लघु सिंचाई: टिकाऊ कृषि के लिए आगे का रास्ता - यूपीएससी, आईएएस, सिविल सेवा और राज्य पीसीएस परीक्षाओं के लिए समसामयिकी लेख

सन्दर्भ:-

  • भारत पानी की कमी और जनसंख्या विस्फोट की दोहरी चुनौती का सामना कर रहा है। वर्तमान जल संकट ने लगभग 600 मिलियन लोगों को प्रभावित किया है। 2050 तक जनसंख्या बढ़कर 160 होने का अनुमान है, यह बढ़ी हुयी पानी कि मांग में और वृद्धि करेगी जिससे पानी की कमी के मुद्दों में इजाफा ही होने वाला है।
  • जलवायु परिवर्तन और पानी की कमी के इस युग में, लघु सिंचाई पद्धति फसलों की उपज बढ़ाने और पानी, उर्वरक तथा श्रम आवश्यकताओं को कम करने में मदद कर सकती है।

कृषि: पानी की कमी के लिए जिम्मेदार कारक

पानी की कमी के लिए विभिन्न कारक जिम्मेदार हैं, उनमें से कृषि और जलवायु परिवर्तन प्रमुख कारक है:

कृषि क्षेत्र

  • देश में ताजे पानी का सर्वाधिक उपयोग करने वाला सबसे बड़ा क्षेत्र है। यह देश में प्रति वर्ष निकले जाने वाले लगभग 761,000 बिलियन लीटर ताजे का 90 प्रतिशत खपत करता है।
  • भारत की कृषि पारिस्थितिकी चावल, गेहूँ, गन्ना, जूट और कपास जैसी फसलों के अनुकूल है, जिसके उत्पादन में अधिक जल की आवश्यकता होती है।
  • इन फसलों वाले कृषि क्षेत्रों में जल संकट की समस्या विशेष रूप से विद्यमान है। हरियाणा और पंजाब में पानी की कमी का मुख्य कारण सिंचाई गहन कृषि ही है।
  • भारत में कृषि क्षेत्र में प्रति व्यक्ति पानी की खपत प्रति वर्ष 4,913 से 5,800 किलोलीटर प्रति व्यक्ति है।

जलवायु परिवर्तन

  • जलवायु परिवर्तन मौसम को बहुत प्रभावित करता है। भारत में वर्षा के लिए प्रमुख रूप से जिम्मेदार मानसून की अस्थिरता के पीछे जलवायु परिवर्तन एक प्रमुख कारण है।
  • अस्थिर मानसूनी वर्षा जल संकट का एक बड़ा कारण है।
  • यह किसानों की आजीविका को नकारात्मक रूप से प्रभावित करता है। इस प्रकार पानी की कमी में कृषि का अधिकतम योगदान है। हालांकि, कृषि को पानी की कमी के कारण सबसे अधिक नुकसान भी उठाना पड़ा रहा है।

पानी की कमी से कृषि को होने वाला नुकसान

  • भारत में लगभग 85 प्रतिशत किसान छोटे या सीमांत किसान हैं, जो सिंचाई के लिए अधिकांशतः वर्षा या सतही जल पर निर्भर रहते हैं।
  • वर्षा के प्रतिरूप में तेजी से परिवर्तन होता जा रहा है और वर्षा के साथ-साथ सतही जल की मात्रा लगातार कमी हो रही है, जिससे सिंचाई की लागत साल दर साल बढ़ती जा रही है।
  • कृषि में सिंचाई के लिए पानी के अधिक उपयोग से एक तरफ जल स्तर नीचे जा रहा है, तो वहीं दुसरी तरफ मिट्टी की लवणता और उसके स्वास्थ्य में गिरावट के कारण फसल उत्पादकता में भी कमी आई है।
  • हालांकि सरकारें कृषि के मुद्दों का सामना करने के विकल्पों की तलाश कर रहीं हैं।
  • केंद्र सरकार ने “हर खेत को पानी” के ध्येय के साथ प्रधानमंत्री कृषि सिचाई योजना नामक एक व्यापक कार्यक्रम शुरू किया, जिसमें लघु सिंचाई तकनीकों के माध्यम से पानी के उपयोग को कम करने पर जोर दिया गया।

लघु सिंचाई: कृषि क्षेत्र में पानी की कमी का उत्कृष्ट समाधान

  • लघु सिंचाई में कम पानी की आवश्यकता होती है:
  • लघु सिंचाई पद्धति के प्रयोग से सिंचाई जल की 20 से 48 प्रतिशत तक बचत होती है। लघु सिंचाई में पानी को सीधे पौधों की जड़ों में पहुंचाया जाता है जिससे अनावश्यक जमीन में पानी नहीं फैलता है और पानी वाष्पीकरण भी कम होता है।
  • इससे लगभग 75-95 प्रतिशत तक उच्च जल उपयोग दक्षता को प्राप्त किया जा सकता है।
  • पारंपरिक सिंचाई पद्धति से होने नुकसान से बचने के लिए लघु सिंचाई पद्धति का उपयोग किया जाना अपरिहार्य हैं।
  • लघु सिंचाई उर्वरक आवश्यकताओं को भी कम करती है:
  • लघु सिंचाई में पानी के साथ उर्वरकों को भी सीधे पौधों के जड़ों में पहुंचाया जाता है।
  • इससे पौधों को संतुलित मात्र में पोषक तत्व मिलते हैं और उर्वरकों की आवश्यकता मे न लगभग 7 से 42 प्रतिशत तक कमी हो सकती है।
  • इससे किसानों की लागत में कमी आएगी साथ ही उर्वरक की मात्रा और दक्षता में भी सुधार होगा।
  • लघु सिंचाई से बंजर भूमि को भी कृषि के लिए उपयोगी बनाया जा सकता है: केंद्र सरकार के आंकड़ों के अनुसार 519.43 हेक्टेयर बंजर भूमि को किसानों में इस पद्धति के प्रयोग से कृषि योग्य भूमि में बदला है।
  • लघु सिंचाई पद्धति में पौधों को नुकसान पहुंचाए बिना ही सिंचाई में खारे पानी का उपयोग किया जा सकता है।
  • लघु सिंचाई पद्धति में सिंचाई के दौरान बिजली के उपयोग के खर्च में महत्वपूर्ण कमी की जा सकती है। फिक्की (FICCI) की रिपोर्ट की अनुसार 30.5 प्रतिशत तक बिजली की खपत को कम किया जा सकता है।
  • सिंचाई की यह विधि मृदा में अनुकूलतम नमी को बनाए रखने में भी मदद करती है। जिससे फसल उत्पादकता में वृद्धि होती है। यह फलों की उत्पादकता में 42.3 प्रतिशत और सब्जियों की उत्पादकता में 52.8 प्रतिशत तक की वृद्धि की जा सकती है।
  • लघु सिंचाई पद्धति फसल विविधीकरण को अपनाने में भी सहायक है।

लघु सिंचाई पद्धति के लिए कुछ अभिनव तकनीक

टपक (ड्रिप) सिंचाई

  • अगर किसान खेत में साधारण सिंचाई के बजाय ड्रिप सिंचाई विधि का प्रयोग करे तो तीन गुना ज्यादा क्षेत्र में उतने ही पानी में सिंचाई कर सकते हैं। ड्रिप सिंचाई का प्रयोग सभी फसलों की सिंचाई में करते हैं, लेकिन बागवानी में इसका प्रयोग ज्यादा अच्छे से होता है। बागवानी में जैसे केला, पपीता, नींबू जैसी फसलों में सफलतापूर्वक करते हैं। बागवानी की तरह ही ड्रिप सिंचाई विधि का प्रयोग गन्ना और सब्जियों में भी कर सकते हैं।

फव्वारा (स्प्रिंकल) सिंचाई

  • स्प्रिंकल विधि से सिंचाई में पानी को छिड़काव के रूप में किया जाता है, जिससे पानी पौधों पर बारिश की बूंदों की तरह पड़ता है। पानी की बचत और उत्पादकता के हिसाब से स्प्रिंकल विधि ज्यादा उपयोगी मानी जाती है। ये सिंचाई तकनीक ज्यादा लाभदायक साबित हो रहा है। चना, सरसो और दलहनी फसलों के लिए ये विधि उपयोगी मानी जाती है। सिंचाई के दौरान ही पानी में दवा मिला दी जाती है, जो पौधे की जड़ में जाती है। ऐसा करने पर पानी की बर्बादी नहीं होती।

रेनगन

  • रेनगन तकनीक में 20 से 60 मीटर की दूरी तक प्राकृतिक बरसात की तरह सिंचाई करती है। इसमें कम पानी से अधिक क्षेत्रफल को सींचा जा सकता है। सब्जी तथा दलहन फसलों के लिए यह माइक्रो स्प्रिंकलर सेट बहुत उपयोगी है, इससे ढाई मीटर के व्यास में बरसात जैसी बूंदों से सिंचाई होती है। सिंचाई के अन्य साधनों की अपेक्षा इसके माध्यम से आधे से भी कम समय एवं पानी से खेत की सिंचाई संभव है। समय कम लगने से डीजल और बिजली की भी बचत होती है। तीन इंच के एक सबर्मसिबल पंप से तीन रेनगन एक साथ चलाई जा सकती है।

लघु सिंचाई को बढ़ावा देने वाली कुछ प्रमुख योजनाये

प्रधानमंत्री कृषि सिंचाई योजना:‘हर खेत को पानी

  • प्रधानमंत्री कृषि सिंचाई योजना के घटक के रूप में हर खेत को पानी योजना को कार्यान्वित किया जा रहा है। इसके तहत निम्न कार्य किये जा रहा है-
  • लघु सिंचाई, सतही और भूजल दोनों के माध्यम से नए जलस्रोतों का जल संग्रहणों की मरम्मत, सुधार और नवीकरण, परम्परागत स्रोतों की वहन क्षमता को बढ़ाना।
  • जल संचयन संरचनाओं का निर्माण करना; कमांड एरिया विकास करना; खेत से स्रोत तक वितरण नेटवर्क का सुदृढ़ीकरण और मजबूत करना।
  • क्षेत्रों में जहाँ यह प्रचुर मात्रा में हो, भूजल विकास करना ताकि उच्चतम वर्षा मौसम के दौरान आवाह/बाढ़ जल का भण्डारण करने के लिये तालाब का निर्माण हो सके।
  • उपलब्ध संसाधनों जिनकी क्षमता का पूर्ण दोहन नहीं हुआ है, से लाभ उठाने के लिये जल तालाबों के लिये जल प्रबन्धन और वितरण प्रणाली में सुधार।
  • कम-से-कम 10 प्रतिशत कमांड एरिया सूक्ष्म परिशुद्ध सिंचाई के तहत कवर किया जाना। विभिन्न स्थानों के स्रोतों से जहाँ कम पानी के अधिक क्षेत्र आस-पास हो, में जल विचलन, सिंचाई कमांड के निरपेक्ष में आईडब्ल्यूएमपी और मनरेगा के अलावा आवश्यकता को पूरा करने के लिये निचाई पर स्थित जल निकायों नदी से लिफ्ट सिंचाई की व्यवस्था करना।
  • परम्परागत जल-भण्डारण प्रणालियों जैसे जल मन्दिर आदि का व्यवहार्य स्थानों पर निर्माण और पुनरुद्धार करना शामिल है।

प्रधानमंत्री कृषि सिंचाई योजना: ‘प्रति बूंद अधिक फसल’

  • ‘‘प्रधानमंत्री कृषि सिंचाई योजना का घटक ‘प्रति बूंद अधिक फसल’ (पीएमकेएसवाई-पीडीएमसी)’’ कार्यान्वित कर रहा है। पीएमकेएसवाई- पीडीएमसी के तहत सूक्ष्म सिंचाई प्रौद्योगिकियों यथा ड्रिप और स्प्रिंकलर सिंचाई प्रणालियों के माध्‍यम से खेत स्तर पर जल उपयोग की क्षमता बढ़ाने पर फोकस किया जाता है। प्रभावी जल परिवहन और फार्म के भीतर क्षेत्र अनुप्रयोग उपकरणों यथा भूमिगत पाइप प्रणाली, पीवोट, रेनगन (जल सिंचन) का प्रोत्साहन है।

सूक्ष्म सिंचाई कोष:

  • नाबार्ड के साथ मिलकर 5000 करोड़ रुपये का सूक्ष्म सिंचाई कोष बनाया गया है। इस कोष का उद्देश्य राज्यों को विशेष सिंचाई और अभिनव परियोजनाओं के माध्यम से सूक्ष्म सिंचाई की कवरेज के विस्तार के लिए आवश्‍यक संसाधन जुटाने में सुविधा प्रदान करना है। इसका एक अन्‍य उद्देश्‍य किसानों को सूक्ष्म सिंचाई प्रणालियां स्थापित करने हेतु प्रोत्साहित करने के लिए पीएमकेएसवाई-पीडीएमसी के तहत उपलब्ध प्रावधानों से परे सूक्ष्म सिंचाई को बढ़ावा देना है।

निष्कर्ष

  • भारतीय कृषि पद्धति में जहां एक और बड़े किसान नहर और टेबल जैसे सिंचाई के सार्वजनिक और निजी निजी स्रोतों का इस्तेमाल बड़ी आसानी से कर लेते हैं वहीं दूसरी ओर छोटे और सीमांत किसान सिंचाई के लिए व्यापक रूप से भूजल पर निर्भर हैं जो के पहले से खाली होने के कगार पर है वही बारिश की अति निर्भरता खेती में विकास को हतोत्साहित करती है।किसी क्षेत्र को लाभप्रद और समावेशी बनाने हेतु जल संसाधन की गारंटी अनिवार्य है ऐसे में लघु सिंचाई योजनाओं का लाभ छोटे और सीमांत किसानों तक पहुंचाने हेतु व्यापक रूप से कार्य करने की आवश्यकता है। भारतीय कृषि में स्थिरता हासिल करने में लघु सिंचाई पद्धति का उपयोग बेहद फायदेमंद साबित हो सकता है। हालाँकि, भारत में अभी किसान इसे अपनाने से बहुत दूर हैं। भारत में इसे बड़े पैमाने पर अपनाने के लिए व्यापक प्रदर्शन, प्रशिक्षण और जागरूकता की आवश्यकता है।