अपशिष्ट प्रबंधन के लिए पाँच सूत्रीय कार्य योजना - यूपीएससी, आईएएस, सिविल सेवा और राज्य पीसीएस परीक्षाओं के लिए समसामयिकी लेख

चर्चा का कारण

  • भारत में प्रति वर्ष लगभग 275 मिलियन टन अपशिष्ट उत्पन्न होता है। वर्तमान में लगभग 20-25 प्रतिशत अपशिष्ट उपचार दरों के साथ इस अपशिष्ट का अधिकांश हिस्सा अनुपचारित रह जाता है। ऐसे में जानकारों का मानना है कि वर्षों की उपेक्षा, दूरदर्शिता की कमी और शहरी नियोजन की पूर्ण अनुपस्थिति ने भारत को अपशिष्ट- लैंडफिल, अपशिष्ट-चोक नालियों, जल निकायों और नदियों को अपशिष्ट के ढेर में बदल कर रख दिया है । इसलिए विश्लेषकों ने पाँच सूत्रीय कार्य-योजना के तहत सस्ती तकनीक, त्वरित खरीद प्रक्रिया , एक नई नीति, कुशल कर्मियों और शून्य-अपशिष्ट समाज को अपनाने पर बल दिया है ।

परिचय

  • भारत भर में लगभग 48 मान्यता प्राप्त लैंडफिल हैं, इस लैंडफिल ने लगभग 5,000 एकड़ भूमि को कवर किया है, जिसकी कुल भूमि मूल्य लगभग 100,000 करोड़ रुपये है। मुंबई में देवनार डंपसाइट(Deonar dumpsite) इसका एक उदाहरण है। यह भारत का सबसे पुराना लैंडफिल है, जिसे 1929 में स्थापित किया गया था। यह लगभग 325 एकड़ भूमि को कवर करता है। यह लैंडफिल 5,500 मीट्रिक टन कचरा, 600 मीट्रिक टन गाद(slit) और 25 टन जैव-चिकित्सा अपशिष्ट रोजाना प्राप्त करता है।
  • भारत विश्व स्तर पर सबसे ज्यादा कचरा पैदा करता है । नालियाँ और जल निकाय से निकालने वाले गाद एवं कचरा भारतीय नदियों में प्रवेश करते हैं । इसका एक उदाहरण गंगा नदी है जो दुनिया की शीर्ष 10 प्रदूषित नदियों में शामिल है।

अपशिष्ट एवं उसके प्रकार

  • अपशिष्ट पदार्थ नियमित रूप से इकट्ठा होने वाले उस कचरे को कहा जाता है, जो रोज कारखानों, ऑफिस,घरों,एवं अन्य इमारतों की साफ –सफाई के बाद एकत्रित होता है तथा जिसे हम कचरापात्र या सड़क और नदियों में ऐसे ही फेंक देते हैं । संक्षेप में अपशिष्ट पदार्थ को निम्न वर्गों में बाटा जाता है-
  1. घरेलू अपशिष्ट – घरों से निकलने वाला कचरा घरेलू अपशिष्ट कहलाता है। जिसमें कागज, काँच, बोतल, डिब्बे, बेकार पड़े कपड़ें, रसोईघर में फल व सब्जियों का कचरा, अनुपयोगी खाद्य पदार्थ आदि आते हैं। पार्टियों,धार्मिक और सामाजिक अवसरों के समय घरेलू अपशिष्ट की मात्रा बढ़ जाती है।
  2. औद्योगिक अपशिष्ट – विभिन्न औद्योगिक इकाइयाँ ऊर्जा संयंत्र खनन प्रक्रियाएँ जो अपशिष्ट छोड़ते हैं। वे औद्योगिक अपशिष्ट कहलाते हैं। ये पर्यावरण प्रदूषण के मुख्य स्त्रोत होते हैं। इनके वायु प्रदूषण, जल प्रदूषण,ध्वनि प्रदूषण एवं मृदा प्रदूषण आदि प्रदूषण होते हैं।
  3. चिकित्सकीय अपशिष्ट – अस्पतालों से निकले अपशिष्ट जैसे काँच, प्लास्टिक की बोतलें, ट्यूब, सीरिंज आदि अजैव निम्नीकरणीय अपशिष्ट है इसके अलावा जैव निम्नीकरणीय अपशिष्ट जैसे रक्त, मांस के टुकड़े, संक्रमित उत्तक व अंग अनेक रोगों के संक्रमण हेतु माध्यम प्रदान करते हैं
  4. कृषि अपशिष्ट – कृषि में अधिक उत्पादन के लिए अधिक मात्रा में प्रयोग में लिए गए उर्वरक , कीटनाशी, शाकनाशी, कवक नाशी आदि रसायनों से पर्यावरणीय प्रदूषण होता है। अनुपयोगी भूसा, घास-फूस,फसल अपशिष्ट, पत्तियाँ आदि एकत्रित होने पर वर्षा जल से सडऩे वाले कृषि अपशिष्ट होते हैं और इनमें होने वाली जैविक क्रियाओं से प्रदूषण होता है।

अपशिष्ट प्रबंधन का महत्व

  • शहरीकरण, औद्योगिकरण और आर्थिक विकास के परिणाम स्वरूप शहरी कूड़े-करकट की मात्रा बहुत बढ़ गई है। बेतहाशा बढ़ती जनसंख्या और लोगों के जीवन स्तर में सुधार से यह समस्या और भी जटिल हुई है। ऐसे में कुशल ठोस अपशिष्ट प्रबंधन प्रणाली का मुख्य उद्देश्य कूड़े-करकट से उपयोगी पदार्थों को निकालना और बचे हुए अपशिष्ट से प्रसंस्करण केन्द्र में बिजली का उत्पादन करना है। साथ ही लैंडफिल में डाले जाने वाले कूड़े की मात्रा को कम से कम करना है क्योंकि तेजी से सिमट रहे भूमि संसाधन पर इसका बहुत बुरा असर पड़ रहा है। इतना ही नहीं। इस तरह से फेंका गया कूड़ा-करकट वायु, मृदा और जल प्रदूषण का खतरा पैदा कर सकता है। अपशिष्ट प्रबंधन के महत्व को हम निम्न लाभों के द्वारा समझ सकते है-
  1. प्राकृतिक संसाधनों की सुरक्षाः वनों, गैसों और पानी जैसे कई प्राकृतिक संसाधनों की घटती समस्या हमारे लिए गम्भीर चिन्ता का विषय बन गई है। इसलिए आवश्यक है कि प्लास्टिक आदि की बनी वस्तुओं के पुनः उपयोग से हम वनों की कटाई इत्यादि को रोक सकते हैं।
  2. ऊर्जा क्षमता में बढ़ोत्तरीः पुनरावृत्ति ऊर्जा का उत्पादन करने का एक शानदार तरीका है। नई वस्तुओं का उत्पादन करने हेतु अत्यधिक ऊर्जा की आवश्यकता होती है। प्रयोगों से यह पता चला है कि हमारे घरों के अपशिष्ट पदार्थों को एक विशेष प्रणाली के द्वारा बिजली उत्पन्न में प्रयोग किया जा सकता है।
  3. प्रदूषण में कमीः खुले में कचरा इकट्ठा करना या फिर भूमिगत डम्पिंग से जल प्रदूषण तथा वायु प्रदूषण की समस्या बढ़ती जा रही है। यदि अपशिष्ट प्रबंधन वैज्ञानिक विधि से किया जाए तो प्रदूषण का स्तर कम हो सकता है।
  4. अपशिष्ट पुनरावृत्तिः अपशिष्ट दिन-प्रतिदिन गम्भीर समस्या बनते जा रहे हैं, जैसे-अपशिष्टों का समुद्र में प्रवाह तथा कचरे को नदियों या खुले क्षेत्रों में फैंकना आदि, लेकिन अपशिष्टों को उपयोगी रूप में पुनः परिवर्तित कर इस समस्या को कम किया जा सकता है।

अपशिष्ट प्रबंधन की कुशल विधि

अपशिष्ट के समुचित प्रबंधन हेतु की दिशा में निम्न गतिविधियों को शामिल किया जाता है-

  1. अपशिष्ट पदार्थ उत्पन्न करने वालों द्वारा कचरे को सूखे और गीले कचरे के रूप में छांट कर अलग करना चाहिए ।
  2. घर घर जाकर कूड़ा इकट्ठा करना और छंटाई के बाद इसे प्रसंस्करण के लिए भेजना चाहिए ।
  3. सूखे कूड़े में से प्लास्टिक, कागज, धातु, कांच जैसी पुनर्चक्रित हो सकने वाली उपयोगी सामग्री छांटकर अलग करना चाहिए ।
  4. कूड़े के प्रसंस्करण की सुविधाओं, जैसे कम्पोस्ट बनाने, बायो-मीथेन तैयार करने, और कूड़े-करकट से ऊर्जा उत्पादन करने के संयंत्रों की स्थापना करना चाहिए ।
  5. अपशिष्ट के निस्तारण की सुविधा हेतु लैंडफिल बनाना चाहिए ।

अपशिष्ट प्रबंधन की चुनौतियाँ

  • भारत विश्व स्तर पर सबसे ज्यादा कचरा पैदा करता है, और अगर 2050 तक तत्काल उपाय नहीं किए गए तो वर्तमान कचरे की संख्या दोगुनी हो जाएगी।
  • देश में शहरी अपशिष्ट की प्रकृति है जिसमें ऐसे पदार्थों का मिश्रण होता है जो पूरी तरह से दहन के लिए उपयुक्त नहीं होता है। चूंकि शहरी अपशिष्ट का 80 प्रतिशत पदार्थ सड़ा-गला भोजन, रद्दी-कतरन जैसे जैविक पदार्थ होते हैं इसलिए निर्धारित वायु गुणवत्ता मानक पर खरे उतरने में मौजूदा संयंत्र को कठिनाई आती है।
  • केंद्र, राज्य, और स्थानीय सरकारें दशकों से अपशिष्ट प्रबंधन के मुद्दे पर कार्य कर रही हैं किन्तु ठोस अपशिष्ट प्रबंधन नियम-2016 का पालन नहीं किया जाता है। भारत में लगभग 92 बड़े डब्ल्यूटीई संयंत्र हैं। राज्य सरकारों ने अब तक ऐसे संयंत्रों में अनुमानित 10,000 करोड़ रुपये का निवेश किया है। इनमें से कुछ ऐसे संयंत्र हैं जो चालू तो हैं, किन्तु वे बुनियादी ढाँचे और प्रौद्योगिकी की कमी के कारण कुशल अपशिष्ट प्रबंधन सेवाएँ प्रदान करने में सक्षम नहीं हैं ।
  • मौजूदा अपशिष्ट के निपटान की विधियां बहुत अच्छी नहीं है। शहरी नगर-निगम अपशिष्ट प्रबंधन पर 500 से 1500 रुपये प्रति टन खर्च करती है। इसमें से 60 से 70 प्रतिशत कूड़ा एकत्रित करने में शेष 20 से 30 प्रतिशत एकत्रित कचड़े को घूरे तक ले जाने में खर्च होता है जिसके बाद कचड़े के प्रबंधन और निपटान पर खर्च करने के लिए कुछ भी राशि नहीं बचती है। इसके अलावा शहरी क्षेत्रों को कम कर स्वास्थ्य के लिए हानिकारक कूड़े के मैदान बनाना एक बड़ी चुनौती है।
  • अपशिष्ट प्रबंधन से बड़े पैमाने पर कम्पोस्ट खाद और बायो गैस उत्पन्न करने के लिए स्थापित किये जाने वाले संयंत्रों के लिए जगह की कमी एक प्रमुख समस्या है।
  • शहर की नगरपालिकाओं का मुख्य दायित्व है कि वे शहरों को साफ रखने के लिए अपशिष्ट का प्रबंधन करें। लेकिन लगभग सभी नगरपालिकाएं लैंडफिल साइट में अपशिष्ट पहुंचाकर अपनी जिम्मेदारी से पल्ला झाड़ लेती हैं। जानकारों का मानना है कि भारत में अपशिष्ट प्रबंधन की दोषपूर्ण व्यवस्था के कारण ऐसा होता है।
  • दिल्ली, चेन्नई, कोलकाता, मुंबई, बेंगलुरु, अहमदाबाद और हैदराबाद सबसे ज्यादा प्लास्टिक अपशिष्ट उत्पन्न करने वाले शहरों में शामिल हैं। भारत में प्लास्टिक का उत्पादन अगले 20 सालों में दोगुना हो जाएगा, इसलिए इसके उचित प्रबंधन का अभाव है ।
  • अगर कूड़ा-करकट एकत्र नहीं किया जा रहा है और छांट कर अलग-अलग करके प्रसंस्करण केन्द्र में ठीक से नहीं भेजा जा रहा है तो इसका प्रसंस्करण करना सम्भव नहीं है। इस स्थिति में अपशिष्ट लैंडफिल में फेंक दिया जाता है। ऐसे में उसका प्रसंस्करण बड़ा मुश्किल है क्योंकि ऐसे कूड़े के साथ भवन निर्माण और उनकी तोड़-फोड़ से निकला मलबा भी होता है जिसे प्रसंस्करण संयंत्र में सीधे उपयोग में नहीं लाया जा सकता।

अपशिष्ट प्रबंधन हेतु सरकारी प्रयास

  • भारत सरकार ने क्षेत्र-आधारित विकास और शहरी स्तर के स्मार्ट समाधान के माध्यम से जीवन में सुधार के लिए स्वच्छ भारत अभियान (एसबीए) और स्मार्ट सिटी मिशन (एससीएम) शुरू किये हैं। इन योजनायों के आलोक में नीति आयोग ने नगरपालिका के ठोस अपशिष्ट (एमएसडब्ल्यू) प्रबंधन की समस्‍या से निपटने के लिये व्यापक ढांचा तैयार किया है।
  • वार्षिक स्वच्छता शहरी सर्वेक्षण के द्वारा शहरों की नगरपालिकाओं/शहरी निकायों में प्रतिस्पर्धा की भावना को बाध्य है जिससे वे अपशिष्ट प्रबंधन के दिशा में पहले से ज्यादा सजग हुए है।
  • ठोस अपशिष्ट प्रबंधन नियमावली 2016, वन और जलवायु परिवर्तन, आवासन और शहरी कार्य मंत्रालय, केन्द्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड, राज्य प्रदूषण नियंत्रण बोर्डों, राज्यों के शहरी मामलों के विभागों, स्थानीय निकायों और ग्राम पंचायतों तथा कूड़ा उत्पन्न करने वालों समेत विभिन्न भागीदारों की जिम्मेदारी रेखांकित करती है। दूसरी ओर आवासन और शहरी कार्य मंत्रालय, राज्यों के शहरी मामलों के विभागों और स्थानीय निकायों को मुख्य रूप से अपशिष्ट प्रबंधन के लिए बुनियादी ढाँचे के विकास का उत्तरदायित्व सौंपा गया है।
  • इसके अलावा पर्यावरण, वन और जलवायु परिवर्तन मंत्रालय, केन्द्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड, राज्यों के प्रदूषण नियंत्रण बोर्डों और प्रदूषण नियंत्रण समितियों को नियमों पर अमल की निगरानी करने की जिम्मेदारी सौंपी गई है। कूड़ा उत्पन्न करने वालों की मूल जिम्मेदारी यह है कि वे कूड़े की छंटाई करें क्योंकि यह ठोस अपशिष्ट प्रबंधन की मुख्य आवश्यकता है। ये नियम ठोस अपशिष्ट प्रबंधन प्रणाली के महत्त्वपूर्ण घटकों की आवश्यकताओं को रेखांकित करने के साथ ही लक्ष्यों को प्राप्त करने की समय-सीमा भी निर्धारित करते हैं।
  • राष्ट्रीय हरित अधिकरण अधिनियम 2010 के पारित होने के बाद राष्ट्रीय हरित अधिकरण के न्यायिक हस्तक्षेप की वजह से विभिन्न भागीदार संकारी एवं अन्य जिम्मेदार तंत्र ठोस अपशिष्ट प्रबंधन नियमावली के प्रावधानों का पालन सुनिश्चित कर रहे हैं।
  • पुणे (महाराष्ट्र), इंदौर (मध्य प्रदेश) और अम्बिकापुर (छत्तीसगढ़) इत्यादि को अपशिष्ट प्रबंधन हेतु मॉडल शहरों के रूप में विकसित किया गया है। इन शहरों ने अपशिष्ट प्रबंधन की दिशा में ना केवल कूड़े-करकट का दक्षतापूर्ण संग्रह करने, उसकी छंटाई और प्रसंस्करण की सुविधाएँ विकसित की हैं बल्कि इन शहरों ने कूड़ा फेंकने से खराब हुए स्थानों को उपचार कर पुनः उपयोग योग्य बनाया है। ये शहर अन्य नगरों के लिए पथ प्रदर्शक का कार्य कर रहे है।
  • देश में हानिकारक कचरे के ठोस पर्यावरणीय प्रबंधन के कार्यान्वयन को मजबूत बनाने के लिए, पर्यावरण, वन और जलवायु परिवर्तन मंत्रालय ने 1 मार्च, 2019 को जारी अधिसूचना संख्या जी.एस.आर. जी.एस.आर.एक्सएक्स (ई) के माध्यम से हानिकारक और अन्य अपशिष्ट (प्रबंधन और पारगमन) नियम, 2016 में संशोधन किया है।

अपशिष्ट प्रबंधन हेतु पाँच सूत्रीय कार्य योजना

वर्तमान में अपशिष्ट प्रबंधन के लिये राष्ट्रीय मिशन के रूप में कार्य करने की आवश्यकता है। इसके लिए विशेषज्ञों द्वारा दिये गए निम्न सुझावों को अमल में लाया जा सकता है –

  1. सस्ती तकनीक : आज, अपशिष्ट प्रबंधन के लिए आवश्यक अधिकांश प्रौद्योगिकी / उपकरण आयातित, महंगे हैं और अकसर हमारी विभिन्न स्थानीय स्थितियों में अनुकूल नहीं होते हैं। सबसे पहले नगरपालिकाओं को सस्ती तकनीक तक पहुंच की आवश्यकता है जो कि भारतीय परिस्थितियों में अनुकूलित हों। भारतीय शहरों की जटिल संरचना को देखते हुए सस्ती, विकेंद्रीकृत और अनुकूलित समाधान की आवश्यकता है। उदाहरण के लिए, जल निकायों को साफ करने के लिए ऐसे उपकरण (जैसे रोबोट , स्वचालित मशीन इत्यादि )आयात किए जा सकते हैं, जो बड़े जल निकायों के लिए अच्छी तरह से काम कर सकें । आत्मनिर्भर भारत अभियान के तहत छोटे नालों और जल निकायों के लिए रोबोटिक उपकरणों का डिजाइन और निर्माण आवश्यक है।
  2. त्वरित खरीद प्रक्रिया : कठोर एवं लंबी प्रशासनिक प्रक्रिया के कारण प्रौद्योगिकी और उपकरणों की खरीद में देरी हो जाती है जिससे राज्य सरकारें कई चुनौतियों का सामना कर रही हैं। ऐसे में अपशिष्ट प्रबंधन को देखते हुए प्रौद्योगिकी और उपकरणों की खरीद के लिए एक कम बोझिल प्रक्रिया का विकास अनिवार्य है।
  3. एक नई नीति : भारत में एक ऐसी नयी नीति की आवश्यकता है जो अपशिष्ट को हटाने में तेजी ला सकती है। नयी नीति के माध्यम से कंपनियां या उद्योग जो लैंडफिल को साफ करते हैं, उन्हे विशेष प्रोत्साहन देने की आवश्यकता है ।
  4. कुशल कर्मियों की नियुक्ति : कचरे के प्रबंधन, संयंत्रों के संग्रह, संचालन और रखरखाव से अपशिष्ट प्रबंधन श्रृंखला को संचालित करने और बनाए रखने के लिए कुशल और प्रशिक्षित पेशेवर कर्मियों की नियुक्ति पर ध्यान देने की आवश्यकता है । इसके लिए मशीनीकरण के पूर्ण उपयोग की जरूरत है।
  5. स्वीडन अब अपने कुछ संयंत्रों के लिए कचरे का आयात कर रहा है और उत्पन्न सभी कचरे निश्चित रूप से उसे विदेशी मुद्रा प्रदान कर रहे हैं । जहां तक भारत की बात करें तो यहाँ पारंपरिक रूप से एक ऐसा समाज है , जहाँ वस्तुओं की बहुत कम बर्बादी करता है और सब कुछ पुन: उपयोग और पुनर्नवीनीकरण करने की कोशिश करता है। इसलिए हमे ऐसे समाज के विकास को बढ़ावा देने के लिए शिक्षा मुहैया कराने की आवश्यकता है ।

आगे की राह

  • अपशिष्ट प्रबंधन के लिए सबसे जरूरी है कि स्रोत से ही उसे ठीक से अलग-थलग कर लिया जाए ताकि उसकी उचित रिसाइक्लिंग और पुन: उपयोग हो सके। भारत के केवल तीन राज्यों व केंद्र शासित प्रदेशों- केरल, छत्तीसगढ़ व दमन व दीव में 100 प्रतिशत अपशिष्ट स्रोत से अलग-थलग किया जाता है, जिसे सभी राज्य सरकारों को अपनाने की आवश्यकता है । इसके अतिरिक्त ग्राम पंचायतों तथा कूड़ा उत्पन्न करने वालों समेत विभिन्न भागीदारों की जिम्मेदारी तय करने एवं उनकी निगरानी करने की आवश्यकता है।
  • अपशिष्ट प्रबंधन के लिये राष्ट्रीय मिशन के रूप में पाँच सूत्रीय कार्य योजना के साथ- साथ अपशिष्ट प्रबंधन के लिए नीति आयोग द्वारा सुझाए गए समाधान: बड़ी नगर पालिकाओं के लिए अपशिष्ट पदार्थ से ऊर्जा तैयार करना और छोटे कस्बों तथा अर्ध- शहरी क्षेत्रों के लिए अपशिष्ट का निपटान कर खाद तैयार करने की विधि की दिशा में आगे बढ़ाना चाहिये। इसके साथ ही नीति आयोग द्वारा सुझाए गए उपाय के तहत नगरपालिका के ठोस अपशिष्ट साफ करने की प्रक्रिया में तेजी लाने के लिये संयंत्र लगाने के वास्‍ते सार्वजनिक निजी भागीदारी हेतू भारतीय राष्ट्रीय राजमार्ग प्राधिकरण (एनएचएआई) के समान ही नया वेस्ट टू एनर्जी कॉरपोरेशन ऑफ इंडिया (डब्ल्यूईसीआई) स्थापित करना चाहिये जिससे अपशिष्ट प्रबंधन में वांछित सफलता पाई जा सके।

मुख्य परीक्षा प्रश्न :

  • अपशिष्ट प्रबंधन एवं उसकी महत्ता का वर्णन करें साथ ही कूड़ा उत्पन्न करने वालों समेत विभिन्न भागीदारों की जिम्मेदारी तय करने के लिए प्रमुख सुझाव प्रस्तुत करें ।