संदर्भ:
हाल ही में एक्स (पूर्व में ट्विटर) ने भारत सरकार के सहयोग पोर्टल के संभावित दुरुपयोग को लेकर अपनी चिंता व्यक्त की है। यह पोर्टल मूलतः सामग्री हटाने की प्रक्रिया को सरल और प्रभावी बनाने के उद्देश्य से स्थापित किया गया है। सरकार का तर्क है कि यह पोर्टल अवैध और आपत्तिजनक सामग्री को नियंत्रित करने में कानून प्रवर्तन एजेंसियों तथा सोशल मीडिया प्लेटफार्मों की सहायता करेगा।
● आलोचकों का यह तर्क है कि उनका मानना है कि यदि पोर्टल का उपयोग बिना स्पष्ट दिशा-निर्देशों और उचित निगरानी के किया गया, तो यह अनियंत्रित सेंसरशिप का माध्यम बन सकता है।
सहयोग पोर्टल के बारे में:
● गृह मंत्रालय (MHA) द्वारा स्थापित ‘सहयोग’ एक ऐसा मंच है, जिसे अवैध सामग्री को तेजी से हटाने के उद्देश्य से कानून प्रवर्तन एजेंसियों, दूरसंचार प्रदाताओं और सोशल मीडिया प्लेटफार्मों के बीच समन्वय को बेहतर बनाने के लिए विकसित किया गया है।
● यह पोर्टल इलेक्ट्रॉनिक्स और सूचना प्रौद्योगिकी मंत्रालय (MeitY) के 2023 के ज्ञापन का अनुपालन करता है, जो एजेंसियों को सूचना प्रौद्योगिकी अधिनियम (IT Act) की धारा 79 के तहत सामग्री को अवरुद्ध करने के लिए अधिकृत करता है।
सहयोग पोर्टल की मुख्य विशेषताएं:
● अधिकृत एजेंसियों का एकीकरण: यह पोर्टल पुलिस सहित विभिन्न एजेंसियों को सोशल मीडिया प्लेटफार्मों के साथ जोड़ता है, जिससे संचार और कार्रवाई की प्रक्रिया में तेजी आती है।
● अवैध गतिविधियों के खिलाफ त्वरित कार्रवाई: यह पोर्टल डिजिटल अपराधों पर त्वरित प्रतिक्रिया सुनिश्चित करता है, जिससे कानून प्रवर्तन एजेंसियों को समयबद्ध तरीके से कार्रवाई करने में सहायता मिलती है।
● गैरकानूनी सामग्री की रिपोर्टिंग और हटाना: यह पोर्टल अवैध या हानिकारक ऑनलाइन सामग्री की रिपोर्टिंग की प्रक्रिया को सुव्यवस्थित करता है, जिससे अधिकारियों द्वारा त्वरित हस्तक्षेप और आवश्यक कार्रवाई सुनिश्चित होती है।
आईटी अधिनियम की धारा 79 की भूमिका:
● सूचना प्रौद्योगिकी अधिनियम (IT Act) की धारा 79 मध्यस्थों, जैसे कि एक्स (पूर्व में ट्विटर), को तीसरे पक्ष की सामग्री के लिए उत्तरदायित्व से "दायित्व-मुक्ति" (Liability Exemption) प्रदान करती है। हालाँकि, धारा 79(3)(बी) के तहत यह छूट उस स्थिति में समाप्त हो जाती है, जब किसी मध्यस्थ को गैरकानूनी सामग्री के बारे में सूचित किया जाता है।
● ऐसे मामलों में, मध्यस्थ को तुरंत उस सामग्री को हटाना आवश्यक होता है। हालांकि, स्पष्ट दिशा-निर्देशों या सुरक्षा उपायों की अनुपस्थिति में, यह प्रावधान संभावित अतिक्रमण और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर अनियंत्रित प्रतिबंधों के संबंध में चिंताएँ उत्पन्न कर सकता है।
एक्स की चिंताएँ:
● एक्स का तर्क है कि ‘सहयोग’ पोर्टल, सूचना प्रौद्योगिकी अधिनियम की धारा 79(3)(बी) का दुरुपयोग करता है और धारा 69ए में निहित सुरक्षा उपायों को दरकिनार करता है। धारा 69ए के तहत, सामग्री को अवरुद्ध करने की अनुमति केवल विशिष्ट आधारों (जैसे, राष्ट्रीय सुरक्षा, सार्वजनिक व्यवस्था आदि) पर दी जाती है, जिसके लिए सक्षम प्राधिकरण की पूर्व स्वीकृति (Approval) और एक स्वतंत्र समीक्षा प्रक्रिया (Independent Review Process) की आवश्यकता होती है।
● हालांकि, ‘सहयोग’ पोर्टल के माध्यम से स्थानीय पुलिस सहित कई सरकारी एजेंसियाँ प्रक्रियात्मक जाँच के बिना ही ब्लॉकिंग आदेश जारी कर सकती हैं। यह स्थिति मनमाने ढंग से सेंसरशिप (Arbitrary Censorship) के जोखिम को बढ़ा सकती है और सर्वोच्च न्यायालय द्वारा श्रेया सिंघल बनाम भारत संघ (2015) मामले में स्थापित सिद्धांतों का उल्लंघन कर सकती है।
निष्कर्ष:
‘सहयोग’ के खिलाफ X की चुनौती सामग्री विनियमन तंत्र के संभावित दुरुपयोग को लेकर गंभीर चिंताएँ उजागर करती है। जहाँ एक ओर सरकार का उद्देश्य साइबरस्पेस की सुरक्षा सुनिश्चित करना है, वहीं सुरक्षा उपायों और पारदर्शिता की कमी अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता (Freedom of Speech) से संबंधित महत्वपूर्ण प्रश्न खड़े करती है।
यह मामला भारत में सामग्री विनियमन के दृष्टिकोण से व्यापक निहितार्थ रखता है और संभावित रूप से ऑनलाइन सेंसरशिप और सामग्री मॉडरेशन के लिए एक वैश्विक मिसाल स्थापित कर सकता है।