परंपरागत ऊर्जा का विकल्प : सूक्ष्मजीवों से जैव ईंधन - यूपीएससी, आईएएस, सिविल सेवा और राज्य पीसीएस परीक्षाओं के लिए समसामयिकी लेख

सन्दर्भ:-

  • हाल ही में संयुक्त राष्ट्र द्वारा भारत को जल्द ही ऊर्जा सुरक्षा हेतु परंपरागत स्रोतों के चरणबद्ध निदान की सलाह दी है

परिचय :-

  • ऊर्जा की बढ़ती आवश्यकताओं और विश्वव्यापी संकट के बीच सूक्ष्मजीव इस क्षेत्र में एक बड़ी उम्मीद बनकर उभरे हैं। सीमित ऊर्जा संसाधनों, कच्चे तेल के दामों में होती लगातार वृद्धि, पर्यावरण तथा आर्थिक विकास को संतुलित करते हुए सतत विकास की अवधारणा में जैव द्रव्यमान का ऊर्जा स्रोतों से रूपांतरण ही ऊर्जा भक्षी सभ्यता को बचाने में सक्षम है।

क्या हैं सूक्ष्मजीव

  • वे जीव जिन्हें मनुष्य नंगी आंखों से नही देख सकता तथा जिन्हें देखने के लिए सूक्ष्मदर्शी यंत्र की आवश्यकता पड़ती है, उन्हें सूक्ष्मजीव (माइक्रोऑर्गैनिज्म) कहते हैं। सूक्ष्मजैविकी (microbiology) में सूक्ष्मजीवों का अध्ययन किया जाता है|इसके अन्तर्गत सभी जीवाणु (बैक्टीरिया) और आर्किया तथा लगभग सभी प्रोटोजोआ के अलावा कुछ कवक (फंगी), शैवाल (एल्गी), और चक्रधर (रॉटिफर) आदि जीव आते हैं|

जैव ईंधन-

  • बायोफ्यूल बायोमास से प्राप्त ईंधन है|
  • बायोमास को 'कार्बनिक पदार्थ- विशेष रूप से पादप पदार्थ- के रूप में परिभाषित किया गया है, जिसे ईंधन में परिवर्तित किया जा सकता है और इसे संभावित ऊर्जा स्रोत माना जाता है|
  • बायोमास के स्रोतों में पेड़, ऊर्जा फसलें, कृषि अवशेष और खाद्य और अपशिष्ट अवशेष शामिल हैं| इसमें सल्फर का तत्व नहीं होता है और यह कम कार्बन मोनोऑक्साइड और कम विषाक्त उत्सर्जन पैदा करता है| जैव ईंधन ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन को कम कर सकता है और जीवाश्म ईंधन का विकल्प प्रदान करके ऊर्जा सुरक्षा बढ़ा सकता है|

कैसे होगा उत्पादन

  • सूक्ष्मजीव आधारित जैव ऊर्जा के उत्पादन के लिए पौधों से प्राप्त अपव‌र्ज्य पदार्थाें जैसे भूसा, पुवाल, मक्के के ठूंठ, लकड़ी के बुरादे तथा अनेक प्रकार के जैव द्रव्यमानों का किण्वन किया जाएगा। इसमें सूक्ष्मजीवों के उपयोग की असीमित संभावनाएं हैं।शैवालों में कार्बन स्थिरीकरण की नैसर्गिक क्षमता होती है इनका उपयोग सर्वप्रथम कार्बन आधारित जैव द्रव्यमान का संकलन, तत्पश्चात उसका किण्वन कर जैव एथेनाल में रूपांतरण करके किया जाएगा। इसमें भूमि के कम क्षेत्रफल एवं लागत में ही अधिक जैव ईधन उत्पादित किया जा सकेगा। सूक्ष्म शैवालों के उत्पादन का दूसरा सशक्त पहलू यह है कि इसके उत्पादन के लिए प्रयुक्त जल को शहरों के अपशिष्ट एवं दूषित जल से प्राप्त किया जा सकता है, जो पर्यावरण संकट को भी काफी हद तक दूर करेगा।

सूक्ष्मजीव ही क्यों?-

  • जैव-ईंधन उत्पादन सहित अधिकतर जैव-प्रौद्योगिकीय प्रक्रियाएं कम लागत और शर्करा एवं नाइट्रोजन स्रोत से निर्वाध आपूर्ति की उपलब्धता पर निर्भर है शर्करा आमतौर पर पौधों से आती है। पौधे प्रकाश संश्लेषण प्रक्रिया के माध्यम से वातावरण में कार्बन डाइऑक्साइड को शर्करा, प्रोटीन और लिपिड जैसे जैविक घटकों में परिवर्तित करने के लिए प्रकाश ऊर्जा का उपयोग करते हैं। हालांकि कुछ बैक्टीरिया, जैसे साइनोबैक्टीरिया (जिसे नीले-हरे शैवाल के रूप में भी जाना जाता है), भी प्रकाश संश्लेषण कर सकते हैं और वातावरण में कार्बन डाइऑक्साइड को ठीक करके शर्करा का उत्पादन कर सकते हैं। साइनोबैक्टीरिया से शर्करा की उपज संभावित रूप से भूमि आधारित फसलों की तुलना में बहुत अधिक हो सकती है। इसके अतिरिक्त , पौधे-आधारित शर्करा के विपरीत साइनोबैक्टीरियल बायोमास प्रोटीन के रूप में एक नाइट्रोजन स्रोत प्रदान करता है।

निष्कर्ष :-

  • आर्थिक विकास तथा पर्यावरण में संतुलन वर्तमान में सर्वाधिक द्वंदात्मक स्थिति है। ऐसे में इस प्रकार की तकनीकी सम्पूर्ण विश्व को सतत विकास की ओर ले जा सकने में सक्षम होगी।

सामान्य अध्ययन प्रश्नपत्र 3

  • पर्यावरण तथा पारिस्थितिकी

मुख्य परीक्षा प्रश्न :

  • हाल ही में संयुक्त राष्ट्र द्वारा भारत को जल्द ही ऊर्जा सुरक्षा हेतु परंपरागत स्रोतों के चरणबद्ध निदान की सलाह दी है। इस हेतु भारत के लिए सूक्ष्मजीवो से ऊर्जा की तकनीकी किस प्रकार सहायक होगी।