राजकोषीय परिषद (Fiscal council) - यूपीएससी, आईएएस, सिविल सेवा और राज्य पीसीएस परीक्षाओं के लिए समसामयिकी लेख

चर्चा में क्यों?

  • वर्तमान में देश की राजकोषीय स्थिति चिंताजनक है। भारत सरकार को जीएसटी से अप्रत्यक्ष कर संग्रह भी कम प्राप्त हुआ है।
  • हाल ही में हुई जीएसटी काउंसिल की बैठक में केन्द्र एवं राज्यों के बीच राजस्व वितरण को लेकर मतभेद उभकर सामने आये हैं।
  • कोविड-19 महामारी की चुनौतियों से निपटने के लिए सरकार को अधिक व्यय करना पड़ रहा है जबकि आर्थिक गतिविधियों को शिथिल होने से अपेक्षानुरूप राजस्व की प्राप्ति नहीं हो रही है। इस स्थिति को देखते हुए कई विशेषज्ञों व संस्थाओं ने यह आशंका जतायी है कि देश का राजकोषीय घाटा (Fiscal deficit) बढ़ सकता है, अतः इसे प्रबंधित करने हेतु एक स्वतंत्र राजकोषीय परिषद (Fiscal council) को स्थापित किया जाना चाहिए।

पृष्ठभूमि

  • कोविड-19 महामारी के प्रसार को रोकने हेतु न सिर्फ भारत ने बल्कि दुनिया के लगभग सभी देशों ने लॉकडाउन को समय-समय पर लगाया है और यह समय व परिस्थितियों के अनुसार अभी भी लगाया जा रहा है। इससे सभी देशों की अर्थव्यवस्थाओं को भारी नुकसान उठाना पड़ रहा है और वैश्विक आपूर्ति श्रृंखला बुरी तरह प्रभावित हुई है।
  • आर्थिक चुनौतियों के इस दौर में भारत में कई अर्थशास्त्रियों का कहना है कि भारत सरकार को अपना खर्च बढ़ाना चाहिए बिना इसकी चिंता किये कि सरकार पर कर्ज बढ़ रहा है, ताकि अर्थव्यवस्था को पटरी पर लाया जा सके।
  • दूसरी तरफ भारत सरकार को यह डर है कि अधिक खर्च करने से सरकार पर कर्ज का बोझ और राजकोषीय घाटा अनियंत्रित रूप से बढ़ सकते हैं। इस स्थिति में क्रेडिट रेटिंग एजेंसियाँ (स्टैण्डर्ड एण्ड पुअर्स, मूडीज, फिच आदि) भारतीय अर्थव्यवस्था की रेटिंग कम कर सकती हैं, इससे देश में निवेश भी कम आयेगा। अर्थव्यवस्था में निवेश के कम आने से आर्थिक गतिविधियाँ नकारात्मक रूप से प्रभावित होती हैं और अर्थव्यवस्था सुस्ती (Slowdown) या फिर मंदी की स्थिति में जा सकती है।
  • महामारी के प्रकोप के बीच आर्थिक गतिविधियों को बढ़ाने और सरकार की राजकोषीय घाटा एवं अन्य चिंताओं के बीच संतुलन स्थापित करने हेतु राजकोषीय परिषद के गठन की बात की जा रही है ताकि राजाकोषीय प्रबंधन को स्वतंत्र रूप से परिस्थितियों के मुताबिक प्रबंधित किया जा सके।

वर्तमान में राजकोषीय घाटा की स्थिति

  • भारत में राजकोषीय स्थिति (Fiscal Situation) कोविड-19 महामारी के पहले से ही तनाव में थी, जबकि महामारी ने इसे और भी गंभीर बना दिया है।
  • भारत के नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक (कैग) द्वारा वित्तीय वर्ष 2019-20 के लिए केन्द्र सरकार का राजकोषीय घाटा (Fiscal Deficit) 4.6% (जीडीपी की तुलना में) अनुमानित किया था, यह सरकार के संशोधित अनुमान (Revised estimate) की तुलना में 0-8 प्रतिशत अधिक था।
  • भारत ने चालू वित्त वर्ष (2020-21) के लिए राजकोषीय घाटा का अनुमान जीडीपी का 3-5% लगाया है। किन्तु आर्थिक विशेषज्ञों का कहना है कि कोविड-19 महामारी के परिणामस्वरूप उत्पन्न हुईं प्रतिकूल आर्थिक परिस्थितियों के कारण राजकोषीय घाटा 7% तक जा सकता है।
  • यदि केन्द्र और राज्य के राजकोषीय घाटे को सम्मिलिति कर दिया जाये तो यह देश की जीडीपी का 12% तक जा सकता है।
  • आर्थिक विश्लेषकों का यह भी कहना है कि चालू वित्तीय वर्ष के अंत तक भारत का समग्र ऋण (Overall debt) जीडीपी के 85% तक पहुँच सकता है। यदि इसमें ऑफ बजट देनदारियों (Off Budget Liabilities) को शामिल कर लिया जाये तो स्थिति और भी भयावह दिखेगी।

क्या होता है राजकोषीय परिषद?

  • राजकोषीय परिषद, एक ऐसी स्थायी संस्था होती है जो सरकार की राजकोषीय योजना का स्वतंत्र रूप से मूल्यांकन या विश्लेषण करती है तथा अपने महत्वपूर्ण सुझावों को प्रस्तुत करती है। राजकोषीय योजना के मूल्यांकन के तहत सरकार के महत्त्वाकांक्षी लक्ष्यों, यथा- आगे आने वाले वर्षों में राजकोषीय घाटा को कितना कम करना है, अर्थव्यवस्था की वृद्धि दर को कितना लेकर जाना है इत्यादि, का विश्लेषण करना होता है।
  • आर्थिक सहयोग और विकास संगठन (ओईसीडी) के अनुसार, राजकोषीय परिषद एक सार्वजनिक इकाई हो सकती है जिसमें गैर-निर्वाचित(non-elected) पेशेवर (Professionals) हों तथा इस संस्था का कार्य सरकार के राजकोषीय निष्पादन (fiscal Performance) की स्वतंत्र तरीके से देख-रेख हो सकता है।
  • ओईसीडी के अनुसार, जब राजकोषीय परिषद या संस्थान द्वारा स्वतंत्र तरीके से सरकार के राजकोषीय निष्पादन का वैज्ञानिक व वस्तुनिष्ठ (Scientific & Objective) विश्लेषण किया जायेगा तो देश की अर्थव्यवस्था में स्थायित्व आयेग।

भारत में राजकोषीय परिषद की माँग की पृष्ठभूमि

  • भारत में राजकोषीय परिषद की माँग काफी पुरानी है। तेरहवें वित्त आयोग ने राजकोषीय घाटा को नियंत्रित करने हेतु एक स्वतंत्र एजेंसी अर्थात् राजकोषीय परिषद के गठन का सुझाव दिया था। इसके बाद 14वें वित्त आयोग ने भी इसी प्रकार के सुझाव को प्रस्तुत किया था।
  • सन् 2017 में एन-के-सिंह की अध्यक्षता में गठित एफआरबीएम समीक्षा समिति ने भी राजकोषीय परिषद के गठन की सिफारिश की थी। इस समिति के मुताबिक, राजकोषीय परिषद एक स्वतंत्र निकाय होगी एवं किसी भी दिये गये वित्तीय वर्ष के लिए सरकार की राजस्व घोषणाओं की निगरानी करेगी।

राजकोषीय परिषद के उद्देश्य/कार्य

  • राजकोषीय परिषद का उद्देश्य बहुवर्षीय राजकोषीय प्रक्षेपण (Multi-year fiscal projection) भी है। बहुवर्षीय राजकोषीय प्रक्षेपण का तात्पर्य यह है कि राजकोषीय परिषद को राजकोषीय प्रबंधन एवं इससे संबंधित अन्य बातों का आकलन करना होगा, जैसे कि चालू वित्त वर्ष में भारतीय अर्थव्यवस्था की वृद्धि दर कितनी रहेगी या फिर आगे आने वाले वर्षों में यह कैसे हो सकती है इत्यादि।
  • इस संस्था द्वारा राजकोषीय स्थिरता (Fiscal Sustainability) का विश्लेषण तैयार किया जाता है। जब सरकार का राजस्व की प्राप्ति और खर्च संतुलन की अवस्था में हो और सरकार सुचारू रूप से चलती रहे (कोई भी वित्तीय संकट पैदा न हो) तो इसे राजकोषीय स्थिरता की स्थिति कहते हैं। ध्यातव्य है कि नब्बे के दशक में राजकोषीय स्थिरता को गंभीर रूप से तब नुकसान पहुँचा था जब भारत सरकार के समक्ष भुगतान संतुलन (बीओपी) का संकट खड़ा हो गया था।
  • सरकार ने अपने तय लक्ष्यों के अनुरूप (यथा-एफआरबीम कानून के तहत) राजकोषीय घाटा (Fiscal deficit) के लक्ष्यों को प्राप्त कर पायी है या नहीं, इस बात का मूल्यांकन राजकोषीय परिषद द्वारा किया जाता है। इसके लिए परिषद एक मूल्यांकन रिपोर्ट तैयार करती है।
  • राजकोषीय परिषद यह भी देखती है कि सरकार राजकोषीय नियमों का पालन किस प्रकार से कर रही है।
  • राजकोषीय आँकड़ों को और कैसे बेहतर किया जा सकता है, इसकी सिफारिश राजकोषीय परिषद द्वारा की जाती है।
  • सरकार द्वारा बजट में की गयी घोषणाओं को भविष्य में कैसे आसानी से लागू किया जाये, इसके लिए राजकोषीय प्रबंधन में जरूरी संशोधनों का सुझाव परिषद द्वारा किया जाता है।
  • राजकोषीय परिषद द्वारा वार्षिक राजकोषीय रणनीतिक रिपोर्ट (Annual Fiscal Strategy Report) भी तैयार की जाती है और उसे सार्वजनिक प्लेटफॉर्म पर प्रस्तुत किया जाता है ताकि राजकोषीय प्रबंधन में पारदर्शिता को स्थापित किया जा सके।

राजकोषीय परिषद के लाभ

  • ओईसीडी के मुताबिक, जब राजकोषीय परिषद या संस्थान द्वारा स्वतंत्र तरीके से सरकार के राजकोषीय निष्पादन का वैज्ञानिक व वस्तुनिष्ठ (Scientific and Objective) विश्लेषण किया जायेगा तो देश की अर्थव्यवस्था में स्थायित्व आयेगा।
  • सरकार द्वारा बजट में किये गये आवंटन एवं अन्य सरकारी योजनाओं का राजकोषीय परिषद द्वारा वैज्ञानिक व वस्तुनिष्ठ विश्लेषण किया जायेगा तो संसद में चर्चा के दौरान सत्ता पक्ष एवं विपक्ष में सार्थक बहस होगी।
  • सरकार लोक-लुभावनाकारी योजनाओं से परहेज करने लगेगी, क्योंकि इनके दीर्घकालीन दुष्परिणामों को राजकोषीय परिषद विश्लेषित करके सार्वजनिक करेगी।
  • लोगों में भी सरकार की राजकोषीय नीति के प्रति जागरूकता आयेगी।

राजकोषीय परिषद की आवश्यकता का मूल्यांकन

  • कुछ विशेषज्ञ यह प्रश्न उठाते हैं कि क्या वास्तव में भारत में राजकोषीय परिषद के गठन की आवश्यकता है? जबकि इस परिषद के द्वारा किये जाने वाले कार्यों को भारत में विभिन्न कानून एवं संस्थाएँ कर रही हैं। जैसे कि एफआरबीएम कानून (2003) में सरकार के लिए आगे आने वाले वर्षों में राजकोषीय घाटे को कितना कम करना है, यह निर्धारित कर दिया गया है। यदि सरकार इन लक्ष्यों से विचलित होती है तो उसको इसका स्पष्टीकरण प्रदान करना होगा।
  • संसद में भारत सरकार को एक राजकोषीय नीति रणनीति स्टेटमेंट (Fiscal Policy Strategy Statement -FPSS) रखना होता है ताकि सरकार की राजकोषीय नीति से संबंधित स्थितियाँ स्पष्ट हो सकें और संसद में इसमें सार्थक बहस हो सके। जब उपर्युक्त कार्य पहले से ही संसद में किया जा रहा है तो इसके लिए एक नयी संस्था के निर्माण की औचित्यता पर कुछ विशेषज्ञ सवाल खड़ा कर रहे हैं।
  • राजकोषीय परिषद का यह भी कार्य है कि भारतीय अर्थव्यवस्था की वृद्धि दर के संदर्भ में समय-समय पर अनुमान व्यक्त किये जायें और वर्तमान वृद्धि दर का विश्लेषण किया जाये। लेकिन यह कार्य भारत में कई सरकारी एजेंसियाँ कर रही हैं, यथा- भारतीय रिजर्व बैंक, सीएसओ आदि। इसके अतिरिक्त आईएमएफ, विश्व बैंक आदि भी ऐसे आँकड़ें प्रस्तुत करती हैं।
  • भारत का नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक (कैग) भी सरकार की राजकोषीय नीतियों का विश्लेषण करता है और इस संबंध में रिपोर्ट तैयार करता है। कैग देखता है कि सरकार राजकोषीय नियमों का पालन कर रही है या नहीं।
  • उपर्युक्त के बावजूद कुछ विशेषज्ञों का कहना है कि यह सही है कि राजकोषीय परिषद के कार्यों को भारत में विभिन्न संस्थाओं द्वारा विभिन्न रूपों में सम्पन्न किया जा रहा है लेकिन फिर भी यदि राजकोषीय परिषद की स्थापना की जायेगी तो राजकोषीय प्रबंधन और बेहतर ढंग से हो सकेगा।
  • तेरहवें वित्त आयोग और एफआरबीएम कानून की समीक्षाा समिति (एन-के-सिंह की अध्यक्षता में) सिफारिश दी थी कि वित्त मंत्रलय को एक समिति का गठन करना चाहिए जो राजकोषीय परिषद के रूप में कार्य करे। लेकिन विशेषज्ञों का कहना है कि यदि राजकोषीय परिषद को वित्त मंत्रलय के अंतर्गत स्थापित किया जायेगा तो इसकी स्वतंत्रता बाधित होगी और हितों का टकराव (Office for Budget Responsibility) उत्पन्न होगा, क्योंकि वित्त मंत्रलय बजट एवं अन्य राजकोषीय नीतियों व कार्यक्रमों का निर्माण करता है।

विदेशों में राजकोषीय परिषद

  • अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष (आईएमएफ) के आँकडों के मुताबिक, अभी पूरे विश्व में लगभग 50 ऐसे देश हैं जहाँ राजकोषीय परिषद किसी न किसी रूप में उपस्थित है। इन देशों में ऐसी परिषदों की सफलता की दर भी अलग-अलग है।
  1. बेल्जियम में फेडरल प्लानिंग ब्यूरों (Federal Planing Buereau) है।
  2. चिली में राजकोषीय जाँ हेतु दो स्वतंत्र संस्थान हैं।
  3. यूनाइटेड किंगडम में ऑफिस फॉर बजट (Office for Budget Responsibility) है।

आगे की राह

  • कोविड-19 महामारी ने अभूतपूर्व आर्थिक चुनौतियों को उत्पन्न किया है। इसके लिए राजकोषीय परिषद की स्थापना की जानी चाहिए ताकि राजकोषीय प्रबंधन को बेहतर तरीके से प्रबंधित किया जा सके।
  • विशेषज्ञों का कहना है कि एफआरबीएम कानून में ही संशोधन करके एक स्वतंत्र राजकोषीय परिषद स्थापित की जाये। इस परिषद को संसद द्वारा नियुक्त किया जाये और यह परिषद संसद को ही अपनी रिपोर्ट सौंपे। इसमें भारत सरकार के वित्त मंत्रालय की भूमिका नहीं होनी चाहिए।
  • जब तक सरकार राजकोषीय परिषद को स्थापित नहीं कर पा रही है, उसके पहले कुछ और छोटे-छोटे कदम उठाये जा सकते हैं, यथा- जब सरकार बजट प्रस्तुत करे तो उसके तुरंत बाद कैग की देखरेख में एक कमेटी गठित की जा सकती है (जिसमें आरबीआई, नीति आयोग, वित्त मंत्रलय, सीएसओ आदि का भी योगदान लेना चाहिए। यह कमेटी सरकार के बजटीय तथ्यों का सूक्ष्म रूप से विश्लेषण कर राजकोषीय नीति के संबंध में एक रिपोर्ट तैयार करेगी जो भविष्य के लिए मार्गदर्शक का कार्य कर सकती है।