परमाणु निरस्त्रीकरण की वर्तमान स्थिति - समसामयिकी लेख

   

कीवर्ड : एसआईपीआरआई, सिपरी, वैश्विक परमाणु शस्त्रागार, परमाणु हथियार, सैन्य खर्च, वैश्विक हथियार आयात, परमाणु हथियारों के निषेध पर संधि, वैश्विक सुरक्षा वातावरण।

संदर्भ:

  • स्टॉकहोम इंटरनेशनल पीस रिसर्च इंस्टीट्यूट (एसआईपीआरआई-सिपरी ) ने कुछ दिन पहले अपनी वार्षिक पुस्तक (ईयर बुक) जारी की, जिसमें अंतरराष्ट्रीय सुरक्षा में पिछले वर्ष की कुछ चिंताजनक प्रवृत्तियों पर प्रकाश डाला गया है। वैश्विक परमाणु शस्त्रागार की अपेक्षित वृद्धि विशेषज्ञों के बीच चिंता का मुख्य कारण थी । रिपोर्ट में दावा किया गया है कि जहां परमाणु शस्त्रागार की पूर्ण संख्या कम हो गई है, वहीं अगले दशक में इसके बढ़ने की उम्मीद है।

स्टॉकहोम अंतर्राष्ट्रीय शांति अनुसंधान संस्थान (सिपरी)

  • सिपरी एक स्वतंत्र अंतरराष्ट्रीय संस्थान है जो, आयुध, हथियार नियंत्रण और निरस्त्रीकरण में अनुसंधान के लिए समर्पित संस्था है।
  • इसकी स्थापना 1966 में स्टॉकहोम (स्वीडन) में हुई थी।
  • सिपरी नीति निर्माताओं, शोधकर्ताओं, मीडिया और इच्छुक जनता को खुले स्रोतों के आधार पर डेटा, विश्लेषण और सिफारिशें प्रदान करता है ।

सैन्य व्यय का आंकलन :

  • 2012-2021 के दौरान, सकल घरेलू उत्पाद के प्रतिशत के रूप में सैन्य खर्च काफी हद तक स्थिर रहा है। ।
  • परमाणु सूची में अमेरिका, रूस के 5428 के मुकाबले 5977 परमाणु आयुध की संख्या के साथ विश्व में अग्रणी हैI अमेरिका के पास सबसे अधिक संख्या में (रूस के 1588 के मुकाबले 1744) तैनात हथियार हैं ।
  • ब्रिटेन के पास 225 परमाणु हथियार हैं, जबकि फ्रांस के पास 290, चीन के पास 350, भारत के पास 160, पाकिस्तान के पास 165 हैं। इस्राइल के पास 90 और उत्तर कोरिया के पास 20 परमाणु हथियार होने का अनुमान है ।
  • 2021 में पांच सबसे अधिक व्यय करने वाले राष्ट्र :
  • अमेरिका,
  • चीन,
  • भारत,
  • ब्रिटेन और
  • रूस
  • विश्व सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) के हिस्से के रूप में वैश्विक सैन्य व्यय 0.1 प्रतिशत की गिरावट के साथ, 2020 में 2.3% से गिरकर 2021 में 2.2% हो गया।
  • व्यय करने वाले पांच सबसे बड़े देशों ने कुल वैश्विक व्यय का 62% जबकि अकेले अमेरिका और चीन ने 52% तक व्यय किया है।
  • भारत, 76.6 अरब डॉलर के सैन्य व्यय के साथ विश्व में तीसरे स्थान पर है।

वैश्विक शस्त्र आयात के बारे में?

  • सैन्य आधुनिकीकरण को एक वैश्विक प्रवृत्ति के रूप में देखा जाता है। सभी परमाणु हथियार रखने वाले राज्यों ने, वर्षों से, अपने सशस्त्र बल के कई पहलुओं को आधुनिक ( नई और अधिक कुशल परमाणु पनडुब्बियों, विमान वाहक, लड़ाकू जेट, मानवयुक्त और मानव रहित हवाई वाहनों के विकास से लेकर मिसाइल रक्षा प्रणालियों के उपयोग के बढ़ते प्रसार के लिए) बनाने के इरादे से काम किया है जिसके परिणामस्वरूप अन्य देशों के लिए सुरक्षा संबंधी चिंताएँ बढ़ सकती हैं।
  • सिपरी ईयरबुक के अनुसार 2017-2021 की अवधि के दौरान,भारत विश्व में शीर्ष हथियार आयातक रहा है। शीर्ष पांच हथियार आयातकों की सूची में शामिल होने वाले अन्य देशों में सऊदी अरब, मिस्र, चीन और ऑस्ट्रेलिया शामिल हैं। सिपरी के अनुसार, इन पांच देशों के पास कुल वैश्विक हथियारों के आयात का 38% हिस्सा है।
  • 2016-20 में प्रमुख हथियारों की आपूर्ति की सबसे बड़ी मात्रा प्राप्त करने वाला क्षेत्र एशिया और ओशिनिया था, जो हथियारों के कुल वैश्विक आयत में 42% की भागीदारी रखता है, इसके बाद मध्य पूर्व का क्षेत्र है, जिसकी भागीदारी 33% है।

ईयरबुक की प्रमुख चिंताएं -

  • अस्थिर व्यवस्था के कुछ चिंताजनक संकेतक
  • भारत और पाकिस्तान के बीच, सीमा पर चलने वाला संघर्ष
  • अफगानिस्तान में गृह युद्ध
  • म्यांमार में सशस्त्र संघर्ष
  • चिंता के तीन अन्य कारण :
  • चीनी-अमेरिकी प्रतिद्वंद्विता
  • कई संघर्षों में राज्य और गैर-राज्य अभिनेताओं की भागीदारी
  • जलवायु और मौसम संबंधी खतरों की चुनौती।
  • यहां यह ध्यान देना महत्वपूर्ण है कि जलवायु परिवर्तन से उत्पन्न प्रतिक्रिया, रिपोर्ट में केवल नाममात्र के रूप में दिखाई देती है ।
  • हथियारों में आई कमी का अधिकांश भाग, अमेरिका और रूस से सेवानिवृत्त आयुधों को नष्ट करने के कारण हुआ है। लेकिन यूक्रेन पर रूसी आक्रमण ने कुछ गंभीर चिंताए प्रस्तुत की हैं क्योंकि क्रेमलिन की ओर से परमाणु हथियारों के इस्तेमाल से दूर नहीं होने जैसी उकसाने वाली बयानबाजी निरंतर की जा रही है।
  • 300 नए परमाणु मिसाइल के निर्माण के साथ, चीन की हालिया गतिविधियां भी क्षेत्रीय स्थिरता के समक्ष चिंता उत्पन्न कर रही हैं। शांगरी-ला डायलॉग में बोलते हुए, चीनी रक्षा मंत्री, वेई फेंघे ने दावा किया कि उन्होंने अपने परमाणु शस्त्रागार की तुलना में "प्रभावशाली प्रगति" की है, उक्त शस्त्रागार का प्राथमिक उद्देश्य आत्मरक्षा है ।
  • उपमहाद्वीप में, भारत और पाकिस्तान अपने परमाणु शस्त्रागार (पूर्ण संख्या में) पर को बढ़ा रहे हैं , जबकि वितरण प्रणालियों के नए और अधिक कुशल रूपों के विकास और खरीद की दिशा में भी सक्रीय हैं।

परमाणु निरस्त्रीकरण में कई मील के पत्थर:

  • न्यू स्टार्ट : यूएस-रूसी हथियार नियंत्रण समझौता न्यू स्टार्ट को पांच साल के लिए बढ़ा दिया गया था।
  • संयुक्त व्यापक कार्य योजना (जेसीपीओए ): संयुक्त राज्य अमेरिका के पुन: समझौते में शामिल होने पर बातचीत की शुरुआत हो गई है, और ईरान ईरान परमाणु समझौते, अर्थात संयुक्त व्यापक कार्य योजना (जेसीपीओए) के अनुपालन में लौट रहा है।
  • परमाणु हथियारों के अप्रसार पर संधि: संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद के स्थाई सदस्यों ( पी-5 ) ने परमाणु हथियारों के अप्रसार संधि -1968 के अनुपालन हेतु अपनी प्रतिबद्धता की पुष्टि की हैI

परमाणु हथियारों के निषेध पर संधि (टीपीएनडब्ल्यू)

परमाणु हथियारों के निषेध पर संधि (टीपीएनडब्ल्यू), या परमाणु हथियार प्रतिबंध संधि, परमाणु हथियारों को व्यापक रूप से प्रतिबंधित करने वाला पहला कानूनी रूप से बाध्यकारी अंतरराष्ट्रीय समझौता है, जिसका अंतिम लक्ष्य उनका पूर्ण निशस्त्रीकरण है। इसे 7 जुलाई 2017 को अपनाया गया था, 20 सितंबर 2017 को हस्ताक्षर के लिए खोला गया और 22 जनवरी 2021 को इसे लागू किया गया ।

उन राष्ट्रों के लिए जो इसके पक्षकार हैं, संधि परमाणु हथियारों के विकास, परीक्षण, उत्पादन, भंडारण, तैनाती, स्थानांतरण, उपयोग और खतरे के साथ-साथ निषिद्ध गतिविधियों के लिए सहायता और प्रोत्साहन को प्रतिबंधित करती है। संधि में शामिल होने वाले परमाणु सशस्त्र राज्यों के लिए, यह अपने परमाणु हथियार कार्यक्रम के सत्यापित और अपरिवर्तनीय निशस्त्रीकरण के लिए बातचीत के लिए एक समयबद्ध रूपरेखा प्रदान करता है ।

हालांकि, भारत ने टीपीएनडब्ल्यू के लिए वार्ता में भाग नहीं लिया । भारत ने यह भी स्पष्ट किया कि वह संधि का पक्षकार नहीं बनेगा । इस गैर-भागीदारी के पीछे का कारण यह है कि भारत यह नहीं मानता है कि टीपीएनडब्ल्यू प्रथागत अंतरराष्ट्रीय कानून में कोई मूल्य जोड़ता है , और न ही यह कोई नया दिशानिर्देश या सिद्धांत निर्धारित करता है।

आगे की राह :

  • हाल ही में दुनिया भर में व्यावहारिक रूप से सभी क्षेत्रों में होने वाली भू-राजनीतिक घटनाओं ने वैश्विक सुरक्षा माहौल को और अधिक अस्थिर बना दिया है । अनिश्चितता की भावना को, न केवल गैर-लोकतांत्रिक प्रणालियों के सत्तावादी नेताओं के कार्यों से, बल्कि लोकतांत्रिक व्यवस्था के मजबूत नेताओं के कार्यों से भी सहायता मिलती है। इन राष्ट्रों की ताकतवर सैन्य नीतियों के साथ ही निरंतर बयानबाजी के द्वारा राज्य की सैन्य संपत्ति के उपयोग पर सार्वजनिक भावना को बढ़ावा देने से स्थिति और खराब हो जाती है। सत्तारूढ़ व्यवस्था को नियंत्रण में रखने में सहयोग के लिए एक मजबूत राजनीतिक विपक्ष की आवश्यकता होगी ।
  • इसके अलावा, दो सबसे बड़े परमाणु हथियारों के संग्राहक राज्यों को अंतरराष्ट्रीय क्षेत्र में अधिक आकर्षक भूमिका निभाने की जरूरत है। सिपरी की वार्षिक पुस्तक,गम्भीरतापूर्वक विचार करने के लिए विवश करती है कि वैश्विक निरस्त्रीकरण परियोजना कैसे चल रही है।

स्रोत: The Hindu

सामान्य अध्ययन प्रश्नपत्र 2:
  • भारत के हितों पर विकसित और विकासशील देशों की नीतियों और राजनीति का प्रभाव।

मुख्य परीक्षा प्रश्न:

  • दुनिया भर में व्यावहारिक रूप से सभी क्षेत्रों में घटित हाल की भू-राजनीतिक घटनाओं ने वैश्विक सुरक्षा माहौल को और अधिक अस्थिर बना दिया है, इस परिदृश्य में दुनिया को परमाणु युद्ध से सुरक्षित बनाने के लिए परमाणु निरस्त्रीकरण के महत्व की चर्चा कीजिये।