भारत और चीन के बीच पाँच सूत्रीय समझौता - यूपीएससी, आईएएस, सिविल सेवा और राज्य पीसीएस परीक्षाओं के लिए समसामयिकी लेख

चर्चा का कारण

  • वास्तविक नियंत्रण रेखा (Line of Actual Control- LAC) पर तनाव के बीच मॉस्को में भारत और चीन के विदेश मंत्रियों के बीच बैठक हुई है. पिछले 5 महीने से जारी एलएसी विवाद के बीच ये एक अहम बैठक थी. भारत और चीन ने गतिरोध को दूर करने के लिए सुरक्षा बलों को पीछे हटने और तनाव को कम करने के लिए पांच सूत्रीय समझौते पर सहमति जताई है, लेकिन रक्षा विशेषज्ञों का मानना है कि एलएसी पर जैसे हालात हैं, उसके हिसाब से नरमी के संकेत दोनों ही ओर से मिलते नहीं दिख रहे हैं ।

पांच सूत्रीय समझौता

दोनों देशों ने इस मुलाकात के बाद निम्नलिखित पांच बिंदुओं का एक साझा बयान जारी किया है.

  1. दोनों देशों को अपने नेताओं के मार्गदर्शन में चलकर बातचीत को आगे बढ़ाना चाहिए और मतभेद को विवाद में नहीं बदलना चाहिए.
  2. दोनों नेताओं ने माना कि सीमा को लेकर मौजूदा स्थिति दोनों पक्षों के हित में नहीं है. दोनों पक्ष की सेनाओं को बातचीत जारी रखनी चाहिए, जल्द से जल्द डिस्इनगेज करना चाहिए, एक दूसरे से उचित दूरी बनाए रखना चाहिए और तनाव कम करना चाहिए।
  3. भारत-चीन सीमा के इलाक़ों में शांति और सौहार्द्य बनाए रखने और सीमा मामलों को लेकर दोनों पक्ष सभी मौजूदा समझौतों और प्रोटोकॉल का पालन करेंगे और तनाव बढ़ाने जैसी कोई कार्रवाई न की जाए.
  4. भारत-चीन मुद्दे पर दोनों पक्षों के बीच स्पेशल रिप्रेज़ेन्टेटिव मेकनिज़्म के ज़रिए बातचीत जारी रखी जाए. साथ ही सीमा मामलों में कन्सल्टेशन और कोऑर्डिनेशन पर वर्किंग मेकानिज़्म के तहत भी बातचीत जारी रखी जाएगी।
  5. जैसे-जैसे तनाव कम होगा दोनों पक्षों को सीमा इलाक़ों में शांति बनाए रखने के लिए आपस में भरोसा बढ़ाने के लिए कदम उठाने चाहिए.

पांच सूत्रीय समझौते का अवलोकन

  • वर्ष 1993 के समझौते के तहत दोनों देशों द्वारा LAC पर सेना की उपस्थिति को कम-से-कम करने और शांति तथा स्थिरता बनाए रखने पर सहमति व्यक्त की गई थी। किन्तु चीन के मुखर और आक्रामक व्यवहार के कारण ही मतभेद आज विवाद बन गए हैं। ऐसे में, इस बात की क्या गारंटी है कि चीन भविष्य में अपना व्यवहार बदल ही लेगा । समझौते के मुताबिक, द्विपक्षीय बातचीत जारी रखी जाएगी, सीमा पर तनाव कम किया जाएगा, एक-दूसरे देशों के सैनिकों की उचित दूरी बनाई जाएगी आदि। मगर यह सब भी इतना आसान नहीं दिख रहा है। खासतौर से सैनिकों की उचित दूरी बनाने पर भले ही चीन ने सहमति जताई हो, लेकिन उसकी फौज इसका उल्लंघन करती रही है।
  • साफ है, चीन को अपनी कथनी और करनी का फर्क मिटाना होगा, तभी इस सहमति का कोई अर्थ निकल सकेगा। दोनों देश ‘स्पेशल रिप्रेजेंटेटिव मैकेनिज्म’ के जरिए बातचीत करेंगे। इसके अलावा, सीमा से जुड़े सवालों के हल के लिए कंसल्टेशन व को-ऑर्डिनेशन पर वर्किंग मैकेनिज्म के जरिए भी बातचीत की जाएगी। इस तरह की वार्ताएं पहले भी होती रही हैं। स्पेशल रिप्रेजेंटेटिव मैकेनिज्म के तहत अपने यहां के राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार (एनएसए) और चीन के स्टेट काउंसलर की कई बैठकें हो चुकी हैं। अच्छी बात है कि इसे आगे भी जारी रखने पर दोनों पक्ष राजी हुए हैं। मगर इसमें भी एक पेच यह है कि जब तक दोनों पक्षों में सीमा-निर्धारण पर निर्णायक सहमति नहीं बन जाती, सीमा संबंधी सवालों पर इस तरह की व्यवस्था बहुत कारगर साबित नहीं होगी।
  • पूर्व में विश्वास बहाली के तमाम रास्ते अपनाए गए, जिनका चीन उल्लंघन करता रहा है। विश्वास बहाली के नए उपायों से हम पर अधिक पाबंदी लगाई जा सकती है और रणनीतिक लिहाज से महत्वपूर्ण जिन पहाड़ियों पर हमने कब्जा किया है, उनको छोड़़ने का दबाव बनाया जा सकता है। यहां यह देखना भी लाजिमी है कि चीन की मंशा साझा सहमति पत्र जारी होने के बाद उसके द्वारा जारी बयान से जाहिर होती है। इस बयान में कहा गया है कि उसने भारत को साफ-साफ कहा है कि सीमा पर उकसावे वाली कार्रवाइयां उसे बंद कर देनी चाहिए। ऐसे में, यह सवाल बना हुआ है कि क्या यह सहमति लंबे समय तक प्रभावी रहेगी?
  • दरअसल, कई ऐसे अहम सवाल हैं, जिनका जवाब यह साझा बयान नहीं देता। जैसे, फौज की उचित दूरी किस तरह कायम रखी जाएगी, क्योंकि जब पीपुल्स लिबरेशन आर्मी (पीएलए) वास्तविक नियंत्रण रेखा के करीब बढ़ी, तभी हमने भी मजबूरन अपने हिस्से की उन पहाड़ियों पर कब्जा किया, जो सामरिक नजरिए से महत्वपूर्ण हैं और पूर्व के समझौतों के तहत कोई देश उन पर अपने सैनिक तैनात नहीं कर सकता है। इसी तरह, अतिरिक्त फौज कब, कैसे और कितनी दूर वापस लौटेगी? इसका जिक्र भी साझा बयान में नहीं है। सवाल यह भी है कि जिन पहाड़ियों पर भारत ने फिर से कब्जा हासिल कर लिया है, क्या उन्हें छोड़ दिया जाएगा? साफ है, आगे की बातचीत में काफी माथापच्ची होने वाली है और साझा सहमति का बने रहना मुश्किल हो सकता है।
  • जमीनी स्‍तर पर देखा जाए तो चीन की सेना अधिक सैनिकों को एकत्र कर रही है. विश्लेषकों के अनुसार, अब पैंगोंग झील के उत्तर की ओर फिंगर-3 क्षेत्र के पास पीपुल्स लिबरेशन आर्मी के सैनिक एकत्र हो रहे हैं । इसके अतिरिक्त भारत के दक्षिण की ओर से कुछ सामरिक ऊंचाइयों पर पहुंचने के बाद, चीनी सेना उत्तर दिशा में भी ऐसा ही कुछ करने की कोशिश कर रही है.

चीन के रवैये में बदलाव का कारण

  • चीन के द्वारा वन चाइना नीति के तहत ना केवल हांगकांग और ताइवान के प्रति लगातार आक्रामक रुख का पालन किया गया है बल्कि दक्षिण-चीन सागर में सभी पड़ोसी देशों के साथ भी चीन के विवाद और बढ़े हैं। ऐसे में आशंका यह भी है कि दक्षिण-चीन सागर में कभी भी युद्ध भड़क सकता है एवं अमेरिका के नेतृत्व में अन्य देश चीन की नाकाबंदी भी कर सकते हैं,जिससे दक्षिणी-चीन सागर समेत हिंद- महासागर में चीन की गतिविधियों को प्रतिबंधित किया जा सकता है। ऐसे में चीन की उर्जा सुरक्षा हेतु चीन पाकिस्तान आर्थिक कॉरिडोर-CPEC एक उपयुक्त विकल्प हो सकता है। इसी को देखते हुए चीन ने इस परियोजना में काफी निवेश किया है लेकिन विगत कुछ वर्षों से केंद्रीय सरकार द्वारा अवसंरचना निर्माण, जम्मू- कश्मीर और लद्दाख को विभाजन किए जाने के साथ-साथ अन्य घटनाओं ने चीन के इस महत्वाकांक्षी परियोजना की सफलता पर प्रश्न चिन्ह लगा दिया है।
  • एलएसी पर भारत के तेजी से बुनियादी ढांचे का विकास कर रहा है जिससे चीन को प्रतीत हो रहा है कि उसकी रणनीतिक स्थिति कमजोर हो रही है. लद्दाख में पिछले वर्ष भारत ने 255 किलोमीटर लंबी सड़क जो बनाई है, उसे चीन बर्दाश्त नहीं कर पा रहा है. इस सड़क के जरिए मौजूदा टकराव वाली गलवान घाटी तक पहुंचने का रास्ता भी है.
  • कोरोना वायरस को लेकर अपारदर्शिता और दुनिया को इसके बारे में देरी से चेतावनी देने के कारण दुनिया के ज्यादातर देश विशेषकर पश्चिमी देश चीन पर हमलावर हैं। इस कारण कोरोना वायरस को लेकर चीन के खिलाफ अंतर्राष्ट्रीय जांच का दबाव है । अमेरिका ने तो साफ कर दिया है कि जब तक चीन कोरोना वायरस को लेकर जिम्मेदारी भरा व्यवहार नहीं करता, तब तक चीन के साथ रिश्ते सुधरने की कोई गुंजाइश नहीं है. भारत ने कोरोना के संदर्भ में अंतर्राष्ट्रीय जांच का समर्थन किया था । इस कारण भारत की सीमा पर तनाव पैदा करके चीन संदेश देना चाहता है कि अंतरराष्ट्रीय मंच पर चीन के खिलाफ जाने से पहले भारत को इसके परिणामों के बारे में सोच लेना चाहिए। जानकारों का मानना है कि लिपुलेख दर्रा को लेकर नेपाल के अप्रत्याशित विरोध के पीछे भी चीन को माना जा रहा है और इस सबके जरिए वह भारत को संदेश जाना चाहता है कि वह उसके पड़ोस में समस्याएं पैदा कर सकता है।
  • इसके अतिरिक्त चीन हांगकांग में हो रहे प्रदर्शन से ध्यान भटकाने के लिए पड़ोसी देशों के साथ सीमा विवाद को हवा दे रहा है ।पूरी दुनिया में ताईवान के लिए समर्थन बढ़ता जा रहा है .हालांकि चीन ताईवान को अपना हिस्सा मानता है और वो उसके खिलाफ सैन्य कार्रवाई की धमकी भी दे चुका है, लेकिन अब पूरी दुनिया धीरे धीरे ताइवान का समर्थन कर रही है और चीन के लिए ये बहुत बड़ी कूटनीतिक विफलता है. चीन गंभीर सवालों से खूबसूरत शब्दों की आड़ में बचना चाहता है.
  • चीन के आक्रामक रुख का अन्य कारण घर के अंदर पैदा होता असंतोष है। अंतरराष्ट्रीय राजनीति में अक्सर ऐसा देखने को मिलता है कि जब कोई भी सरकार या नेता अपने देश में खुद को घिरता हुआ पाता है तो अन्य देशों के साथ तनाव या संघर्ष की स्थिति पैदा कर देता है। ऐसा करके उसका मकसद देश में राष्ट्रवाद की हवा पैदा करना और इसके जरिए उसकी विफलताओं से लोगों का ध्यान हटाना होता है।
  • भारत की सीमा पर दृढ़ प्रतिक्रिया के कारण चीन अपने उद्देश्यों को न तो राजनीतिक न ही सैन्य रूप से हासिल कर पाया है। इसके बावजूद शी जिनपिंग 2021 में कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ चाइना (COC) के शताब्दी समारोह और 2022 में कम्युनिस्ट पार्टी के पंचवर्षीय आयोजन के दौरान विस्तारवादी नीति पर अपनी उपलब्धियों में इजाफा करना चाहते हैं ।

आगे की राह

  • वास्तविक नियंत्रण रेखा (एलएसी) की जमीनी तस्वीर अब काफी बदल चुकी है। इसलिए हमें सीमांकन के लिए चीन पर दबाव बनाना चाहिए। उसके अड़ियल रुख के कारण ही अब तक दोनों देश भौगोलिक सीमा तय नहीं कर सके हैं। फौज सीमा विवाद का हल नहीं निकाल सकती। ‘स्पेशल रिप्रेजेंटेटिव मैकेनिज्म’ के जरिए जो बातचीत होगी, उसमें हमारा इसी पर जोर रहना चाहिए।
  • हम चीन का भरोसा नहीं कर सकते। साझा बयान से भ्रमित होकर हमें यह सोचकर शांत नहीं हो जाना चाहिए कि समस्याओं का अब अंत हो गया है। चीन ने करीब चार डिवीजन के बराबर सैनिक सीमा पर भेज रखे हैं। वे बैरकों में जल्दी नहीं लौटने वाले। इसी तरह, भारत ने भी लगभग 40,000 सैनिकों को वहां तैनात किया है। ये सर्दियों में भी वहां रहने की तैयारी कर रहे हैं, जब तापमान माइनस 20 डिग्री सेल्सियस तक पहुंच जाता है। चीन की धोखेबाजी को देखते हुए हम अपनी फौज वापस बुला भी नहीं सकते। साफ है कि हमें लंबी लड़ाई के लिए खुद को तैयार करना होगा।
  • भारत को न केवल लद्दाख में, बल्कि एलएसी की पूरी लंबाई में अपनी सक्रिय मुद्रा जारी रखनी चाहिए। भारत सरकार को अप्रैल 2020 की स्थिति पर जोर देना चाहिए और चीन को यह स्पष्ट संदेश देना चाहिए कि सीमा मुद्दे को द्विपक्षीय संबंधों से ही सुलझाया जा सकता है।

मुख्य परीक्षा प्रश्न :

  • भारत और चीन के बीच तनाव को कम करने के लिए पांच सूत्रीय समझौते पर सहमति जताई गयी है । इस समझौते का विश्लेषण करें ।