा तक पहुंच की कमी स्वास्थ्य सेवाओं की मांग को भी नकारात्मक रूप से प्रभावित करती है। जिससे स्वास्थ्य सेवाओं की पहुँच में देरी तो होती ही है साथ ही और देश के स्वास्थ्य सेवा के दायित्व (country’s healthcare burden) पर भी अधिक गंभीर प्रभाव पड़ता है। जागरूकता की कमी
  • स्वास्थ्य जागरूकता में कमी के लिए खराब शिक्षा या कार्यात्मक साक्षरता के न होने को जिम्मेदार ठहराया जा सकता है। इसके अलावा विभिन्न स्तरों पर जागरूकता पर पर्याप्त ध्यान न दिया जाना भी एक कारण है।
  • जागरूकता और व्यवहार परिवर्तन का अभाव सेवा की गुणवत्ता के साथ विशेषीकृत उपचार की उपलब्धता को प्रभावित करता है।
  • हालांकि क्षेत्रीय स्तर पर जागरूकता बढ़ाने के प्रयासों का आशाजनक परिणाम मिल सकते हैं।

संवेदनशीलता की कमी

  • अक्सर मरीजों के प्रति स्वास्थ्य कार्यकर्ताओं की संवेदनशीलता की कमी और स्वास्थ्य संस्थानों में, विशेषकर सार्वजनिक स्वास्थ्य केन्द्रों में, लापरवाही देखने को मिलती है।
  • सार्वजनिक अस्पताल जो कम लागत या निःशुल्क स्वास्थ्य सेवाएं प्रदान करते हैं, उनकी क्षमता और गुणवत्ता के प्रति लोगों का विश्वास बहुत ही कम है।
  • जो निजी अस्पतालों के खर्च को वहन कर सकते हैं उनके लिए निजी क्षेत्र आमतौर पहली पसंद होता है।
  • यह सुनिश्चित करने के लिए कि भारत में हर एक मरीज की देखभाल एक संवेदनशील, प्रशिक्षित और सक्षम स्वास्थ्य कार्यकर्ता हो, एक स्पष्ट मानव संसाधन नीति को लागू करने की आवश्यकता है।

स्वास्थ्य सुविधाओं में व्याप्त असमानता को दूर करने के उपाय

कम लागत में स्वास्थ्य देखभाल

  • स्वास्थ्य सेवा क्षेत्र को लागत के प्रति सचेत रहने की आवश्यकता है - अनावश्यक परीक्षणों और प्रक्रियाओं पर होने वाले व्यय को कम किए जाने की आवश्यकता है।
  • जवाबदेही सुनिश्चित करने के लिए स्पष्ट प्रक्रियाओं के अनुपालन को सुनिश्चित किया जाना चाहिए।

बाधाओं की पहचान

  • स्वास्थ्य सेवा की पहुंच को बाधित करने वाले कारकों जैसे भौगोलिक, वित्तीय, सामाजिक और प्रणालीगत आदि सभी कारकों की पहचान की जानी चाहिए।
  • साथ ही उनका पूर्ण विश्लेषण करके लोगों को इन कारकों के प्रति संवेदनशील बनाना चाहिए ताकि इनके उन्मूलन के लिए दीर्घकालिक कार्रवाई की जा सके।
  • डॉक्टरों, नर्सों, चिकित्सा और तकनीकी कर्मचारियों को प्रशिक्षित, कुशल और आवश्यक उपकरणो से लैस करने की आवश्यकता है।
  • इसके अलावा उनकी सेवाओं को क्षेत्र में समान रूप से वितरित किया जाना चाहिए।
  • दूरस्थ और ग्रामीण क्षेत्रों में कर्मचारियों की कमी को दूर किया जाना चाहिए।

डिजिटल नवाचार

  • स्वास्थ्य क्षेत्र में चुनौतियों को दूर करने में डिजिटल नवाचार एक बड़ी भूमिका निभा सकता है।
  • मांग-आधारित स्वास्थ्य सेवाएं की पहुँच के लिए डॉक्टरों को मरीजों से जोड़ने ले लिए डिजिटल तकनीकी से वेब (वेबसाइट या ऐप) या फोन माध्यमों का उपयोग किया जा सकता है।
  • इसमें मरीज अपनी सुविधानुसार रोग-विशेषज्ञों का चयन कर सकते हैं और ओर स्वयं ही उनसे मिलने का समय और दिन निर्धारित कर सकते हैं।
  • ऑनलाइन पोर्टल रोगियों के चिकित्सकीय परीक्षण के परिणाम भी ऑनलाइन ही प्रदान करते हैं, साथ ही रिपोर्ट के प्रेक्षण और बीमारी के विस्तृत विवरण से रोगियों को अवगत करा देते हैं, जिससे डॉक्टरों के समय बचत होती है, और मरीज को भी लैब और अस्पताल के चक्कर नहीं लगाने पड़ते हैं।

अत्याधुनिक प्रौद्योगिकी

  • स्वास्थ्य सेवा में अत्याधुनिक प्रौद्योगिकी के अनुप्रयोग को बढ़वा दिये जाने की आवश्यकता है, जिसमें-
  • ड्रोन के माध्यम जीवन रक्षक दवाओं, रक्त आदि की डिलीवरी
  • दुर्गम क्षेत्रों में दूरस्थ उपकरणों से संचालित रोबोटिक सर्जरी
  • टेलीमेडिसिन का अनुप्रयोग
  • संवर्धित वास्तविकता (augmented reality) के उपयोग से दूर बैठे विशेषज्ञों जुड़कर चिकित्सा परामर्श और निदान की सुविधाओं को बढ़ाया जाना।

अन्य

  • मेडिकल बीमा जैसे उत्पादों के के सम्बन्ध में लोगों को स्वास्थ्य बीमा करवाने के लिए प्रोत्साहित करना चाहिये। जिससे एक वहनीय स्वास्थ्य सेवा तक सबकी पहुच सुनिश्चित हो।

निष्कर्ष

    न्यायसंगत, निष्पक्ष और पारदर्शी तरीके से सार्वभौमिक स्वास्थ्य की पहुँच को सुनिश्चित करने के लिए स्वास्थ्य संबंधी बुनियादी चुनौतियों का समाधान किया जाना अत्यंत महत्वपूर्ण है। स्वास्थ्य के मुद्दों पर लोगों को संवेदनशील बनाने और स्वस्थ एवं सुरक्षित व्यवहार को बढ़ावा देने के लिए सरकारी और निजी दोनों स्तर पर प्रयास किए जाने चाहिए।
    निजी क्षेत्र अपनी कॉर्पोरेट सामाजिक जिम्मेदारी के माध्यम से स्वास्थ्य में समावेशिता लाने की दिशा में महत्वपूर्ण सहयोग दे सकता है।
    स्वास्थ्य क्षेत्र में डिजिटल नवाचार समवेशी स्वास्थ्य सुविधाओं की पहुँच, उपलब्धता और वहनीयता जैसे मुद्दों को हल करने की क्षमता रखता है, बशर्ते इसे शीघ्रता से अपनाया जाना चाहिए।