संदर्भ:
हाल ही में मानव-वन्यजीव संघर्ष में तेज़ी से वृद्धि देखी गई है। केरल के वायनाड जिले में 48 घंटे के भीतर हाथियों के हमले में चार लोगों की मृत्यु हो गई। इस स्थिति को ध्यान में रखते हुए राज्यसभा में वन्यजीव संरक्षण अधिनियम, 1972 में संशोधन की मांग उठी है, ताकि मानव सुरक्षा को प्राथमिकता देते हुए प्रभावी नीतिगत कदम उठाए जा सकें।
मानव-वन्यजीव संघर्ष की गंभीरता:
· केंद्रीय पर्यावरण मंत्रालय के अनुसार, 2020 से 2024 के बीच जंगली जानवरों के हमलों में 460 लोगों की मृत्यु हुई, जबकि 4,527 लोग घायल हुए।
· पर्यावरण, वन एवं जलवायु परिवर्तन राज्य मंत्री ने लोकसभा में बताया कि 2019 से 2024 के बीच भारत में हाथी हमलों से 2,833 लोगों की मृत्यु हुई, जिसमें अकेले 2023-24 में 629 मौतें हुईं। 2024 में केरल में हाथियों के हमले से 102 मौतें दर्ज की गईं।
केरल में हाल की घटनाएँ:
- वायनाड में हाथी का हमला (2024): 48 घंटों में चार लोगों की मौत, जिनमें अट्टमाला गाँव के 27 वर्षीय युवक की मृत्यु भी शामिल है।
- बाघ का हमला (24 जनवरी 2024): एक आदिवासी महिला, जो कॉफी बागान में काम कर रही थी, बाघ के हमले का शिकार हो गई।
इन घटनाओं ने प्रभावी वन्यजीव प्रबंधन की आवश्यकता को स्पष्ट रूप से उजागर किया है।
चिंताएँ और चुनौतियाँ:
- मौजूदा कानूनों के तहत मानव सुरक्षा खतरे में है।
- किसान और बागान मजदूर हमलों के डर से आर्थिक नुकसान झेल रहे हैं।
- जंगली सूअर केला, अदरक, हल्दी और कसावा जैसी प्रमुख फसलों को नष्ट कर रहे हैं।
- मानव-वन्यजीव संघर्ष प्रबंधन पर कोई स्पष्ट राष्ट्रीय नीति नहीं है।
राष्ट्रीय रणनीति की आवश्यकता:
इस समस्या के समाधान हेतु राष्ट्रीय वन्यजीव बोर्ड (NBWL) ने निम्नलिखित सुझाव दिए हैं:
- एक संगठित संघर्ष प्रबंधन के लिए राष्ट्रीय नीति बनाई जाए।
- राज्य स्तर पर मजबूत वन्यजीव प्रबंधन प्रणाली विकसित की जाए।
- संरक्षण और मानव सुरक्षा के बीच संतुलन बनाए रखने के लिए कानूनी सुधार किए जाएं।
वन्यजीव संरक्षण अधिनियम, 1972 से जुड़ी समस्याएँ
वन्यजीव संरक्षण अधिनियम (WPA), 1972 का उद्देश्य वन्यजीवों का संरक्षण करना और जैव विविधता को प्रभावित करने वाली गतिविधियों को नियंत्रित करना है। लेकिन इसमें कई खामियाँ हैं:
- कमजोर प्रवर्तन और भ्रष्टाचार इसके प्रभाव को कम करता है।
- यह वैश्विक संरक्षण मानकों के अनुरूप नहीं है।
- अंतरराष्ट्रीय स्तर पर प्रतिबंधित प्रजातियों के व्यापार पर कोई सख्त दंड नहीं है।
- आईयूसीएन (IUCN) द्वारा सूचीबद्ध संकटग्रस्त प्रजातियों को इसमें मान्यता नहीं दी गई है।
- प्रवासी प्रजातियों को पर्याप्त सुरक्षा नहीं मिलती, जबकि वे लंबे समय तक भारत में रहती हैं।
- इसके कुछ प्रावधान मानव-वन्यजीव संघर्ष को बढ़ाते हैं।
निष्कर्ष:
केरल में बढ़ता मानव-वन्यजीव संघर्ष एक राष्ट्रीय संकट का हिस्सा है। बढ़ती मौतें और आर्थिक नुकसान त्वरित नीतिगत हस्तक्षेप की माँग करते हैं। वन्यजीव संरक्षण अधिनियम, 1972 में संशोधन और बेहतर प्रबंधन रणनीतियाँ अपनाना आवश्यक है, ताकि वन्यजीव संरक्षण और मानव सुरक्षा के बीच संतुलन बनाया जा सके। इस विषय पर जारी चर्चाएँ संघर्ष को कम करने के लिए एक स्थायी दृष्टिकोण विकसित करने में मदद करेंगी।