कोविड-19: टीका निर्माण बनाम सार्वभौमिक टीकाकरण - यूपीएससी, आईएएस, सिविल सेवा और राज्य पीसीएस परीक्षाओं के लिए समसामयिकी लेख

संदर्भ

  • विश्व स्वास्थ्य संगठन के अनुसार, पूरी दुनिया भर में COVID-19 के लिए 40 से अधिक संभावित टीको का विकास किया जा रहा है। इनमें चाइना (सिनोवैक) में एक निष्क्रिय टीके का विकास किया जा रहा है जिसमें फॉर्मल्डिहाइड (एक रसायन) के साथ निष्क्रिय COVID-19 वायरस का इस्तेमाल किया गया है। इसके अलावा डीएनए, आरएनए, वायरल वेक्टर आदि से कई अन्य संभावित टीको का विकास किया जा रहा है। महामारी के दौरान, उसी वर्ष या अगले वर्ष टीके की उम्मीद की जा रही है एवं इसको लेकर प्रौद्योगिकी शक्ति, मानवीय आशा और मीडिया प्रचार में एक अभूतपूर्व उन्माद दिख रहा है।

हालांकि वैक्सीन बनाने की दिशा में काफी तेजी से सभी देशों के द्वारा प्रयास किए जा रहे हैं लेकिन इसको लेकर काफी सारे चिंताएं भी उतनी तेजी से बढ़ती जा रही हैं जो कि निम्न है

  • सबसे पहली चिंता वैक्सीन बनाने की होड़ में क्लीनिकल ट्रायल को जल्द से जल्द पूरा करने में कहीं ना कहीं सुरक्षा मानकों की अनदेखी होगी।
  • वैक्सीन राष्ट्रवाद के कारण अधिकांश देशों के द्वारा सबसे पहले वैक्सीन को अपने देश के यहां उपलब्ध करवाने हेतु अग्रिम समझौते कर रहे हैं। इससे कहीं ना कहीं कोविड-19 का सार्वभौमिक टीकाकरण की राह में अवरोधक बनकर गरीब देश के लोगों को टीका की उपलब्धि में चुनौती प्रस्तुत करेंगे।
  • कोविड-19 का टीका बन जाता है एवं सार्वभौमिक टीकाकरण की दिशा में सारे देश एक निर्णायक समझौते पर पहुंच भी जाएंगे तो इतनी मात्रा में टीकों का निर्माण कैसे होगा? दूसरे शब्दों में सार्वभौमिक टीकाकरण को उपलब्ध करवाने हेतु निर्माण संबंधी क्षमता संवर्धन भी एक प्रमुख चुनौती होगी।
  • कोविड-19 टीका के तैयार होने पर इसके वितरण से एक गंभीर चुनौती यह भी होगी कि सबसे पहले टीकाकरण किसका किया जाए?

टीका के विकास में लगने वाला वास्तविक समय

  • टीका विकास एक लंबी और जटिल प्रक्रिया है, जिसमें कभी-कभी 10-15 वर्ष लग जाते हैं। टीका विकास और परीक्षण में प्राय: चरणों के एक मानकीकृत समुच्चय का अनुपालन किया जाता है।
  • प्रूफ-ऑफ-कॉन्सेप्ट दिखाने के लिए सबसे पहले प्रयोगशालाओं में टीके विकसित करने में कई वर्षों का समय लगता है।
  • फिर जानवरों और मनुष्यों में परीक्षण के लिए स्थिर और अत्यधिक शुद्ध उत्पाद बनाने के लिए एक विनिर्माण प्रक्रिया से गुजरना पड़ता है और अंत में टीका बाजार में उतारा जाता है।
  • हालांकि COVID-19 के टीके का जानवरों में परीक्षण के बिना ही मनुष्यों में तेजी से परीक्षण किया गया है। इसके बावजूद COVID-19 के टीके के क्लिनिकल ट्रायल में 1 से 2 वर्ष लग जायेंगें।

कोविड-19 और वैक्सीन राष्ट्रवाद

  • विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यूएचओ) के मुख्य वैज्ञानिक ने COVID-19 के टीके के विकास और वितरण के लिए राष्ट्रवादी दृष्टिकोण के बजाय एक बहुपक्षीय या वैश्विक दृष्टिकोण को अपनाने की आवश्यकता पर ज़ोर दिया है।
  • वस्तुतः जब कोई देश सिर्फ अपने नागरिकों या अपने यहां रहने वाले लोगों के लिए वैक्सीन डोज सुरक्षित करने की कोशिश करता है तो इसे 'वैक्सीन राष्ट्रवाद' नाम दिया जाता है।
  • ऐसी स्थिति तब होती है जब कोई देश वैक्सीन को अन्य देशों में उपलब्ध होने से पहले ही उन्हें अपने घरेलू बाजार और अपने नागरिकों के लिए एक तरह से रिजर्व करने की कोशिश करता है।
  • इसके लिए संबंधित देश की सरकार वैक्सीन उत्पादक के साथ उत्पादन से पहले ही खरीद का समझौता (Pre-purchase Agreement) कर लेती है।
  • कई देशों में सरकारी और निजी स्तर पर कोरोना वैक्सीन बनाने की कोशिशें चल रही हैं। कुछ का शुरुआती स्तर पर ह्यूमन ट्रायल चल रहा है तो किसी का फाइनल स्टेज में है। लेकिन अभी से अमेरिका, ब्रिटेन, जापान फ्रांस, जर्मनी जैसे अमीर देश वैक्सीन उत्पादकों के साथ प्री-परचेज़ एग्रीमेंट कर चुके हैं।
  • ऐसी आशंकाएं जताई जा रही हैं कि इस तरह के प्री-परचेज़ एग्रीमेंट से कोरोना की वैक्सीन सबकी पहुँच से बाहर हो सकती है। इस तरह के उत्पादन पूर्व समझौते कोरोना वैक्सीन को गरीब देशों की पहुँच से दूर कर देंगे। साथ ही इनकी कीमत भी इतनी ज्यादा हो जाएगी कि सभी इन्हें खरीद भी नहीं पाएंगे।

आगे की राह

  • वन किसी भी देश के लिए प्राकृतिक सम्पदा होतें हैं, अतः इनके संरक्षण हेतु न सिर्फ सरकार को बल्कि आम लोगों को भी ध्यान देना चाहिए। वर्तमान में जलवायु परिवर्तन और ग्लोबल वार्मिंग जैसे मुद्दों की वजह से वनों का संरक्षण और भी प्रासंगिक हो गया है। पुरे विश्व के संतुलित और सतत विकास के साथ पृथ्वी के अस्तित्व के लिए वनों के संरक्षण हेतु सभी देशो को संयुक्त रूप से प्रयास करना होगा। इस दिशा में वन संरक्षण के लिये कानूनी व संस्थागत ढाँचा, स्थायी वन प्रबंधन, भूमि का स्वामित्त्व, भूमि तक पहुँच का अधिकार इत्यादि को सुनिश्चित करते हुए सरकार को वनों के संरक्षण में स्थानीय और आदिवासी लोगों को शामिल करने पर प्रमुख रूप से ध्यान देना चाहिए।

कोविड-19 के सन्दर्भ में सार्वभौमिक टीकाकरण की चुनौतियाँ

  • कोरोना वायरस की वैक्सीन के विकास को लेकर सकारात्मक परिणाम मिलने के बाद विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) ने इसका स्वागत किया है।
  • विश्व स्वास्थ्य संगठन का मानना है कि कोई भी सफल वैक्सीन सबको मिलनी चाहिए। लेकिन कई देश वैक्सीन बनाने की दिशा में इसे "एक वैश्विक सार्वजनिक सेवा' के रूप में देख रहे हैं वहीं कुछ देश 'उल्टी दिशा में जा रहे हैं।"
  • अगर वैक्सीन वितरण को लेकर आम सहमति नहीं होगी तो यह उन्हें ही उपलब्ध हो पाएगी जिनके पास पैसा होगा और इसको लेने की जिनमें क्षमता नहीं होगी उनको वैक्सीन नहीं मिल पाएगी।
  • कोई भी वैक्सीन कोरोना के इलाज में सफल साबित होती है तो विश्व भर में इसकी कई बिलियन डोज़ की आवश्यकता होगी। अगर एक इंसान में वैक्सीन के दो डोज़ की ज़रूरत महसूस होती है तो आवश्यक डोज़ की मात्रा दोगुनी हो जाएगी।
  • ऐसे में वैक्सीन की माँग ज़्यादा बढ़ जाएगी और वैक्सीन बनाने वाली कंपनियाँ इसका लाभ लेने का प्रयास कर सकती है। जिससे वैक्सीन की कीमत बढ़ सकती है गरीबों के लिए इसकी उपलब्धता घट सकती है।
  • हालांकि इस बात से इनकार नहीं किया जा सकता है कि हर देश की अपनी जनता के प्रति कुछ ज़िम्मेदारियाँ होती हैं और वे अपने देश की जनता के लिए सबसे पहले वैक्सीन की उपलब्धता को सुनिश्चित करना चाहेंगे।
  • इसका गरीब देशों पर इसका नकारात्मक प्रभाव भी देखने को मिल सकता है क्योंकि अमीर देश वैक्सीन के लिए अधिक कीमत देकर इस प्रतिस्पर्धा में जीत जाएँगे।
  • कोविड-19 टीका को विकास करने के उपरांत बड़ी मात्रा में टीका का उत्पादन करना एवं इसका सभी देशों में वितरण करना एक प्रमुख चुनौती है। सार्वभौमिक टीकाकरण की दिशा में बढ़ने हेतु बड़ी मात्रा में टीका का उत्पादन करना होगा एवं इसके लिए कच्चे सामग्री समेत व्यापक मात्रा में श्रम और पूंजी की आवश्यकता होगी। इसके लिए सभी हितधारकों को आपस में समन्वय स्थापित करना काफी चुनौतीपूर्ण कार्य होगा।

सार्वभौमिक वैक्सीन वितरण के लिए उपाय

  • इसके लिए विश्व के बड़े देशों को आगे आकर एक ऐसे एग्रीमेंट, कंवेंशन या फिर रिजोल्यूशन पर सहमति बनानी चाहिए जिसे वर्ल्ड हेल्थ असेंबली से पारित किया जा सके।
  • इससे सभी देशों को समान रूप से और ज़रूरतमंदो को पहले वैक्सीन की उपलब्धता सुनिश्चित की जा सकेगी।
  • विश्व स्वास्थ्य संगठन ने “कोवेक्स फ़ैसिलिटी” नाम का एक फ़ॉर्मूला तैयार किया है, जिसमें दुनिया के 75 देशों ने शामिल होने की इच्छा जाहिर की है।
  • ये फ़ॉर्मूला में अमीर और ग़रीब देशों के बीच भेद किए बिना ही विश्व के सभी देशों को जल्द, पारदर्शी तरीक़े से एक बराबर मात्रा में वैक्सीन की उपलब्धता को सुनिश्चित करने की बात कही गयी है।
  • अमेरिका, चीन, यूरोपियन यूनियन, भारत जैसे देशों को WHO के इस फार्मूले का समर्थन करना चाहिए।
  • कोवेक्स फ़ैसिलिटी का मुख्य उद्देश्य हर देश की उस 20 फ़ीसदी आबादी को सबसे पहले वैक्सीनेट करने की है, जिनको कोरोना की चपेट में आने का सबसे ज़्यादा ख़तरा है।
  • महामारी संबंधी तैयारियों के नवाचारों के गठबंधन (सीईपीआई), टीके और रोग-प्रतिरक्षण के वैश्विक गठबंधन (जीएवीआई) और WHO के साथ सिविल सोसायटी और सामुदायिक संगठनों (CSO) के प्रतिनिधियों को भी COVAX में सहभागिता करनी चाहिए।
  • सिविल सोसायटी और सामुदायिक संगठन (CSO) COVAX पहल के विकास और कार्यान्वयन के साथ-साथ सफल वैक्सीन के वितरण में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकते हैं।
  • कोविड-19 के विरुद्ध सार्वभौमिक टीकाकरण की दिशा में आगे बढ़ने हेतु ग्लोबल वैक्सीन एलाइंस(Gavi, the Vaccine Alliance) जैसी संस्थाओं को जोड़ा जा सकता है एवं इनकी कुशल नेटवर्क एवं अनुभव का प्रयोग करके सार्वभौमिक टीकाकरण की दिशा में सफलता हासिल की जा सकती है।

टीका विकास में भारत की स्थिति

  • कोविड-19 के वैक्सीन के निर्माण हेतु भारत सरकार द्वारा तकनीकी एवं वित्त संबंधी सहायता भी उपलब्ध करवाई गई है। इसके साथ ही जल्द ही टीका को लांच करने हेतु आवश्यक दिशा निर्देश एवं अपेक्षित सहयोग प्रदान करने के लिए आश्वासन भी दिया गया है। भारत में तीन संभावित टीकों का विकास काफी तेजी से हो रहा है।
  • हैदराबाद स्थित भारत बायोटेक द्वारा एक निष्क्रिय कोरोनावायरस वैक्सीन तैयार की है। परीक्षण के दौरान इसे प्रयोगशाला में जानवरों और मनुष्यों में इम्युनोजेनिक (एंटी- कोरोनावायरस एंटीबॉडी बनाता है) सुरक्षित पाया गया है। चरण 2 के परीक्षण से इसकी पुष्टि के बाद चरण 3 COVID-19 के भारत में टीका वितरण खिलाफ टीके की सुरक्षा और प्रभावकारिता का आकलन किया जायेगा।
  • पुणे स्थित सीरम इंस्टीट्यूट ऑफइं डिया (SII) ने ट्रोजन हॉर्स एप्रोच का उपयोग कर ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी- एस्ट्राजेनेका के टीके का परीक्षण किया है, जिसमें कोरोनावायरस स्पाइकग्लाइकोप्रोटीन जीन के साथ चिंपांजी एडिनोवायरस टाइप 5 का इस्तेमाल किया गया है।
  • सरकार द्वारा अतिरिक्त अनुसंधान सहायता या अग्रिम खरीद अनुबंध के बिना ही दोनों कंपनीयों ने भारी निवेश किया है।
  • सीरम इंस्टीट्यूट ऑफ इंडिया यूनाइटेड किंगडम और भारत में विनियामक मंजूरी के बाद वैक्सीन उत्पादन को बढ़ाने के लिए तैयार है।
  • भारत का सार्वभौमिक टीकाकरण कार्यक्रम बच्चों और गर्भवती महिलाओं के लिए एक वैक्सीन-वितरण मंच है।
  • यह कार्यक्रम केंद्र सरकार द्वारा वित्त पोषित है और राज्य सरकारों द्वारा इसे लागू किया जाता है। लेकिन COVID-19 वैक्सीन सभी आयु समूहों के लिए है। अतः इसके लिए नए तरह के कार्यक्रम को चलाये जाने की आवश्यकता होगी, जिसमें जरूरत के आधार पर प्राथमिकता निर्धारित हो।

आगे की राह

  • कोविड-19 वायरस के दुष्प्रभावों से कमोवेश प्रत्येक देश प्रभावित है। इस आपदा से निपटने हेतु सभी देशों को आगे आना होगा। सभी देश एक दूसरे को तकनीकी एवं आर्थिक मदद पहुंचा कर ही सभी देश इस आपदा से बाहर निकल पाएंगे। इस आपदा को दूर करने हेतु सभी देशों को संकुचित दृष्टिकोण को छोड़कर सार्वभौमिक टीकाकरण की दिशा में आगे बढ़ना होगा एवं सभी हितधारकों को आपस में सहयोग के द्वारा हर एक व्यक्ति को टीका तक के पहुंच को सुनिश्चित करना होगा। इस दिशा में वैक्सीन क्षेत्र में काम कर रहे शीर्ष संस्थाओं ग्लोबल वैक्सीन एलाइंस(Gavi, the Vaccine Alliance), रोटरी क्लब, बिल एंड मेलिंडा गेट्स फाउंडेशन इत्यादि संस्थाओं को शामिल करते हुए आगे बढ़ने का प्रयास किया जाना चाहिए।
  • इसके साथ ही वैक्सीन के निर्माण से जुड़ी चिंताओं को भी प्रमुखता से हल किए जाने की आवश्यकता है क्योंकि वैक्सीन निर्माण में जरा सी भी चूक से माननीय स्वास्थ्य से जुड़े जोखिम के बढ़ जाने की संभावना होगी। अतः वैक्सीन से जुड़े सुरक्षा प्रोटोकॉल को पालन करते हुए सतर्कता से वैक्सीन निर्माण की दिशा में आगे बढ़ा जाए।
  • भारत अनुसंधान और विकास के अलावा टीकों के विनिर्माण और वितरण में एक प्रमुख भूमिका निभा सकता है। भारत को अपने वैक्सीन निर्माण क्षमता को तेजी से बढ़ाकर वैश्विक वैक्सीन आपूर्ति श्रृंखला में अपनी महती भूमिका निभा सकता है जिससे भारत की सॉफ्ट पावर के रूप में न केवल स्थिति महसूस होगी बल्कि दवाओं के निर्माण में एक अग्रणी राष्ट्र के रूप में अपनी सुनिश्चित कर सकेगा।