ब्लॉग : फ्रांस के इंडियन ओसियन रिम एसोसिएशन के 23वें सदस्य बनने के मायने by विवेक ओझा

हिन्द महासागर हो या प्रशांत महासागर , दक्षिण चीन सागर हो या पूर्वी चीन सागर या फिर कोई भी अन्य भू राजनीतिक , भू सामरिक , भू आर्थिक महत्व वाला सागर , महासागर हो , आज विश्व राजनीति और क्षेत्रीय राजनीति के सबसे प्रमुख एजेंडे में शामिल हैं । हिन्द महासागर का भी महत्व किसी से छुपा नहीं है और हिन्द महासागर के सुरक्षा सरोकारों के लिए बने इंडियन ओसियन रिम एसोसिएशन नामक प्रमुख संगठन में यूरोपीय देश फ्रांस का हाल ही में पूर्ण सदस्य बनना एक बार फिर से हिन्द महासागर और उसके इस संगठन को चर्चा का विषय बना देता है। 18 दिसंबर को संयुक्त अरब अमीरात की अध्यक्षता में इंडियन ओसियन रिम एसोसिएशन के काउंसिल ऑफ मिनिस्टर्स की वर्चुअल बैठक आयोजित की गई जिसकी सबसे बड़े उपलब्धि यह रही कि भारत के समर्थन के साथ फ्रांस को इंडियन ओसियन रिम एसोसिएशन का 23वा सदस्य बनाया गया है।

इस बैठक में रूस और सऊदी अरब को संवाद साझेदार नहीं बनाने का निर्णय हुआ। दोनों देश आईओआरए के डायलॉग पार्टनर बनने के लिए काफी समय से आवेदन कर चुके हैं । यह संभवतः पहली बार है जब एक देश ( फ्रांस) जिसकी मुख्य भूमि हिन्द महासागर की परिधि में नहीं आती फिर भी उसे इंडियन ओसियन रिम एसोसिएशन का पूर्ण सदस्य बनाया गया है।

इंडियन ओसियन रिम एसोसिएशन के प्रेस नोट में कहा गया है कि फ्रांस की सदस्यता रियूनियन द्वीप के चलते है। पश्चिमी हिन्द महासागर में अपने स्वामित्व वाले रियूनियन द्वीप का हवाला देते हुए फ्रांस ने पूर्ण सदस्य बनने का आवेदन किया था । रियूनियन द्वीप ने हिंद महासागर में कोमोरोस द्वीप के साथ विवाद वाले मेओटी आर्किपिलागो को छोड़ दिया चूंकि इसपर कोमोरोस का भी दावा है ।

बैठक में फ्रांस की पूर्ण सदस्यता को लेकर ईरान की तरफ से जो भी रुकावटें थीं उसे दूर कर दिया गया । इसलिए भी फ्रांस पूर्ण सदस्य बन पाया । ईरान के मंजूरी के अभाव में ही सऊदी अरब इस बार भी आईओआरए का डायलॉग पार्टनर नहीं बन पाया । चूंकि इस एसोसिएशन में सभी फैसले सदस्य देशों द्वारा सर्वसम्मति से लिए जाते हैं इसलिए ईरान के समर्थन और गैर समर्थन का बड़ा असर पड़ जाता है। ईरान के उदार रुख़ के पिछे प्रमुख कारण की बात करें तो इसके पिछे ईरान के नाभिकीय कार्यक्रम को लेकर ज्वाइंट कॉम्प्रिहेंसिव प्लान ऑफ एक्शन में बाइडेन अमेरिकी प्रशासन के पुनः जुड़ने के संकेत काम कर रहे हैं जिसमें फ्रांस भी एक सदस्य है। ग़ौरतलब है कि जुलाई 2015 में ऑस्ट्रिया की राजधानी वियना में संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद् के सभी सदस्य देश : अमेरिका, रूस, चीन, फ्रांस और ब्रिटेन तथा जर्मनी और साथ ही यूरोपीय संघ ने ईरान के साथ एक परमाणु समझौता किया। इसमें सुरक्षा परिषद् के पाँचों सदस्यों के साथ ही जर्मनी भी शामिल है।

फ्रांस का आईओआरए का सदस्य बनना भारत के लिए क्यों महत्वपूर्ण :

फ्रांस हिन्द महासागर अथवा हिन्द प्रशांत और साथ ही एशिया प्रशांत क्षेत्र की सुरक्षा को सुनिश्चित करने की दृष्टि से भी भारत के लिए आवश्यक है । फ्रांस 1998 से ही भारत का स्ट्रेटेजिक पार्टनर है । हिन्द महासागर के जिबूती , रीयूनियन द्वीप , अबू धाबी जैसे स्थलों पर फ्रांस के नौसैनिक अड्डे हैं । समुद्री डकैती और चीन के हिन्द महासागर के नए क्षेत्रों में अपने वर्चस्व को बढ़ाने के प्रयास को नियंत्रित करने के लिए भारत फ्रांस गठजोड़ आवश्यक है। चीन ने वर्ष 2017 में ही अफ्रीकी देश जिबूती में अपना नौसैनिक अड्डा खोला है। उल्लेखनीय है कि इस बात को ध्यान में रखकर भारत और फ्रांस ने मई , 2019 में जिबूती में ही वरुण सैन्याभ्यास को संपन्न किया था ।

समुद्रों में चीन की मंशा को भांपते हुए भारत और फ्रांस हिंद महासागर क्षेत्र में सहयोग बढ़ा रहे हैं । चीन के बेल्ट रोड पहल , मोतियों की लड़ी की नीति और म्यांमार पाकिस्तान अफ़ग़ानिस्तान जैसे देशों के साथ इकोनोमिक कॉरिडोर के जरिए जुड़ने के सक्रिय प्रयासों से भारतीय हितों को नुकसान होगा जिससे निपटने के लिए भारत फ्रांस गठजोड़ जरूरी है।

भारत और फ्रांस दोनों देशों ने अपने हिन्द प्रशांत रणनीति के तहत पश्चिमी हिन्द महासागर क्षेत्र में अपनी सामरिक साझेदारी को बढ़ाने का निर्णय किया है। भारत फ्रांस के साथ मिलकर इस क्षेत्र में बंदरगाह विकास , ब्लू इकोनॉमी के विकास , और व्यापार , पर्यटन , अंतर्संपर्क को बढ़ावा देने की दिशा में कार्य करना चाहता है ।

दोनों देश पश्चिमी हिन्द महासागर में किसी तीसरे देश की परियोजनाओं से सम्बद्ध होकर कार्य करने की रणनीति निर्मित कर चुके हैं । भारत फ्रांस और वनीला द्वीपों जिसमें कोमोरोस , मेडागास्कर, मॉरीशस और सेशेल्स शामिल हैं , की फ्रांस के नियंत्रण वाले रीयूनियन द्वीप में बैठक हुई जिसमें आर्थिक और विकास साझेदारी को खोजने का प्रयास किया गया है। वनीला द्वीप के निकट मोजांबिक चैनल में गैस के भंडारों की प्राप्ति पर भी भारत की नजर है ।

वर्तमान समय में भारत और फ्रांस के मध्य प्रतिरक्षा साझेदारी का विस्तार पश्चिमी हिन्द महासागर क्षेत्र तक किए जाने का निर्णय हुआ है। भारत अपने इंडो पैसिफिक आउटरीच विजन के आधार पर हिन्द महासागर की सुरक्षा के लिए कोमोरोस और मेडागास्कर जैसे देशों के साथ अपने द्विपक्षीय संबंधों को मजबूती दे रहा है ।

दोनों देशों के बीच 2017 में एक व्हाइट नौवहन समझौते पर हस्ताक्षर किए गए। इस समझौते से पूरे क्षेत्र में पोतों की निगरानी, समुद्री यातायात के बारे में जानकारी का आदान-प्रदान, समुद्री क्षेत्र के प्रति जागरूकता बढ़ेगी। मार्च , 2018 में भारत और फ्रांस ने हिंद महासागर क्षेत्र में भारत फ्रांस सहयोग के लिए संयुक्त सामरिक विजन को लॉन्च किया था। दोनों देश हिन्द प्रशांत क्षेत्र में नौगमन की स्वतंत्रता, समुद्री व्यापारिक मार्गों की स्वतंत्रता और सुरक्षा के लिए मिलकर कार्य करने की घोषणा कर चुके हैं । दोनों देशों ने समुद्री सुरक्षा सहयोग को बढ़ाने के लिए अपनी सामरिक साझेदारी को अधिक समावेशी बनाने का निर्णय किया है। विजन दस्तावेज में दोनों देशों द्वारा हिन्द महासागर क्षेत्र में उभरती चुनौतियों पर चिंता व्यक्त की गई जिनमें शामिल हैं:

  • “विशेष रूप से अफ्रीका के हॉर्न में आतंकवाद और समुद्री डकैती के खतरों के परिप्रेक्ष्य में समुद्री यातायात की सुरक्षा;
  • सभी राष्ट्रों द्वारा अंतरराष्ट्रीय विधि का सम्मान,
  • तस्करी और अवैध रूप से मछली पकड़ने(आईयूयू) जैसे संगठित अपराध;
  • जलवायु परिवर्तन, पर्यावरण और प्राकृतिक संसाधनों की सुरक्षा”।

भारत और फ्रांस हिन्द महासागर और साथ ही इंडो पैसिफिक क्षेत्र की सुरक्षा के लिए बहुस्तरीय रणनीति बनाने में लगे रहे हैं । दोनों देशों ने प्रोविज़न ऑफ रेसिप्रोकल लॉजिस्टिक सपोर्ट एग्रीमेंट पर भी सहमति जताई है जिसमें "भारतीय और फ्रांसीसी सशस्त्र बलों के लिए संबंधित सुविधाओं तक पारस्परिक पहुँच को दी जाने वाली लॉजिस्टिक सहायता के विस्तार" की इच्छा व्यक्त की गई है l इससे हिंद महासागर में आम चुनौतियों से निपटने में घनिष्ट रक्षा सहयोग प्रदान किया जाएगा।

विवेक ओझा (ध्येय IAS)


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