ड्रग अब्युसिंग और ट्रैफिकिंग - समसामयिकी लेख

चर्चा में क्यों?

गोवा में होने वाली पार्टियों में नशीले पदार्थों के सेवन की घटना जांच एजेंसियों की संज्ञान में आई है I

पृष्ठभूमि

ड्रग्स और अपराध पर संयुक्त राष्ट्र कार्यालय’ (यूएनओडीसी) द्वारा प्रकाशित रिपोर्ट ‘द वर्ल्ड ड्रग रिपोर्ट-2021’के अनुसार वर्ष 2010-2019 के मध्य नशीली दवाओं का उपयोग करने वाले लोगों की संख्या में 22 प्रतिशत की वृद्धि हुई है। दुनिया भर में लगभग 275 मिलियन लोगों द्वारा नशीली दवाओं के इस्तेमाल की बात सामने आई हैI वैश्विक स्तर पर 36 मिलियन से अधिक लोग नशीली दवाओं के उपयोग संबंधी विकारों से पीड़ित पाए गये I वैश्विक स्तर पर ड्रग समस्या खतरनाक स्तर पर बढ़ रही है, विशेष रूप से 30 वर्ष से कम आयु के वयस्कों में I

2019 में एम्स द्वारा प्रकशित रिपोर्ट के मुताबिक़ भारत में ड्रग के रूप में एल्कोहल का प्रयोग अधिक होता है I वर्ष 2018 में आयोजित सर्वेक्षण के अनुसार तकरीबन 5 करोड़ भारतीयों द्वारा भांग और अफीम का उपयोग किया गया । एक अनुमान के मुताबिक लगभग 8.5 लाख लोग ड्रग्स इंजेक्शन का प्रयोग करते हैं।

पंजाब, असम, दिल्ली, हरियाणा, मणिपुर, मिज़ोरम, सिक्किम और उत्तर प्रदेश जैसे राज्य नशे के मामलों में 50% से अधिक की भागीदारी रखते है I बच्चों में सर्वाधिक शराब के सेवन का प्रतिशत पंजाब में पाया गया तथा इसके बाद क्रमशः पश्चिम बंगाल और उत्तर प्रदेश का स्थान है।

नशीली दवाओ के दुरूपयोग का कारण

तीव्र आर्थिक सामजिक परिवर्तनों जैसे नगरीकरण, आधुनिकीकरण ने सामाजिक असुरक्षा में वृद्धि की हैI युवाओं में बेरोजगारी, अकेलापन, सांस्कृतिक मूल्यों में परिवर्तन के कारण ( फिल्मों द्वारा नशे की संस्कृति को बढ़ावा देना, सामाजिक स्वीकृति दिलाने में सहायक) नशे के सेवन का रुझान बढ़ रहा है I अप्रभावी पुलिसिंग, तकनीकी का बढ़ता दायरा, अप्रभावी नियंत्रण, ड्रग्स की सरलता से उपलब्धता भी युवाओं में नशे को बढ़ावा दे रही हैI

नार्कोटिक ड्रग्स एंड साइकोट्रॉपिक सब्सटेंस एक्ट 1985

यह अधिनियम किसी भी व्यक्ति द्वारा मादक पदार्थ या साइकोट्रॉपिक पदार्थ के उत्पादन, बिक्री, क्रय, परिवहन, भंडारण, और/या उपभोग को प्रतिबंधित करता है। यह अधिनियम पूरे भारत में लागू होता है और साथ ही यह भारत के बाहर निवास करने वाले सभी भारतीय नागरिकों एवं भारत में पंजीकृत जहाज़ों तथा विमानों पर मौजूद सभी व्यक्तियों पर भी भी लागू होता है।

1988, वर्ष 2001 और वर्ष 2014 में तीन बार इस कानून में संशोधन किया जा चुका है।

इस अधिनियम की धारा 20 में ड्रग्स का उत्पादन करने, बनाने, रखने, बेचने, खरीदने, दूसरी जगह भेजने, एक राज्य से दूसरे राज्य में आयात या निर्यात करने और इस्तेमाल करने पर सजा का प्रावधान हैI

धारा 20 (a) के अंतर्गत किसी व्यक्ति के पास प्रतिबंधित ड्रग्स की कम मात्रा पाई जाती है तो उसे 6 महीने तक की जेल या 10 हजार रुपये का जुर्माना या दोनों सजा हो सकती है.

धारा 20 (b) के अंतर्गत अगर किसी व्यक्ति के पास कम मात्रा से अधिक प्रतिबंधित नशीला पदार्थ पाया जाता है तो, ऐसे व्यक्ति को 10 साल तक की जेल हो सकती है और 1 लाख रुपये तक का जुर्माना लगाया जा सकता हैI

धारा 64 के अंतर्गत उन व्यक्तियों को कानूनी रूप से छूट दी गयी है जो नशीले पदार्थों पर निर्भर हैं I साथ ही धारा 71 के तहत ऐसे व्यक्तियों को उपचार की सुविधा प्रदान करने की अनुशंसा भी कानून में की गयी है I

इस अधिनियम के तहत पुलिस भी कार्रवाई कर सकती हैI इसके अलावा केंद्र और राज्यों में अलग से नारकोटिक्स विभाग भी होते हैं I

ड्रग्स नियंत्रण हेतु नियामक संस्थाएं

नारकोटिक कंट्रोल ब्यूरो - का सृजन मार्च 1986 में नारकोटिक ओषधियाँ एवं स्वापक पदार्थ अधिनियम, 1985 के अंतर्गत किया गया है I

कार्य –

  1. औषधि कानून के प्रवर्तन में सक्रिय विभिन्न केन्द्रीय एवं राज्य एजेंसियों के बीच समन्वय करना I
  2. राज्यों को उनके औषधि कानून प्रवर्तन के प्रयासों में सहायता करना I सूचना एकत्र करना और इसका आदान-प्रदान करना;
  3. राष्ट्रीय औषधि प्रवर्तन सांख्यिकी तैयार करना I
  4. यू एन डी सी पी, आई एन सी बी, इन्टरपोल, सीमा शुल्क समन्वय परिषद, आर आई एल ओ इत्यादि जैसी अन्तरराष्ट्रीय एजेंसियों से सम्पर्क स्थापित करना;

नशीले पदार्थों के उपयोग में वृद्धि के कारण

ऑनलाइन बिक्री के साथ दवाओं तक पहुँच भी पहले से कहीं ज़्यादा आसान हो गई है और डार्क वेब पर प्रमुख दवा बाज़ारों की कीमत अब लगभग 315 मिलियन डॉलर सालाना हो गई है।

एशियाई देश, मुख्य रूप से चीन और भारत वर्ष 2011-2020 के दौरान विश्लेषण किये गए 19 प्रमुख डार्कनेट बाज़ारों में बेची जाने वाली दवाओं के शिपमेंट से जुड़े हुए हैं।

यह आंशिक रूप से प्रौद्योगिकी और क्रिप्टोकरेंसी भुगतान के उपयोग में वृद्धि से भी प्रेरित है, जो नियमित वित्तीय प्रणाली के भीतर नहीं आती है।

विक्रेता अपने उत्पादों का विज्ञापन और विपणन ‘अनुसंधान रसायन’ या ‘कस्टम सिंथेसिस’ के रूप में करके कानून प्रवर्तन एजेंसियों से बचने का प्रयास करते हैI

भारत में अवैध ड्रग्स व्यापार मार्ग

भारत विश्व के दो सबसे बड़े अफ़ीम उत्पादक क्षेत्रों पश्चिम में स्वर्णिम अर्द्धचंद्र (अफगानिस्तान-पाकिस्तान और ईरान) और पूर्व में स्वर्णिम त्रिभुज (म्यांमार, लाओस और थाईलैंड) के बीच अवस्थित हैI

अवैध व्यापार एवं आतंकवाद के मध्य संबंध

आतंकवादी अपने संगठनों के लिये वित्तीय सहायता प्राप्त करने के लिये संगठित अपराधों का सहारा लेते हैं। मादक पदार्थों की तस्करी, जबरन वसूली, हथियारों की तस्करी, जाली नोटों का वितरण, मनी लॉन्ड्रिंग, हवाला कारोबार आदि संगठित अपराधों के माध्यम से आतंकवादी धन एकत्र करते हैं।

संगठित अपराधी और आतंकवादी दोनों प्रायः ऐसे क्षेत्रों में कार्य करते हैं, जहाँ कम सरकारी नियंत्रण हो, कमज़ोर प्रशासनिक ढाँचा और खुली अंतर्राष्ट्रीय सीमा मौजूद हो। आतंकवादी अपने सदस्यों को संगठित अपराध नेटवर्क का इस्तेमाल कर अंतर्राष्ट्रीय सीमा पार करवाकर विभिन्न देशों में भेजते हैं, बदले में आतंकवादी अपने नियंत्रित क्षेत्रों में इन्हें सुरक्षा प्रदान करते हैं।

संगठित अपराध संगठन और आतंकवादी संगठन कमज़ोर प्रशासन और कानून- व्यवस्था का लाभ उठाकर फलते-फूलते हैं। दोनों के बीच सहजीवी संबंध हैं और वे परस्पर अन्योन्याश्रित हैं। यद्यपि यह आपसी संबंध सामान्यतः विकासशील और कम विकसित देशों में अधिक देखने को मिलता है, विकसित में नहीं। अफगानिस्तान में तालिबान का वित्तपोषण अफीम और हिरोइन की तस्करी द्वारा किया जाता रहा, जिससे तालिबानियों ने आधुनिक हथियारों तक अपनी पहुंच बनाई I

अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर ड्रग्स को नियंत्रित करने के प्रयास

ड्रग्स और अपराध पर संयुक्त राष्ट्र कार्यालय (यूएनओडीसी)- इसकी स्थापना वर्ष 1997 में हुई थी और वर्ष 2002 में इसे ड्रग्स और अपराध पर संयुक्त राष्ट्र कार्यालय (UNODC) के रूप में नामित किया गया था।
इसकी स्थापना यूनाइटेड नेशंस इंटरनेशनल ड्रग्स कंट्रोल प्रोग्राम (यूएनडीसीपी) तथा संयुक्त राष्ट्र में अपराध निवारण और आपराधिक न्याय विभाग (सीपीसीजेडी) के संयोजन में की गई थी और यह ड्रग कंट्रोल एवं अपराध रोकथाम की दिशा में कार्य करता है।

इससे संबंधित अन्य प्रयास- प्रतिवर्ष 26 जून को ‘नशीली दवाओं के दुरुपयोग और अवैध तस्करी के खिलाफ अंतर्राष्ट्रीय दिवस’ का आयोजन किया जाता है।

1. सिंगल कन्वेंशन ऑन नारकोटिक्स ड्रग्स, 1961

  1. कन्वेंशन ऑन साइकोट्रोपिक सब्सटेंस-1971
  2. कन्वेंशन ऑन इलीसिट ट्रैफिक ऑन नारकोटिक ड्रग्स एँड साइकोट्रोपिक सब्सटेंस, 1988

भारत उपर्युक्त तीनों का हस्ताक्षरकर्त्ता है और इसने ‘नारकोटिक्स ड्रग्स एँड साइकोट्रोपिक सब्सटेंस’ (एनडीपीसी) अधिनियम, 1985 भी लागू किया है।

सुझाव-

  1. नशे की लत को व्यवसन (चारित्रिक दोष) के रूप में नहीं एक बीमारी के रूप में देखा जाना चाहिए I नशीली वस्तुओं के सेवन को सामाजिक कलंक मानने के बजाय, उसकी पीड़ा को समझकर उससे बाहर निकलने में उसकी सहायता करनी चाहिए I ट्रेसिंग, ट्रेकिंग और निरंतर कॉउसलिंग की और रिहैबिलिटेशन सेंटर की व्यवस्था करनी चाहिए I
  2. संगठित अपराध के विरुद्ध सामाजिक जागरूकता फैलानी चाहिएI नशे का व्यापर अवैध हथियारों/ मानव तस्करी, आतंकवाद को पोषित करता है I विभिन्न राज्यों की विभिन्न एजेंसियों के मध्य उचित समन्वय की आवश्यकता हैI साथ ही नागरिक समाज, एनजीओ,धर्मगुरुओं की भूमिका समाज को शिक्षित करने में महत्वपूर्ण हो जाती हैI
  3. भारत में मनोरोगों को गम्भीरता से लिया जाना चाहिए I शिक्षा पाठ्यक्रम में मादक पदार्थों की लत, इसके प्रभाव और नशामुक्ति पर भी अध्याय शामिल होने चाहिये। उचित परामर्श एक अन्य विकल्प हो सकता है।
  4. सीमा पार से भारत में अवैध व्यापार के कारोबार को प्रोत्साहन दिया जा रहा है I सीमा पर कड़ी निगरानी, अवैध व्यापार को प्रबंधित करने वाले वित्त पोषण तंत्र पर नकेल कसने की आवश्यकता है I
सामान्य अध्ययन प्रश्नपत्र 1
  • सामाजिक मुद्दे