संदर्भ: हाल ही में एक ऐतिहासिक निर्णय में, भारत के सुप्रीम कोर्ट ने यह स्पष्ट किया है कि हिंदू विवाह अधिनियम (HMA), 1955 के तहत शून्य विवाहों में भी पति या पत्नी को अलिमनी (गुजारा भत्ता) और भरण-पोषण दिया जा सकता है, भले ही विवाह को कानूनी रूप से शून्य (अवैध) घोषित कर दिया गया हो।
निर्णय के मुख्य बिंदु :
- शून्य विवाहों में अलिमनी और भरण-पोषण: सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया कि शून्य विवाहों में पति-पत्नी को हिंदू विवाह अधिनियम की धारा 25 के तहत स्थायी अलिमनी या भरण-पोषण का दावा करने का अधिकार है। विवाह का कानूनी रूप से अवैध होना इस वित्तीय राहत के अधिकार को प्रभावित नहीं करता।
- अस्थायी भरण-पोषण: कोर्ट ने यह भी निर्णय दिया कि यदि मामला चल रहा हो, तो अस्थायी भरण-पोषण का आदेश दिया जा सकता है, भले ही विवाह बाद में शून्य घोषित कर दिया जाए। अधिनियम की धारा 24 के तहत भरण-पोषण का प्रावधान किया गया है, जो विशिष्ट शर्तों के अधीन होता है। इस राहत को देने का निर्णय पक्षों के व्यवहार पर निर्भर करता है और यह न्यायालय की विवेकाधिकार पर आधारित होता है।
- नारी विरोधी शब्दावली का आलोचना: सुप्रीम कोर्ट ने बॉम्बे हाई कोर्ट के एक निर्णय में 'अवैध पत्नी' और 'विश्वसनीय प्रेमिका' जैसे नारी विरोधी और अपमानजनक शब्दों की कड़ी आलोचना की। कोर्ट ने कहा कि ऐसी भाषा महिलाओं की गरिमा को घटित करती है और कानूनी प्रक्रियाओं में इस प्रकार की भाषा का इस्तेमाल अनुचित है, क्योंकि यह रूढ़ियों और पूर्वाग्रहों को बढ़ावा देती है।
शून्य विवाह के बारे में:
शून्य विवाह वह विवाह होते हैं जो कानूनी रूप से प्रारंभ से ही अवैध होते हैं और इन्हें ऐसे माना जाता है जैसे ये कभी हुए ही न हों। इन विवाहों में वैवाहिक अधिकारों और लाभों का दावा करने के लिए कानूनी रूप से कोई वैधता नहीं होती। शून्य विवाहों के मामले में अदालत से रद्दीकरण की आवश्यकता नहीं होती, जबकि शून्यात्मक विवाहों (Voidable marriages) में कोर्ट के आदेश से ही रद्दीकरण होता है।
शून्य विवाह के प्रमुख आधार:
1. नस्लीय विवाह (Incestuous Marriage): यदि दो व्यक्ति निकट रक्त संबंधी होते हैं (जैसे भाई-बहन या माता-पिता और संतान) तो ऐसा विवाह स्वाभाविक रूप से शून्य माना जाता है। ऐसे विवाह कानूनी रूप से निषिद्ध होते हैं,ताकि जीन संबंधी समस्याओं और सामाजिक मान्यताओं का पालन किया जा सके।
2. बहुविवाह (Polygamous Marriage): यदि कोई व्यक्ति पहले से किसी और से शादीशुदा है, तो उसके बाद होने वाली कोई भी शादी बहुविवाह मानी जाती है और शून्य होती है। उदाहरण के लिए, यदि कोई व्यक्ति अपनी पहली शादी को कानूनी रूप से समाप्त किए बिना दूसरी शादी करता है, तो दूसरी शादी की कोई कानूनी वैधता नहीं होगी।
3. प्रतिबंधित रिश्ते में विवाह: जिन व्यक्तियों के बीच सम्बन्ध प्रतिबंधित होते हैं (जैसे करीबी चचेरे भाई-बहन या अन्य नजदीकी रिश्तेदार), उनके बीच विवाह कानूनी रूप से शून्य माना जाता है।
4. सपिंडा संबंधियों के मध्य विवाह: सपिंडा संबंध वह संबंध होते हैं जो एक सामान्य पूर्वज से जुड़े होते हैं। सपिंडा श्रेणी के भीतर विवाहों की कड़ी निषेधता होती है और वे स्वचालित रूप से शून्य होते हैं, क्योंकि ऐसे विवाहों से नस्लीय समस्याएं उत्पन्न हो सकती हैं और सामाजिक व्यवस्था में खलल डाल सकती है।
निष्कर्ष:
सुप्रीम कोर्ट का निर्णय शून्य विवाहों में व्यक्तियों के लिए वित्तीय समर्थन के अधिकार को सुनिश्चित कर, कानून के तहत उनकी सुरक्षा को मजबूत करता है। यह निर्णय ऐसे व्यक्तियों के लिए कानूनी ढांचे को मजबूती प्रदान करता है, जिनके विवाह बाद में रद्द या शून्य घोषित कर दिए जाते हैं, ताकि उन्हें वित्तीय रूप से असुरक्षित न छोड़ा जाए।