सन्दर्भ : हाल ही में अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने अमेरिका के सभी व्यापारिक साझेदार देशों पर पारस्परिक शुल्क (Reciprocal Tariffs) लगाने की घोषणा की। इस निर्णय से अमेरिका और उसके सहयोगी तथा प्रतिद्वंद्वी देशों के बीच व्यापारिक तनाव बढ़ने और संभावित व्यापार युद्ध की आशंका उत्पन्न हो गई है।
पारस्परिक शुल्क क्या हैं?
- शुल्क (Tariffs) वे कर हैं, जो आयातित वस्तुओं पर लगाए जाते हैं ताकि व्यापार को नियंत्रित किया जा सके और घरेलू उद्योगों की रक्षा की जा सके। पारस्परिक शुल्क (Reciprocal Tariffs) का अर्थ है कि कोई देश उतने ही शुल्क लगाएगा, जितने शुल्क उसके निर्यात (Exports) पर दूसरा देश लगाता है।
- यह नीति पारंपरिक व्यापार समझौतों को चुनौती देती है, जो विकासशील देशों को अपने घरेलू उद्योगों की सुरक्षा के लिए उच्च शुल्क लगाने की अनुमति देते थे, जबकि विकसित देश अपेक्षाकृत निम्न शुल्क संरचना बनाए रखते थे।
- इतिहास में वैश्विक व्यापार को प्रोत्साहित करने के लिए शुल्क दरों को कम करने की प्रवृत्ति देखी गई है। GATT (General Agreement on Tariffs and Trade) और WTO जैसे समझौते मुक्त व्यापार (Free Trade) को बढ़ावा देने के लिए बनाए गए थे। हालांकि, पारस्परिक शुल्क की नीति इस प्रणाली को बाधित कर सकती है।
पारस्परिक शुल्क की अवधारणा:
- अमेरिका का तर्क है कि मौजूदा व्यापार नियम कुछ देशों को अनुचित लाभ (Unfair Advantage) प्रदान करते हैं, क्योंकि वे अपने निर्यातकों को सरकारी सहायता, सब्सिडी और कम शुल्क जैसी नीतियों से बढ़ावा देते हैं। इससे इन देशों के उत्पाद सस्ते हो जाते हैं और वे अंतरराष्ट्रीय बाजार में प्रतिस्पर्धी हो जाते हैं। उदाहरण के तौर पर, भारत, जो उत्पादन से जुड़ी प्रोत्साहन योजना (PLI – Production Linked Incentive) जैसी नीतियों के माध्यम से निर्यातकों को सहायता प्रदान करता है।
- इन्हीं समस्याओं को ध्यान में रखते हुए, अमेरिका ने पारस्परिक शुल्क (Reciprocal Tariffs) नीति लागू करने का निर्णय लिया। इस नीति के तहत, यदि कोई देश अमेरिकी उत्पादों पर अधिक शुल्क लगाता है, तो अमेरिका भी उसी अनुपात में उसके उत्पादों पर शुल्क बढ़ाएगा। इस नीति की गणना में कई व्यापारिक कारकों को शामिल किया जाता है, जिनमें शुल्क दरें, सरकारी सब्सिडी और निर्यातकों को मिलने वाली अन्य सहायता प्रमुख हैं।
- यदि पारस्परिक शुल्क लागू किए जाते हैं, तो इससे आयात लागत (Import Costs) बढ़ सकती है और वैश्विक आपूर्ति श्रृंखला (Global Supply Chains) बाधित हो सकती है। विकासशील देश, जो अपने घरेलू उद्योगों को सस्ते विदेशी उत्पादों से बचाने के लिए संरक्षणवादी (Protective) शुल्क लगाते हैं, वे पारस्परिक शुल्क लागू होने की स्थिति में गंभीर आर्थिक चुनौतियों का सामना कर सकते हैं।
भारत पर प्रभाव:
1. भारतीय निर्यात की लागत में वृद्धि – अमेरिका द्वारा उच्च शुल्क लगाए जाने से भारतीय उत्पाद अमेरिकी बाजार में महंगे हो सकते हैं, जिससे उनकी प्रतिस्पर्धात्मकता प्रभावित हो सकती है।
2. उपभोक्ता खर्च पर प्रभाव – भारत सरकार द्वारा हाल ही में किए गए कर कटौती का उद्देश्य घरेलू मांग को प्रोत्साहित करना था, लेकिन यदि उपभोक्ता भारतीय उत्पादों की बजाय अमेरिकी वस्तुओं पर अधिक खर्च करने लगते हैं, तो आर्थिक प्रोत्साहन का प्रभाव सीमित हो सकता है।
3. अमेरिका से आयात में वृद्धि – यदि भारत व्यापार संतुलन बनाए रखने का प्रयास करता है, तो उसे अमेरिका से रक्षा उपकरण, तेल और उपभोक्ता वस्तुओं का आयात बढ़ाना पड़ सकता है।
4. घरेलू उद्योगों पर प्रभाव – अमेरिका से आयात बढ़ने के कारण आत्मनिर्भर भारत पहल प्रभावित हो सकती है, जिससे स्थानीय उत्पादन को प्रतिस्पर्धात्मक दबाव का सामना करना पड़ सकता है।
5. मुद्रा अवमूल्यन – अमेरिका से अधिक आयात होने पर डॉलर की मांग बढ़ सकती है, जिससे भारतीय रुपया कमजोर होने की संभावना बढ़ेगी।
वैश्विक व्यापार पर प्रभाव:
- संभावित व्यापार युद्ध (Trade Wars) – अमेरिका द्वारा लगाए गए शुल्क के जवाब में अन्य देश भी प्रतिशोधात्मक शुल्क लगा सकते हैं, जिससे वैश्विक आर्थिक अस्थिरता बढ़ सकती है।
- विकासशील देशों के लिए चुनौती – जो देश मुख्य रूप से निर्यात-आधारित अर्थव्यवस्थाएं हैं, उन्हें इस नीति से नुकसान हो सकता है।
- अंतरराष्ट्रीय व्यापार समझौतों पर खतरा – यह नीति विश्व व्यापार संगठन (WTO) जैसे अंतरराष्ट्रीय संगठनों द्वारा स्थापित मुक्त व्यापार के सिद्धांतों को कमजोर कर सकती है।
निष्कर्ष:
पारस्परिक शुल्क (Reciprocal Tariffs) वैश्विक व्यापार प्रणाली के लिए एक चुनौती प्रस्तुत करते हैं। यह नीति उन देशों पर शुल्क लगाने की वकालत करती है, जो अमेरिकी निर्यात पर कर लगाते हैं। हालांकि, यह प्रणाली उन देशों की अर्थव्यवस्थाओं को नुकसान पहुँचा सकती है, जो अपने घरेलू उद्योगों की सुरक्षा के लिए संरक्षणवादी शुल्क (Protective Tariffs) पर निर्भर हैं।
भारत के लिए, यह नीति उच्च आयात लागत, घरेलू उद्योगों की कमजोर स्थिति और मुद्रा अवमूल्यन जैसी चुनौतियाँ खड़ी कर सकती है। इसलिए, भारत को आर्थिक हितों की रक्षा करते हुए वैश्विक व्यापार वार्ताओं में संतुलित रणनीति अपनानी होगी।
लंबी अवधि में, व्यापार नीतियों की सफलता इस पर निर्भर करेगी कि देश व्यापार की बदलती परिस्थितियों के अनुरूप कैसे सामंजस्य बैठाते हैं और आर्थिक स्थिरता बनाए रखते हैं।