लॉजिस्टिक्स कार्यबल को मानक बदलावों की आवश्यकता - समसामयिकी लेख

   

प्रमुख बिंदु: डीपीआईआईटी, संगठनात्मक प्रशिक्षण, अपस्किलिंग, पीएम-कौशल विकास योजना, संरचनात्मक ढांचा, कौशल परिषद पहल।

संदर्भ:

  • देश के आर्थिक विकास में लॉजिस्टिक्स(रसद) क्षेत्र के योगदान के बावजूद, लोग इसके संरचनात्मक घटकों / इकाईयों की उपेक्षा करते हैं।
  • ऐसा इसलिए है क्योंकि हाल के दिनों में लोगों ने इस क्षेत्र को केवल बुनियादी ढांचे और प्रौद्योगिकी के परिणाम के रूप में देखा है।

क्या आप जानते हैं?

  • लॉजिस्टिक्स परफॉर्मेंस सूचकांक (एलपीआई) एक लॉजिस्टिक्स क्षमता सूचकांक है जो सीमा शुल्क प्रक्रियाओं, रसद लागत और भूमि और समुद्री परिवहन के लिए बुनियादी ढांचे की गुणवत्ता के संदर्भ में देशों के बीच अंतर का विश्लेषण करता है।
  • विश्व बैंक देशों को उनके लॉजिस्टिक प्रदर्शन के आधार पर रैंकिंग प्रदान करता है।
  • लॉजिस्टिक्स परफॉर्मेंस इंडेक्स 2018 में 160 देशों में भारत 44वें स्थान पर है।
  • एलपीआई 2018 के अनुसार जर्मनी प्रथम स्थान पर है।

लॉजिस्टिक क्षेत्र:

  • यह क्षेत्र भौतिक बुनियादी ढांचे, तकनीकी अंगीकरण और मानव क्षमताओं का घनिष्ठ रुप से एक दूसरे पर निर्भर संयोजन है।
  • यहां मानव क्षमता का अर्थ मानव अंतःक्रिया के विभिन्न घटकों से है जो इस क्षेत्र के आर्थिक मूल्य को आकार देते हैं।
  • प्रबंधकीय नौकरियों से लेकर धरातल पर कार्यकारिता/निष्पादन के मुख्य व्यवसाय तक, रोजगार सृजन में यह क्षेत्र निरन्तर प्रगतिशील रहा है।
  • ऐसा इसलिए है क्योंकि पिछले कुछ वर्षों में लॉजिस्टिक्स अर्थव्यवस्था में यथोचित बदलाव हुए हैं।

मजबूत रसद क्षेत्र की आवश्यकता:

  • लगभग प्रत्येक प्रकार की अर्थव्यवस्था की रीढ़: लॉजिस्टिक्स हर अर्थव्यवस्था की रीढ़ है क्योंकि यह सामान्य रूप से सभी अंतिम उपयोगकर्ता उद्योगों को प्रभावित करती है और अर्थव्यवस्था के सभी तीन क्षेत्रों: कृषि, विनिर्माण और सेवा उद्योग के लिए बहुत महत्वपूर्ण है।
  • रसद बाजार सकल घरेलू उत्पाद का 13% है और दुनिया भर में इसके 4 ट्रिलियन अमेरिकी डॉलर की अर्थव्यवस्था होने का अनुमान है।
  • भारत में मौजूदा लॉजिस्टिक्स बाजार करीब 250 अरब डॉलर का है।
  • मुट्ठीभर संगठनात्मक उद्यमी : भारतीय लॉजिस्टिक्स बाजार अभी अपनी प्रारंभिक अवस्था में है जिसका अर्थ है कि इसके भिन्न-भिन्न क्षेत्रों की लगाम अभी भी चंद गिने चुने उद्यमियों हाथों में ही है।
  • 250 अरब डॉलर के उद्योग में, हमारे पास 2 अरब डॉलर से अधिक राजस्व वाला एक काबिल व्यवसायी नहीं है, जबकि हमारे पास कम से कम 10-15 काबिल व्ययसायी होने चाहिए, जिनमें से प्रत्येक का राजस्व 5 अरब डॉलर से अधिक हो।

भारत में लॉजिस्टिक क्षेत्र को बढ़ावा देने के लिए सरकार की पहल:

  • DPIIT (उद्योग और आंतरिक व्यापार संवर्धन विभाग) ने अब रसद क्षेत्र पर विशेष ध्यान केंद्रित किया है।
  • इस क्षेत्र में निरंतर कौशल प्रशिक्षण की आवश्यकता को देखते हुए सरकार पहले से ही विभिन्न नीतिगत पहलों जैसे कि पीएम-कौशल विकास योजना (पीएमकेवीवाई) के माध्यम से महत्वपूर्ण रूप से काम कर रही है।
  • राजमार्ग निर्माण पर अधिक जोर।
  • डेडिकेटेड फ्रेट कॉरिडोर।
  • मेक इन इंडिया

प्रमुख चुनौतियां:

उद्योग के प्रति आंतरिक उदासीनता

  • उद्योग से संबंधित लोगों में इस क्षेत्र के मानव विकास में निवेश करने या इसके सामाजिक मूल्य को बढ़ाने के प्रति उदासीनता का भाव है।
  • इस क्षेत्र के अनौपचारिक क्षेत्रों में कई अंतर्निहित मुद्दों जैसे कि कार्य का इंटेंस वातावरण, कम मुआवजा और न्यूनतम कल्याण लाभ को औपचारिक रूप से संबोधित किया जाना अभी बाकी है।
  • ऐसे मुद्दे न केवल इस क्षेत्र में करियर की आकांक्षाओं को हतोत्साहित करते हैं बल्कि समाज में कुछ भूमिकाओं को स्टीरियोटाइप भी करते हैं। उदाहरण के लिए, कई लोग ट्रक चालक की भूमिका निभाने के बजाय बेरोजगार रहना पसंद करते हैं।

रोजगार सुरक्षा की कमी:

  • इस क्षेत्र में अक्सर रोज़गार को लेकर लोगों में एक असुरक्षा की भावना बनी रहती है।
  • यह भावना अक्सर अनुभवी कार्यबल को युवा कर्मचारियों के साथ बदलने की उद्योग की प्राथमिकता से आती है जिन्हें कम वेतन में कार्य करने के लिए उपयुक्त माना जाता है।

संरचनात्मक ढाँचे का अभाव:

  • इस क्षेत्र में आवश्यक परिवर्तनों ने कभी भी तेज गति नहीं ली है क्योंकि हमारे कई क्षेत्रीय उद्यमों ने अभी तक एक संरचनात्मक ढांचा तैयार नहीं किया है जो कार्यबल विकास के लिए पर्याप्त संसाधन आवंटन सुनिश्चित करेगा।

आगे की राह:

स्वतंत्र कौशल परिषद की स्थापना:

  • स्वतंत्र कौशल परिषदों का गठन किया जाये जो इस क्षेत्र से संबंधित आगामी कौशल आवश्यकताओं की समय समय पर समीक्षा करें।
  • इस संबंध में पूर्वनिर्मित अंतराष्ट्रीय संरचनात्मक फ्रेमवर्क्स से प्रेरणा ली जा सकती है उदाहरणस्वरूप यूके निर्मित 2004 की स्किल काउंसिल की नियोजकों / नियुक्तिकर्ताओं / प्रोपराइटर्स की पहल।

राज्य अथवा राज्य समर्थित संस्थानों के साथ सहयोग:

  • राज्य या राज्य समर्थित संस्थानों के साथ सहयोग छात्रों को रसद क्षेत्र का व्यापक परिप्रेक्ष्य देने में सक्षम होंगे।
  • इस संबंध में एक प्रासंगिक उदाहरण जर्मनी हो सकता है जो एक दोहरी व्यावसायिक शिक्षा और प्रशिक्षण कार्यक्रम तैयार करने में सक्षम रहा है। यह अकादमिक पाठ्यक्रम में उद्योग प्रशिक्षण को शामिल करता है।
  • लॉजिस्टिक्स क्षेत्र का प्रत्यक्ष अनुभव करने से, छात्रों को रोजगार के कई रूपों पर एक व्यापक परिप्रेक्ष्य मिलता है तथा उद्योग भी ऐसे उम्मीदवारों को स्रोत बनाने में सक्षम होता है जिन्हें विशेष रूप से इस क्षेत्र में प्रशिक्षित किया गया है, इससे रोजगार और वास्तविक रोजगार के बीच संबंध सुनिश्चित होता है।

कल्याण घटकों को अमल में लाना:

  • क्षमता के आधार पर, मौजूदा कार्यबल के लिए कई दीर्घकालिक कल्याणकारी घटक जैसे ओवरटाइम भत्ते, बाह्य स्थानों पर मिलने वाली सुविधाएं, स्वास्थ्य लाभ तथा पारिवारिक बीमा लाभ लाए जा सकते हैं।

परिचालन क्षमता पर ध्यान :

  • मजबूत परिचालन भागीदारी और तकनीक-सक्षमता तेजी से (टर्न अराउंड) टीएटी, परिसंपत्ति के व्यापक उपयोग तथा लाभ की बढ़ती हिस्सेदारी बढ़ती है।

स्टार्टअप के लिए अच्छा मौका:

  • वर्तमान में बड़े स्थापित पारंपरिक खिलाड़ियों / उद्यमियों द्वारा स्टार्टअप्स का कम प्रतिरोध होने की संभावना है वैसे भी मौजूदा बाजार से विकास के लिए काफ़ी गुंजाइशें हैं।

निष्कर्ष:

  • इंटरप्राइजेज, विशेष रूप से निजी क्षेत्र को अब यह समझना चाहिए कि भारत के रसद क्षेत्र में दक्षता लाने में उन्हें ही महत्वपूर्ण भूमिका निभानी है।
  • मानव संसाधन के विकास और उनके इष्टतम उपयोग हेतु एकमात्र उनकी क्षमता पर ज़ोर देने के बजाय दक्षता हेतु पर्याप्त संसाधन आवंटन लॉजिस्टिक्स क्षेत्र को समावेशी आर्थिक विकास की दिशा में अधिक योगदान देने में सक्षम बनायेगा।

स्रोत: The Hindu

सामान्य अध्ययन प्रश्नपत्र 3:
  • भारतीय अर्थव्यवस्था और नियोजन, संसाधन, विकास और रोजगार से संबंधित मुद्दे।

मुख्य परीक्षा प्रश्न:

  • लॉजिस्टिक्स कार्यबल को मानक बदलावों की आवश्यकता क्यों है? चर्चा (150 शब्द)