केशवानंद भारती बनाम केरल राज्य 1973 - यूपीएससी, आईएएस, सिविल सेवा और राज्य पीसीएस परीक्षाओं के लिए समसामयिकी लेख

परिचय

  • देश के न्यायिक इतिहास में दिलचस्पी रखने वाला शायद ही कोई केशवानंद भारती के नाम से अपरिचित हो। 24 अप्रैल, 1973 को माननीय उच्चतम न्यायालय द्वारा ‘केशवानंद भारती बनाम केरल राज्य’ के मामले में दिए गए एक ऐतिहासिक फैसले के कारण केशवानंद भारतीय न्यायिक इतिहास का सर्वविदित नाम हो गया। न्यायिक दुनिया में अभूतपूर्व लोकप्रियता के बावजूद केशवानंद भारती न तो कभी जज रहे और न ही अधिवक्ता। उनका यह नाम एक वादी के रूप में ख्याति प्राप्त कर रहा है।इस मामले के कई निर्णयों ने भारत में लोकतंत्र की स्थापना कर नवीन दिशा प्रदान की।

केशवानंद तथा वेदांत :-

  • कासरगोड़ केरल का सबसे उत्तरी जिला है पश्चिम में समुद्र और पूर्व में कर्नाटक से घिरे इस इलाके का सदियों पुराना एक शैव मठ है जो एडनीर में स्थित है
  • यह मठ नवीं सदी के महान संत और अद्वैत वेदांत दर्शन के प्रणेता आदिगुरु शंकराचार्य से जुड़ा हुआ है। यह ब्राह्मणों की तांत्रिक पद्धति का अनुसरण करने वाली स्मार्त्त भागवत परंपरा को मानता है।
  • इस मठ का इतिहास करीब 1,200 साल पुराना माना जाता है। शंकराचार्य की क्षेत्रीय पीठ का दर्जा प्राप्त होने के चलते इस मठ के प्रमुख को ‘केरल के शंकराचार्य’ का दर्जा दिया जाता है। इसीलिए स्वामी केशवानंद भारती केरल के मौजूदा शंकराचार्य कहे जाते थे।
  • उन्होंने महज 19 साल की अवस्था में संन्यास लिया था जिसके कुछ ही साल बाद अपने गुरू के निधन की वजह से वे एडनीर मठ के मुखिया बन गए। हालांकि उनके सम्मान में उन्हें ‘श्रीमत् जगदगुरु श्रीश्री शंकराचार्य तोतकाचार्य श्री केशवानंद भारती श्रीपदंगलावारू’ के लंबे संबोधन से बुलाया जाता था।

केशवानंद भारती मामला :-

  • मठ का न केवल अध्यात्म के क्षेत्र में उन्नत था बल्कि भारत की नाट्य और नृत्य परंपरा को बढ़ावा देने के लिए कासरगोड़ और उसके आसपास के इलाकों में दशकों से एडनीर मठ के कई स्कूल और कॉलेज चल रहे हैं।
  • इसके अलावा यह मठ सालों से कई तरह के व्यवसायों को भी संचालित करता है। साठ- सत्तर के दशक में कासरगोड़ में इस मठ के पास हजारों एकड़ जमीन भी थी। परन्तु ईएमएस नंबूदरीपाद के नेतृत्व में केरल की तत्कालीन वामपंथी सरकार के केरल भूमि सुधार अधिनियम, 1963 से मठ की हज़ारो एकड़ भूमि अधिग्रहित कर ली गई तथा इस अधिनियम को नौवे अनुसूची में डाल दिया गया जिससे इस पर न्यायिक पुनरावलोकन न हो सके। ऐसे में एडनीर मठ के युवा प्रमुख स्वामी केशवानंद भारती ने सरकार के इस फैसले को अदालत में चुनौती दी।
  • केरल हाईकोर्ट के समक्ष इस मठ के मुखिया होने के नाते 1970 में दायर एक याचिका में केशवानंद भारती ने अनुच्छेद 26 का हवाला देते हुए मांग की थी कि उन्हें अपनी धार्मिक संपदा का प्रबंधन करने का मूल अधिकार दिलाया जाए।
  • उन्होंने संविधान संशोधन के जरिए अनुच्छेद 31 में प्रदत्त संपत्ति के मूल अधिकार पर पाबंदी लगाने वाले केंद्र सरकार के 24वें, 25वें और 29वें संविधान संशोधनों को चुनौती दी। इसके अलावा केरल और केंद्र सरकार के भूमि सुधार कानूनों को भी उन्होंने चुनौती दी।
  • हालांकि केरल हाईकोर्ट में मठ को कामयाबी नहीं मिली जिसके बाद यह मामला आखिरकार सुप्रीम कोर्ट चला गया।

उच्चतम न्यायालय तथा केशवानन्द भारती वाद :-

  • देश की शीर्ष अदालत ने पाया कि इस मामले को संबैधानिक व्याख्या की आवश्यकता है । इस मामले में सर्वाधिक महत्वपूर्ण मुद्दा यह था कि क्या देश की संसद के पास संविधान संशोधन के जरिए मौलिक अधिकारों सहित किसी भी अन्य हिस्से में असीमित संशोधन का अधिकार है ?
  • अतः शीर्ष अदालत ने इस मामले में पूर्व के गोलकनाथ मामले में बनी 11 जजों की संविधान पीठ से भी बड़ी पीठ बनाई जाए
  • इसके बाद 1972 के अंत में इस मामले की लगातार सुनवाई हुई जो 68 दिनों तक चली।
  • अंतत: 703 पृष्ठ के अपने लंबे फैसले में केवल एक वोट के अंतर से शीर्ष अदालत ने स्वामी केशवानंद भारती के विरोध में फैसला दिया।
  • यह फैसला 7:6 के न्यूनतम अंतर से दिया गया। इस प्रकार केशवानंद भारती मामले ने गोलक नाथ के निर्णय को परिवर्तित कर दिया जिसके अनुसार अब न्यायालय ने माना कि संसद मौलिक अधिकारों में भी संशोधन कर तो सकती है, लेकिन ऐसा कोई संशोधन वह नहीं कर सकती जिससे संविधान के मूलभूत ढांचे (बेसिक स्ट्रक्चर) में कोई परिवर्तन होता हो या उसका मूल स्वरूप बदलता हो।
  • केशवानंद भारती मामला न्यायिक सक्रियता का प्रथम उदहारण था। केशवानंद भारती वाद के निर्णय से यह स्पष्ट हो गया कि देश में संविधान से ऊपर कोई भी नहीं है, संसद भी नहीं।
  • यदि अगर इस मामले में सात जज यह फैसला नहीं देते और संसद को संविधान से किसी भी हद तक संशोधन के अधिकार मिल गए होते तो शायद देश में गणतांत्रिक व्यवस्था भी सुरक्षित नहीं रह पाती.
  • इस फैसले के दो साल बाद तात्कालिक प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने देश में आपातकाल लागू कर दिया और संविधान को पूरी तरह से बदल दिया गया. लेकिन आपातकाल के बाद केशवानंद भारती मामले के निर्णय को आधार मानकर ही मूल संविधान वापस लाया गया। निर्णय की प्राप्तियां

बुनियादी ढांचा :-

1973 में केशवानंद भारती बनाम केरल राज्य के मामले में सर्वोच्च न्यायालय की 13 न्यायाधीशों की पीठ ने अपने संवैधानिक रुख में संशोधन करते हुए कहा कि संविधान संशोधन के अधिकार पर एकमात्र प्रतिबंध यह है कि इसके माध्यम से संविधान के मूल ढांचे को क्षति नहीं पहुंचनी चाहिए। अपने कई अंतर्विरोधों के बावजूद यह सिद्धांत अभी भी कायम है और जल्दबाजी में किए जाने वाले संशोधनों पर अंकुश के रूप में कार्य कर रहा है।

24 अप्रैल 1973 को, चीफ जस्टिस सीकरी और उच्चतम न्यायालय के 12 अन्य न्यायाधीशों ने न्यायिक इतिहास का यह सबसे महत्वपूर्ण निर्णय दिया कि संविधान सरंचना के कुछ प्रमुख मूलभूत तत्व जिनमे अनुछेद 368 के तहत संसोधन नही किया जा सकता है निम्नलिखित है

  1. संविधान की सर्वोच्चता
  2. विधायिका,कार्यपालिका एवं न्यायपालिका के बीच शक्ति का बंटवारा
  3. गणराज्यात्मक एवं लोकतांत्रिक स्वरूप वाली सरकार
  4. संविधान का धर्मनिरपेक्ष चरित्र
  5. राष्ट्र की एकता एवं अखण्डता
  6. संसदीय प्रणाली
  7. व्यक्ति की स्वतंत्रता एवं गरिमा
  8. मौलिक अधिकारों और नीति निदेशक तत्वों के बीच सौहार्द और संतुलन
  9. न्याय तक प्रभावकारी पहुँच
  10. एक कल्याणकारी राज्य की स्थापना का जनादेश

न्यायालय ने यह भी निर्णय लिया कि इस निर्णय के उपरांत नवी अनुसूची का न्यायिक अबलोकन किया जा सकता है। इससे संसद तथा विधानसभाओ के मनमाने व्यवहार का समापन हो गया। यह प्रावधान लोकतंत्र का तत्वार्थ था।

इस निर्णय से भारत में शंकरी प्रसाद वाद 1951 से 1973 तक चली आ रही न्यायपालिका तथा संसद का द्वन्द समाप्त हो गया।

भारत में संसद की व्यावहारिक सर्वोच्चता के स्थान पर संविधानिक सर्वोच्चता की स्थापना हुई। भारत में लोकतांत्रिक मूल्यों को बल मिला।

विदेशी अदालतों ने भी ली प्रेरणा

  • केशवानंद भारती बनाम स्टेट ऑफ़ केरल मामले के ऐतिहासिक फ़ैसले से कई विदेशी संवैधानिक अदालतों ने भी प्रेरणा ली.
  • लाइव लॉ के अनुसार केशवानंद के फ़ैसले के 16 साल बाद, बांग्लादेश के सुप्रीम कोर्ट ने भी अनवर हुसैन चौधरी बनाम बांग्लादेश में मूल सरंचना सिद्धांत को मान्यता दी ‌थी।
  • वहीं बेरी एम बोवेन बनाम अटॉर्नी जनरल ऑफ़ बेलीज के मामले में, बेलीज कोर्ट ने मूल संरचना सिद्धांत को अपनाने के लिए केशवानंद केस और आईआर कोएल्हो केस पर को संदर्भित किया।
  • केशवानंद केस ने अफ्रीकी महाद्वीप का भी ध्यान आकर्षित किया। केन्या, अफ्रीकी देश युगांडा, अफ्रीकी द्वीप- सेशेल्स के मामलों में भी केशवानंद मामले के ऐतिहासिक फ़ैसले का ज़िक्र कर भरोसा जताया गया

निष्कर्ष :-

  • भले ही केशवनाद भारती का मठ अपने मामले को हारकर भूमि बचाने मे सक्षम नहीं रहा परन्तु निस्संदेह इस मामले के निर्णय ने संबैधानिक सर्वोच्चता को स्थापित कर भारत की लोकतान्त्रिक सिद्धांत को उन्नत किया है।
सामान्य अध्ययन प्रश्नपत्र 2
  • राजव्यवस्था

मुख्य परीक्षा प्रश्न :

  • व्यक्तिगत हानि के उपरान्त केशवानंद भारती वाद ने भारतीय लोकतंत्र को नवीन दिशा प्रदान की ? कथन पर चर्चा करें ?