धर्म की स्वतंत्रता के अंतर्गत शामिल है पूजा/उपासना का अधिकार : मद्रास उच्च न्यायालय - समसामयिकी लेख

की-वर्डस :- धर्म की स्वतंत्रता, नकारात्मक स्वतंत्रता, अनुच्छेद 25(1), आवश्यक धार्मिक प्रथाएं, न्यायिक पहुंच।

चर्चा में क्यों?

  • हाल ही में, मद्रास उच्च न्यायालय ने कहा कि किसी धर्म के तहत निर्धारित अनुष्ठान और अवलोकन जो उस धर्म का अभिन्न अंग हैं, संविधान के अनुच्छेद 25(1) के तहत निहित धर्म की स्वतंत्रता के अंतर्गत सम्मिलित हैं।
  • न्यायालय ने यह भी कहा कि संविधान के तहत गारंटीयुक्त पूजा/उपासना के अधिकार का सम्मान किया जाना चाहिए और भक्तों को किसी भी परिस्थिति में उनके पूजा/उपासना के अधिकार से वंचित नहीं किया जा सकता है।

आवश्यक धार्मिक अभ्यास परीक्षण (अनिवार्यता का सिद्धांत) :-

  • आवश्यक धार्मिक अभ्यास परीक्षण सर्वोच्च न्यायालय द्वारा मौलिक अधिकारों के तहत केवल ऐसी धार्मिक प्रथाओं की रक्षा के लिए विकसित एक सिद्धांत है, जो धर्म के लिए आवश्यक और अभिन्न हैं।
  • अनिवार्यता के सिद्धांत का आविष्कार सर्वोच्च न्यायालय की सात-न्यायाधीशों की बेंच ने 1954 में 'शिरूर मठ' मामले में किया था।
  • सर्वोच्च न्यायालय ने तब धर्म की आवश्यक प्रथाओं को निर्धारित करने की जिम्मेदारी स्वयं ली थी।
  • धर्म का एक अभिन्न या अनिवार्य हिस्सा क्या है, यह दिए गए धर्म की पृष्ठभूमि, उसके सिद्धांतों, प्रथाओं, ऐतिहासिकता आदि के संदर्भ में निर्धारित किया जाना है।
  • धर्म के अनिवार्य भाग का अर्थ है वे मूल मान्यताएं जिन पर धर्म की स्थापना होती है। आवश्यक अभ्यास का अर्थ उन प्रथाओं से है जो धार्मिक विश्वास का पालन करने के लिए मौलिक हैं।
  • यह आवश्यक भागों या प्रथाओं की आधारशिला है जिस पर धर्म की अधिरचना का निर्माण हुआ है, जिसके बिना धर्म का वैशिष्ट्य संरक्षित नहीं रह सकता।
  • यह निर्धारित करने के लिए परीक्षण किया जाता है :-
  1. किसी धर्म के लिए एक हिस्सा या अभ्यास आवश्यक है या नहीं ?
  2. यह पता लगाना है कि क्या उस भाग या अभ्यास के बिना धर्म की प्रकृति बदल जाएगी ?
  • यदि उस भाग या प्रथा को हटाने से उस धर्म के चरित्र या उसकी मान्यता में मौलिक परिवर्तन हो सकता है, तो उस भाग को धर्म का एक आवश्यक या अभिन्न अंग माना जा सकता है।
  • धर्म के अनिवार्य हिस्से में कुछ जोड़ा या घटाया नहीं जा सकता क्योंकि यह उस धर्म का सार है और इसमें परिवर्तन से उस धर्म का मूल चरित्र बदल जाएगा। धार्म का यह अभिन्न/आवश्यक अंग संविधान द्वारा संरक्षित हैं।

धार्मिक संरक्षण के लिए संवैधानिक और कानूनी प्रावधान :-

  • अनुच्छेद 25(1)- "अंतरात्मा की स्वतंत्रता और धर्म को मानने, आचरण करने और प्रचार करने की स्वतंत्रता के अधिकार" की गारंटी देता है।
  • यह एक अधिकार है जो नकारात्मक स्वतंत्रता की गारंटी देता है - जिसका अर्थ है कि राज्य यह सुनिश्चित करेगा कि इस स्वतंत्रता का प्रयोग करने में कोई हस्तक्षेप या बाधा नहीं है।
  • हालांकि, सभी मौलिक अधिकारों की तरह, राज्य सार्वजनिक व्यवस्था, शालीनता, नैतिकता, स्वास्थ्य और अन्य राज्य हितों के आधार पर अधिकार को प्रतिबंधित कर सकता है।
  • वर्षों से, सुप्रीम कोर्ट ने यह निर्धारित करने के लिए एक व्यावहारिक परीक्षण विकसित किया है कि किन धार्मिक प्रथाओं को संवैधानिक रूप से संरक्षित किया जा सकता है और किन प्रथाओं की अनदेखी की जा सकती है।
  • अनुच्छेद 26- यह धार्मिक मामलों के प्रबंधन की स्वतंत्रता देता है और कहता है कि सभी संप्रदाय धर्म के मामलों में अपने स्वयं के मामलों का प्रबंधन कर सकते हैं।
  • अनुच्छेद 27- किसी विशेष धर्म के प्रचार के लिए करों के भुगतान को प्रतिबंधित करता है।
  • अनुच्छेद 28- कुछ शैक्षणिक संस्थानों में धार्मिक शिक्षा या धार्मिक पूजा में उपस्थिति से संबंधित स्वतंत्रता।

ऐतिहासिक निर्णय :-

  • शिरूर मठ केस 1954 :-
  • 1954 में, सुप्रीम कोर्ट ने माना कि "धर्म" शब्द में एक धर्म के लिए "अभिन्न" सभी अनुष्ठानों और प्रथाओं को शामिल किया जाएगा। अभिन्न क्या है यह निर्धारित करने के लिए परीक्षण को "आवश्यक धार्मिक प्रथा" परीक्षण कहा जाता है।
  • श्री वेंकटरमण देवारू बनाम मैसूर राज्य मामला, 1958 :-
  • मामला था कि क्या कुछ वर्गों के लिए मंदिरों में प्रवेश पर प्रतिबंध "हिंदू धर्म का अनिवार्य हिस्सा" है या नहीं।
  • इस वाद में सर्वोच्च न्यायालय ने निर्णय दिया कि कि इस तरह की प्रथाएं असंवैधानिक हैं और सभी हिंदुओं के लिए मंदिर खोल दिए गये।
  • बिजो इमैनुएल और अन्य बनाम केरल राज्य (1986) :-
  • सर्वोच्च न्यायालय ने फैसला सुनाया कि भले ही कोई धार्मिक विश्वास या प्रथा किसी के कारण या भावना को अपील नहीं करती है, अगर यह वास्तव में और ईमानदारी से धर्म के पेशे या अभ्यास के हिस्से के रूप में इसका आयोजन किया जाता है तो यह अनुच्छेद 25 के अंतर्गत संरक्षित होगा।
  • फातिमा तस्नीम बनाम केरल राज्य (2018) :-
  • यह मामला, ऐसी दो लड़कियां से संबंधित था जो हेडस्कार्फ़ पहनना चाहती थीं। स्कूल ने हेडस्कार्फ़ की अनुमति देने से इनकार कर दिया।
  • केरल हाईकोर्ट ने कहा कि याचिकाकर्ता के व्यक्तिगत अधिकारों पर संस्था के सामूहिक अधिकारों को प्राथमिकता दी जाएगी।
  • इस आधार पर, न्यायालय ने अपील को खारिज कर दिया।
  • अयोध्या केस 2019 :-
  • सुप्रीम कोर्ट ने माना कि नमाज अदा करना इस्लाम की एक अनिवार्य प्रथा है, लेकिन मस्जिद में नमाज अदा करना अनिवार्य प्रथा नहीं है।

उचित एकोमोडेशन का सिद्धांत :-

  • उचित एकोमोडेशन का सिद्धांत समानता को बढ़ावा देता है। यह सकारात्मक अधिकार प्रदान करने में सक्षम बनाता हैI
  • उचित एकोमोडेशन व्यक्तिगत विश्वास के आधार पर भेदभाव को रोंकता है और प्रत्येक व्यक्ति की गरिमा और मूल्य का सम्मान दिलवाता है।
  • इस मार्ग के तहत, "शक्तिशाली और बहुसंख्यक अपने स्वयं के नियमों और प्रथाओं को तर्क की सीमा के भीतर, अपने लक्ष्य की प्राप्ति के लिए अनुकूलित कर लेते हैं।"

आवश्यक धार्मिक अभ्यास परीक्षण की आलोचना :-

  • न्यायिक अतिक्रमण :- धार्मिक प्रथाओं का एक न्यायिक निर्धारण जिसे आवश्यक माना जाता है, अक्सर कानूनी विशेषज्ञों द्वारा न्यायिक अतिरेक के रूप में इसकी आलोचना की जाती है।
  • धार्मिक पक्ष :- कानूनी विशेषज्ञों द्वारा इसकी आलोचना की गई है क्योंकि यह अदालत को धार्मिक पहलुओं में तल्लीन करने के लिए प्रेरित करता है।
  • सार्वजनिक व्यवस्था :- कानूनी विशेषज्ञों ने अदालतों से धर्म में इसकी अनिवार्यता निर्धारित करने के बजाय सार्वजनिक व्यवस्था के लिए धार्मिक प्रथाओं को प्रतिबंधित करने के लिए परीक्षण का उपयोग करने के लिए कहा है।
  • व्यक्तिगत स्वतंत्रता :- कुछ ऐसे उदाहरण हैं जिनमें अदालत ने व्यक्तिगत स्वतंत्रता पर भी परीक्षण लागू किया है। उदाहरण के लिए, 2016 में, सुप्रीम कोर्ट की तीन-न्यायाधीशों की बेंच ने दाढ़ी रखने के लिए भारतीय वायु सेना से एक मुस्लिम एयरमैन की छुट्टी को बरकरार रखा।
  • इसने एक मुस्लिम एयरमैन के मामले को सिखों से अलग किया जिन्हें दाढ़ी रखने की अनुमति है।
  • न्यायालय ने अनिवार्य रूप से माना कि दाढ़ी रखना इस्लामी प्रथाओं का एक अनिवार्य हिस्सा नहीं है।

आगे की राह :-

  • सबरीमाला मामले की पुनर्विचार याचिका की सुनवाई करते हुए आर.एफ. नरीमन के उस कथन पर ध्यान देना चाहिए जो कहता है कि भारत की "पवित्र पुस्तक" भारत का संविधान है।
  • संविधान का मूल विचार एक प्रगतिशील और न्यायपूर्ण समाज का निर्माण करना था, जो उच्च न्यायपालिका को धार्मिक प्रथाओं में मौजूद सामाजिक बुराइयों को दूर करने के लिए प्रतिबद्ध बनाता है। लेकिन इस सिद्धांत का प्रयोग करते समय न्यायालय को यह ध्यान रखना चाहिए कि धर्म भी मानव विकास और सामाजिक सद्भाव का एक महत्वपूर्ण पहलू है। इसलिए न्यायालय को इस मामले में अत्यधिक हस्तक्षेप से बचना चाहिए।

स्रोत :-

सामान्य अध्ययन प्रश्नपत्र 2:
  • भारतीय संविधान- ऐतिहासिक आधार, विकास, विशेषताएं, संशोधन, महत्वपूर्ण प्रावधान और बुनियादी संरचना।

मुख्य परीक्षा प्रश्न:

  • हाल ही में, मद्रास उच्च न्यायालय ने कहा कि किसी धर्म के तहत निर्धारित अनुष्ठान और अवलोकन जो उस धर्म का अभिन्न अंग हैं, संविधान के अनुच्छेद 25(1) के तहत निहित धर्म की स्वतंत्रता के अंतर्गत सम्मिलित हैं। इस संदर्भ में कर्मकांडों को धर्म के अभिन्न अंग के रूप में वर्गीकृत करने की पद्धति और उससे संबंधित सिद्धांतों की चर्चा कीजिए।