सन्दर्भ: हाल ही में सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार को यह निर्देश दिया है कि वह मुस्लिम महिला (विवाह अधिकार संरक्षण) अधिनियम, 2019 के तहत दर्ज किए गए आपराधिक मामलों का विस्तृत विवरण प्रस्तुत करे। यह निर्देश उन याचिकाओं की सुनवाई के दौरान दिया गया है, जो इस कानून की संवैधानिक वैधता को चुनौती दे रही हैं।
· तीन तलाक भारत में समानता, धार्मिक स्वतंत्रता और व्यक्तिगत अधिकारों से जुड़ा एक महत्वपूर्ण कानूनी और सामाजिक मुद्दा रहा है। यह विशेष रूप से मुस्लिम महिलाओं के अधिकारों और उनके कानूनी संरक्षण से संबंधित बहस का केंद्र रहा है।
तीन तलाक :
- तीन तलाक, जिसे तलाक-ए-बिदअत भी कहा जाता है, इस्लामी व्यक्तिगत कानून के तहत एक प्रथा है, जो विशेष रूप से हानाफ़ी मुस्लिमों द्वारा अपनाई जाती है। इस प्रथा में, कोई भी मुस्लिम पुरुष अपनी पत्नी को तत्काल तलाक दे सकता है, यदि वह तीन बार "तलाक" शब्द का उच्चारण कर दे।
- हालांकि, मुस्लिम महिलाओं को यह अधिकार प्राप्त नहीं है। यदि उन्हें तलाक लेना हो, तो उन्हें शरिया अधिनियम, 1937 के तहत न्यायालय में मुकदमा दायर करना पड़ता है।
विश्व में तीन तलाक पर दृष्टिकोण :
· कई इस्लामी देशों ने पहले ही तीन तलाक को अवैध कर दिया है। इनमें पाकिस्तान, बांग्लादेश और इंडोनेशिया जैसे देश शामिल हैं। इन देशों ने इसे एक अनुचित और एकतरफा प्रथा माना है।
भारत में भी महिला अधिकारों और लैंगिक न्याय (Gender Justice) को लेकर लंबी बहस के बाद इस पर कानूनी कार्रवाई की गई।
सुप्रीम कोर्ट का ऐतिहासिक 2017 का फैसला:
2017 में, सुप्रीम कोर्ट ने "शायरा बानो बनाम भारत संघ" मामले में तीन तलाक को असंवैधानिक करार दिया।
कोर्ट ने कहा कि यह प्रथा:
मनमानी (Arbitrary) है और संविधान के अनुच्छेद 14 (समानता के अधिकार) का उल्लंघन करती है।
मौलिक अधिकारों के खिलाफ है।
इस्लाम का अनिवार्य हिस्सा नहीं है, इसलिए यह अनुच्छेद 25 (धार्मिक स्वतंत्रता) के तहत संरक्षण के योग्य नहीं है।
इस फैसले के बावजूद, भारत सरकार ने 2019 में तीन तलाक को अपराध घोषित करने वाला कानून बनाया।
मुस्लिम महिला (विवाह अधिकार संरक्षण) अधिनियम, 2019
इस कानून का उद्देश्य मुस्लिम महिलाओं को तीन तलाक से सुरक्षा प्रदान करना है। यह तीन तलाक को एक दंडनीय अपराध घोषित करता है।
आपराधिक अपराध: तीन तलाक बोलने पर इसे गैर-जमानती अपराध माना जाएगा।
सजा: दोषी पाए जाने पर तीन साल तक की जेल हो सकती है।
महिलाओं के लिए कानूनी सहायता: यह कानून सुनिश्चित करता है कि मुस्लिम महिलाओं को बिना किसी सहारे के नहीं छोड़ा जाए।
वर्तमान में इस कानून को लेकर बहस:
हालांकि यह कानून मुस्लिम महिलाओं की सुरक्षा के लिए बनाया गया है, फिर भी इसकी वैधता को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी गई है। याचिकाकर्ताओं ने इस कानून की निष्पक्षता, आवश्यकता और प्रभाव पर सवाल उठाए हैं।
कानूनी चुनौती के मुख्य मुद्दे:
कानूनी प्रभावहीनता:
- सुप्रीम कोर्ट पहले ही 2017 में तीन तलाक को अमान्य कर चुका था। ऐसे में इसे अपराध घोषित करना अनावश्यक माना जा रहा है।
विशेष रूप से मुस्लिम पुरुषों को निशाना बनाना:
- याचिकाकर्ताओं का तर्क है कि यह कानून सिर्फ मुस्लिम पुरुषों के खिलाफ है, जबकि अन्य धर्मों में इसी तरह के परित्याग (Abandonment) के मामलों को आपराधिक नहीं माना जाता।
गलत इस्तेमाल की संभावना:
- यह भी चिंता जताई जा रही है कि इस कानून का दुरुपयोग किया जा सकता है, जिससे यह महिलाओं की सुरक्षा के बजाय पुरुषों के लिए दंडात्मक (Punitive) उपाय बन सकता है।
निष्कर्ष
तीन तलाक और इसका अपराधीकरण भारत में लैंगिक समानता, धार्मिक स्वतंत्रता और कानूनी निष्पक्षता से जुड़े व्यापक मुद्दों को दर्शाता है। वही 2019 का कानून मुस्लिम महिलाओं की रक्षा के लिए बनाया गया था किन्तु इसकी प्रभावशीलता और कानूनी वैधता को लेकर बहस जारी है। सुप्रीम कोर्ट का आगामी निर्णय यह तय करेगा कि यह कानून जारी रहेगा या इसमें संशोधन किया जाएगा, जिससे महिलाओं के अधिकारों और कानून की निष्पक्षता के बीच संतुलन बनाया जा सके।