स्वास्थ्य वायु प्रदूषण नीति के फोकस में - समसामयिकी लेख

   

कीवर्ड : एनसीआर में वायु प्रदूषण, वायु गुणवत्ता सूचकांक, राष्ट्रीय परिवेशी वायु गुणवत्ता मानक (एनएएक्यूएस), वायु गुणवत्ता और मौसम पूर्वानुमान और अनुसंधान प्रणाली (सफर), वायु गुणवत्ता प्रबंधन आयोग I

संदर्भ:

  • उत्तर भारत में सर्दियों में बिगड़ती हवा की गुणवत्ता ने, एक बार फिर लोगों का ध्यान हमारे स्वास्थ्य पर वायु प्रदूषण के हानिकारक प्रभावों पर केंद्रित कर दिया है।

पृष्ठभूमि: वायु प्रदूषण का स्वास्थ्य पर प्रभाव

  • शरीर के प्रत्येक अंग और प्रत्येक व्यक्ति द्वारा महसूस किया जाता है , लेकिन समाज में कमजोर लोगों - बच्चों, बुजुर्गों, गर्भवती महिलाओं और पहले से मौजूद स्वास्थ्य स्थितियों वाले लोगों द्वारा सबसे अधिक गहराई से महसूस किया जाता है।
  • स्वास्थ्य पत्रिका द लासेंट के अनुसार - भारत में, 2019 में, सभी मौतों का 17.8% और श्वसन, हृदय और अन्य संबंधित बीमारियों का 11.5% प्रदूषण के उच्च जोखिम के कारण है।

वायु प्रदूषण क्या है?

  • वातावरण में ऐसे पदार्थों की उपस्थिति है जो मनुष्यों और अन्य जीवित प्राणियों के स्वास्थ्य के लिए हानिकारक हैं, या जलवायु या सामग्री को नुकसान पहुंचाते हैं।
  • विभिन्न प्रकार के वायु प्रदूषकों में शामिल हैं-
  • गैसें: जैसे अमोनिया, कार्बन मोनोऑक्साइड, सल्फर डाइऑक्साइड, नाइट्रस ऑक्साइड, मीथेन, कार्बन डाइऑक्साइड और क्लोरोफ्लोरोकार्बन।
  • पार्टिकुलेट्स जैसे PM10, PM2.5, नैनोपार्टिकल्स आदि।
  • जैविक अणु।

वायु गुणवत्ता और मौसम पूर्वानुमान और अनुसंधान प्रणाली (सफर)

  • सफर के बारे में
  • पृथ्वी विज्ञान मंत्रालय ( एमओईएस ) द्वारा शुरू की गई एक राष्ट्रीय पहल हैI
  • यह भारतीय उष्णकटिबंधीय मौसम विज्ञान संस्थान (IITM), पुणे द्वारा स्वदेशी रूप से विकसित किया गया है।
  • संचालन और कार्यक्षमता
  • इसमें एक विशाल ट्रू कलर एलईडी डिस्प्ले है जो कलर-कोडिंग (72 घंटे के अग्रिम पूर्वानुमान के साथ) के साथ 24x7 आधार पर एक वास्तविक समय का वायु गुणवत्ता सूचकांक देता है।
  • यह दिल्ली में परिचालित भारत की पहली वायु गुणवत्ता प्रारंभिक चेतावनी प्रणाली का एक अभिन्न अंग है।
  • यह तापमान, वर्षा, आर्द्रता, हवा की गति और हवा की दिशा, यूवी विकिरण और सौर विकिरण जैसे सभी मौसम मापदंडों की निगरानी करता है।
  • प्रदूषकों की निगरानी:
  • पीएम 2.5, पीएम10, ओजोन, कार्बन मोनोऑक्साइड (CO), नाइट्रोजन ऑक्साइड (NOx), सल्फर डाइऑक्साइड (SO2), बेंजीन, टालूइन, जाइलीन और मरकरी।

वायु प्रदूषण नीति में स्वास्थ्य की उपेक्षा क्यों की गयी है?

  • यद्यपि भारत के प्रमुख पर्यावरण कानूनों ने अपने उद्देश्यों और कारणों में सार्वजनिक स्वास्थ्य की रक्षा की प्रधानता को स्पष्ट रूप से निर्धारित किया है।
  • फिर भी नियामकों में स्वास्थ्य विशेषज्ञता की कमी है :
  • हमारे पर्यावरण नियामकों, विशेषज्ञ समूहों और निर्णय लेने वाली संस्थाओं का संविधान जो पर्यावरणीय कानूनों को वायु प्रदूषण नीति में परिभाषित और अनुवादित करता है , में स्वास्थ्य विशेषज्ञता की कमी है।
  • नीति निर्माण की पृथक प्रकृति और नीति निर्माताओं के बीच स्वास्थ्य की अपर्याप्त समझ उद्देश्य में बाधा है।
  • वायु प्रदूषण नीति निर्वात में बनाई और कार्यान्वित की जाती है क्योंकि समाज पर इसके प्रभाव की बहुत कम मान्यता है।
  • उदाहरण के लिए : हाल ही में गठित संस्था (वायु गुणवत्ता प्रबंधन आयोग ) किसी भी स्वास्थ्य प्रतिनिधित्व की कमी का खुलासा करता है।
  • इसी तरह सेंटर फॉर पॉलिसी रिसर्च द्वारा हाल ही में प्रकाशित पत्रों से यह भी पता चलता है कि राज्य प्रदूषण नियंत्रण बोर्डों में स्वास्थ्य क्षेत्र के प्रतिनिधि की सदस्यता के 5% से भी कम हैं।

वायु गुणवत्ता शासन और नीति निर्माण के केंद्र में स्वास्थ्य

  • वायु प्रदूषण की गंभीरता को स्वीकार करने के लिए, स्वास्थ्य को एक विशेषता और अंततः वायु प्रदूषण नीति के कार्य में बदलना चाहिए।
  • वायु प्रदूषण नीति के पहलू के रूप में स्वास्थ्य पर ध्यान केन्द्रित करना
  • समय-समय प्रतिनिधियों और चिकित्सा विशेषज्ञों को नीति निर्माण में शामिल किया जाना चाहिए।
  • स्वास्थ्य और महामारी विज्ञान के साक्ष्य स्वच्छ वायु लक्ष्यों से पर्याप्त स्वास्थ्य लाभ प्राप्त करने के हमारे दृढ़ संकल्प को आगे बढ़ाएंगे।
  • विशेष रूप से वायु प्रदूषण पर स्वास्थ्य मंत्रालय की संचालन समिति ने स्वास्थ्य विशेषज्ञता को ध्यान में रखा जिसका लाभ मिला है।
  • इसने जोखिम को कम करने और इस तरह स्वास्थ्य लाभ प्रदान करने में सबसे अधिक योगदान देने वाले हस्तक्षेपों को प्राथमिकता देकर नीति के लिए एक जोखिम-केंद्रित दृष्टिकोण को अपनाया है।
  • वायु प्रदूषण के हानिकारक प्रभावों ने स्थानीय और वैश्विक महामारी विज्ञान के साक्ष्य को भी प्रकाश में लाया है और उस विज्ञान के साथ परिभाषित नीतिगत उपायों को अपनाने की आवश्यकता हैI
  • उदाहरण के लिए, घरेलू कुकिंग स्टोव के धुएँ पर ध्यान केंद्रित करना।
  • जैसा कि भारत वायु गुणवत्ता मानकों (एनएएक्यूएस) को संशोधित करने की प्रक्रिया में है और इसे स्वास्थ्य विशेषज्ञता को ध्यान में रखना चाहिए।
  • इस तरह की प्रक्रिया में स्वास्थ्य को आगे रखने का मतलब है कि मानक न केवल स्थानीय परिस्थितियों, बल्कि सुभेद्द आबादी पर जोखिम के प्रभाव से भी निर्धारित होंगे।

राष्ट्रीय परिवेशी वायु गुणवत्ता मानक (एनएएक्यूएस)

  • ये वायु गुणवत्ता के मानक हैं जो पूरे देश में लागू होते हैं।
  • मानक वायु (रोकथाम और प्रदूषण नियंत्रण) अधिनियम, 1981 की शक्तियों का उपयोग करके केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (सीपीसीबी ) द्वारा निर्धारित किए जाते हैं।
  • पहले परिवेशी वायु गुणवत्ता मानकों को 1982 में वायु अधिनियम के अनुसार विकसित किया गया था।
  • मानकों में संशोधन किया जाता है और एनएएक्यूएस में नवीनतम संशोधन 2009 में किया गया था।
  • एनएएक्यूएस के अनुपालन की निगरानी राष्ट्रीय वायु गुणवत्ता निगरानी कार्यक्रम (एनएएमपी ) के अंतर्गत की जाती है।
  • वर्तमान मानकों (2009) में निम्नानुसार 12 प्रदूषक शामिल हैं:
  1. अमोनिया (NH3)
  2. सीसा
  3. बेंजीन
  4. बेंजोपाइरीन
  5. आर्सेनिक (As)
  6. निकल (Ni)
  7. पार्टिकुलेट मैटर 10 (PM10)
  8. पार्टिकुलेट मैटर 2.5 (PM2.5)
  9. नाइट्रोजन डाइऑक्साइड (NO2)
  10. सल्फर डाइऑक्साइड (SO2)
  11. कार्बन मोनोऑक्साइड (CO)
  12. ओजोन (O3)

यथास्थिति से बचना ही आगे की राह

  • जिस तरह से हम नीति का निर्माण करते हैं, उस पर आमूलचूल पुनर्विचार करने की आवश्यकता है ।
  • पराली जलाने से लेकर थर्मल पावर प्लांट के उत्सर्जन तक वायु प्रदूषण में महत्वपूर्ण योगदान देता है , संकीर्ण, क्षेत्रीय और पृथक नीति निर्माण के कारण इसे नियंत्रित नहीं किया जा सका है।
  • हम देख सकते हैं कि विशेष रूप से स्वास्थ्य पर उनके संभावित दूसरे और तीसरे क्रम के प्रभावों पर विचार किए बिना निर्णय लिए जाते हैं।
  • स्वास्थ्य मंत्रालय की संचालन समिति से सबक लें, जिसने कई विषयों और क्षेत्रों के विशेषज्ञों को एक फार्मुला विकसित करने के लिए बुलाया है जो मुख्य रूप से स्वास्थ्य लाभों पर ध्यान केंद्रित करेगा।
  • स्मॉग टावरों जैसे अप्रमाणित, तदर्थ तकनीकी सुधारों के प्रसार के स्थान पर विशिष्ट स्थायी और प्रभावी हस्तक्षेपों के स्पष्ट स्वास्थ्य लाभों पर ध्यान केन्द्रित करें ।
  • यह जलवायु प्रतिबद्धताओं और वायु गुणवत्ता कार्यों में तेजी लाने के लिए भी प्रेरित करेगा जो उन क्षेत्रों से उत्सर्जन को नियंत्रित करते हैं जो स्वास्थ्य पर सबसे बड़ा बोझ डालते हैं।

निष्कर्ष:

  • हम वायु प्रदूषण के खिलाफ अपनी लड़ाई में एक चौराहे पर हैं और इसलिए समय की जरूरत है कि हम इस समस्या को ठीक करने के लिए विज्ञान और स्वास्थ्य पर ध्यान केंद्रित करें, न कि इस मुद्दे से निपटने के समसामयिक दृष्टिकोण पर जो दशकों से आजमाया जा रहा है और अप्रभावी रहा है।

स्रोत : The Hindu

  • सामान्य अध्ययन प्रश्नपत्र 2: स्वास्थ्य, शिक्षा, मानव संसाधन से संबंधित सामाजिक क्षेत्र/सेवाओं के विकास और प्रबंधन से संबंधित मुद्दे।
  • सामान्य अध्ययन प्रश्नपत्र 3: संरक्षण, पर्यावरण प्रदूषण और निम्नीकरण।

मुख्य परीक्षा प्रश्न:

  • स्वास्थ्य को वायु प्रदूषण नीति की विशेषता और कार्य में बदलना चाहिए। भारत की वायु प्रदूषण नीतियों में कमियों और ऐसी नीति निर्माण में स्वास्थ्य विशेषज्ञों की भागीदारी की कमी के आलोक में इस कथन का समालोचनात्मक परीक्षण कीजिये ।