‘आर्थिक विकास-पर्यावरण की कीमत पर नहीं’ - समसामयिकी लेख

चर्चा में क्यों?

हाल के कुछ वर्षों में हिमालयी प्रदेशों (मुख्यतः हिमाचल और उत्तराखण्ड में) में भूस्खलन, हिमस्खलन और बादल फटने की घटनाओं में वृद्धि देखने को मिली है जिसके लिये जलवायु परिवर्तन के साथ ही मानवीय विकासात्मक गतिविधियों (जैसे- जलविद्युत परियोजना) की मुख्य भूमिका बताई जा रही है।

पृष्ठभूमिः

हिमालय दुनिया की सबसे ऊँची और नवीन वलित पर्वत श्रृंखला है। इसकी भूगर्भीय संरचना नवीन, मुलायम और मोड़दार है क्योंकि हिमालयी उत्थान तक सतत प्रक्रिया है जो उसे दुनिया के उच्च भूकम्प संभावित क्षेत्रों में से एक बनाती है।
भारतीय हिमालय लगभग 5 लाख वर्ग किमी0 (देश के कुल भौगोलिक क्षेत्रफल का 16 प्रतिशत) क्षेत्र में फैला हुआ है जो भारतीय उपमहाद्वीप को जल, ऊर्जा, कार्बन भण्डार और जैव विविधता से समृद्ध क्षेत्र बनाता है।

जलवायु परिवर्तन के कारण हिम (ग्लेशियर) पिघलने की दर में वृद्धि दर्ज की गई है जिसके कारण भविष्य में जल उपलब्धता का खतरा उत्पन्न हो सकता है। हिम के पिघलने का प्रभाव भारतीय मानसून पर भी पड़ सकता है। इस प्रदेश में तापमान तथा शुष्कता में वृद्धि के कारण वनाग्नि की घटनाओं में वृद्धि होगी। बादल फटने की घटनाओं में वृद्धि के कारण हिमालय क्षेत्र में भूस्खलन की तीव्रता व बारम्बारता में वृद्धि हो सकती है जिससे जान-माल की हानि हो सकती है।

हिमालय क्षेत्र में विकास कार्यों की आवश्यकताः

हिमालय क्षेत्र के निवासियों को मूलभूत सुविधायें प्रदान करने के लिये हाइवे और जलविद्युत परियोजनाओं का निर्माण किया जाता है।

आर्थिक सांस्कृतिक गतिविधियों के अंतर्गत पर्यटन को बढ़ावा देने के लिये भी सड़कों का जाल विछाया जाता है।

भारत में विद्युत ऊर्जा की आय में निरंतर वृद्धि हो रही है ऐसे में हिमालयी नदियों (जिनमें 500 गीगावाट जल विद्युत उत्पादन क्षमता है) महत्त्वपूर्ण हो जाती है जिनका जल पीने, सिंचाई में और अन्य आर्थिक गतिवविधियों- मत्स्य पालन, सिंघाड़ा की कृषि में प्रयुक्त होता है।

हिमालय सामरिक रूप से भी महत्त्वपूर्ण है। भारत की चीन और पाकिस्तान के साथ सीमा विवाद हैं जिसको लेकर पूर्व में दोनों देशों के साथ युद्ध भी हो चुका है। ऐसे में भारत सीमा तक निर्बाध पहुंच को सुनिश्चित करते हुये सीमा सड़क संगठन (बॉर्डर रोड आर्गेनाइजेशन) के नेतृत्व में सड़कों का जल बिछा रहा है।

उत्तराखण्ड को जल विद्युत परियोजनाओं का स्थगनः

उत्तराखण्ड प्राकृतिक आपदाओं जैसे बादल के फटने, भूस्खलन, हिमस्खलन बाढ़ के प्रति सुभेद्य है। 2013 की केदारनाथ बाढ़ आपदा के बाद सर्वोच्च न्यायालय ने भागीरथी अलकनंदा नदी घाटी में संचालित सभी जलविद्युत परियोजनाओं को स्थगित कर इन परियोजनाओं की समीक्षा कर इनके पर्यावरणीय प्रभाव का आंकलन करने का निर्देश दिया था।

विशेषज्ञों की एक समिति ने सर्वोच्च न्यायालय से सिफारिश की लगभग सभी जलविद्युत परियोजना जिन्हें सर कार द्वारा मान्यता प्रदान की गई है उन्हें नष्ट कर दें, इनसे पर्यावरण को नुकसान हो रहा है।

संबंधित 6 प्रोजेक्ट से जुड़े लोगों ने सुप्रीम कोर्ट में अपना पक्ष रखते हुये कहां उन्होंने सरकार से पहले ही पूर्वानुमति ले लिया था ऐसे में परियोजना को रदद् करने से उनका बड़ा नुकसान होगा।

नमामि गंगे के साथ इन परियोजना की संबद्धताः

नेशनल मिशन फॉर क्लीन गंगा (नमामि गंगे) योजना की शुरूआत 2014 में की गई। जिसका उद्देश्य गंगा नदी के प्रदूषण को कम करने तथा गंगा नदी को पुनर्जीवित करने के उद्देश्य से की गई थी।

नमामि गंगे योजना और जल विद्युत परियोजनाओं में हितों का संघर्ष है। नमामि गंगे योजना गंगा के धारा को निर्बाध रूप से प्रवाहित होने की मांग करती है जबकि जलधारा को अवरूद्ध करके ही जलविद्युत का उत्पादन किया जा सकता है।

जल विद्युत परियोजनाओं पर केंद्र सरकार की स्थितिः

सरकार के विभिन्न मंत्रलयों के मध्य जल विद्युत परियोजनाओं को लेकर परस्पर विरोधी स्वर सुनाई देते हैं। जल संसाधन मंत्रालय (नमामि गंगे योजना के क्रियान्वयन संबंधी दायित्व) जल विद्युत परियोजनाओं का विरोध कर रही है जबकि ऊर्जा शक्ति मंत्रलय जल विद्युत ऊर्जा को प्रोत्साहन देकर ऊर्जा क्षेत्र में आत्मनिर्भरता की ओर आगे बढ़ने की योजना पर कार्य कर रहा है।

सरकार ने संसद में कहा कि नयी जल विद्युत परियोजनाओं को मंजूरी नहीं दी जायेगी लेकिन जिन परियोजनाओं का कार्य 50 प्रतिशत या उससे अधिक पूरा हो गयिा है, उनको नष्ट नहीं किया जायेगा, उनको पूरा करने की अनुमति दी जायेगी।

परन्तु सर्वोच्च न्यायालय में दिये गये हलफनामें में सरकार ने उक्त कार्यक्रम की चर्चा नहीं की जिससे सरकार की प्रतिबद्धता को लेकर असमंजस की स्थिती बनी हुई है।

हिमालय क्षेत्र के सतत विकास के लिये सरकारी प्रयासः

  1. 2008 में जलवायु परिवर्तन पर राष्ट्रीय कार्ययोजना के आठ सूत्रीय कार्यक्रम में एक मिशन हिमालय के पारिस्थितिक तंत्र के संरक्षण से संबंधित है। यह मिशन हिमालयी पारिस्थितिकी तंत्र सेवाओं की स्थिति का लगातार पता लगाने के लिये एक स्थायी राष्ट्रीय क्षमता विकसित करने और उचित नीति उपायों तथा समयबद्ध कार्यवाही कार्यक्रमों के लिये नीति निर्माण निकायों की सक्षम बनाने के उद्देश्य से कार्य करता है।
  2. नीति आयोग ने हिमालयी राज्य क्षेत्रीय परिषद का 2018 में गठन किया जो हिमालय क्षेत्र में सधारणीय विकास हेतु नोडल एजेंसी के रूप में कार्य करेगा।
  3. भारत के हिमालयी राज्यों में निर्वनीकरण और वन ह्नास को संबोधित करने के लिये रेड प्लस हिमालय कार्यक्रम का शुभारम्भ 2016 में मिजोरम में किया गया।

आगे की राहः

  1. फरवरी 2021 में उत्तराखण्ड के चमौली में हिमस्खलन से 200 लोगों की मौत हुई और 2 जल विद्युत परियोजनाओं क्षतिग्रस्त हुई। यह घटनायें पर्यावरणविद की आशंकाओं को सत्यापित करती है। ऐसे में आवश्यकता है कि परियोजनाओं का ईआईए (पर्यावरण प्रभाव आंकलन) सुचारू रूप से किया जाये। उत्तराखण्ड सरकार ने बहुप्रतीक्षित चारधाम यात्रा को जोड़ने वाले राजमार्गों को ईआईए से बचाने के लिये 400 किमी0 लम्बे राजमार्गों को 100-100 किमी0 में विभाजित कर दिया। जिसने पर्यावरण प्रभाव आंकलन की मूल भावना को नष्ट कर दिया विभिन्न सरकारें विकासात्मक गतिविधियों और पर्यावरण संरक्षण के मध्य उचित संतुलन स्थापित करने में असफल रही है। कॉपोरेट्स का दबाव, क्रोनी कैप्टलिज्म (पूंजीवाद) भी परियोजनाओं को पर्यावरण गाइडलाइन की अवहेलना करने का अवसर देती है। पर्यावरण प्रभाव आंकलन को प्रभावी बनाये। परियोजना के पर्यावरणीय प्रभाव का आंकलन करने वाली समिति के सदस्यों की निष्पक्षता पारदर्शिता में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाती है।
  2. ‘प्रकृति रक्षति रक्षतः’ के सिद्धांत को अपनाकर स्थानीय लोगों के हितों को सर्वोच्च प्राथमिकता देते हुये पर्यावरण संरक्षण और आर्थिक विकास में सामंजस्य स्थापित किया जाये।
  3. सरकार अपनी परियोजनाओं में पर्यावरण संरक्षण को शामिल कर निजी क्षेत्र को नैतिक रूप से प्रोत्साहित करें कि वो भी सधारणीय विकास को अपनाये।
  4. कॉर्पोरेट सशेल रिस्पांसबिल्टी (कॉर्पोरेट सामाजिक उत्तरदायित्व) में क्रियान्वयन संबंधी सुधार किया जाये। स्थानीय लोगों के लिये, पर्यावरण संवर्द्धन के लिये कॉर्पोरेट को जमीनी स्तर पर कार्य करना चाहिये।
  5. हिमालय क्षेत्र में इकोटूरिज्म को बढ़ावा देना चाहिये।
सामान्य अध्ययन प्रश्नपत्र 3
  • पर्यावरण एवं पारिस्थितिकी