संदर्भ:
हाल ही में हुए एक अध्ययन के अनुसार पिघलते ग्लेशियरों के कारण इस सदी में वैश्विक समुद्र स्तर में लगभग 2 सेमी की वृद्धि होने की संभावना है। पिछले 25 वर्षों में, ग्लेशियरों में वार्षिक आधार पर 273 बिलियन टन बर्फ की कमी हो रही हैं, जिससे समुद्र स्तर में उल्लेखनीय वृद्धि हुई है।
मुख्य बिंदु :
अध्ययन इस वृद्धि को प्रेरित करने वाले दो प्रमुख कारकों पर प्रकाश डालता है:
1. पिघलते ग्लेशियर/बर्फ की चादरें - वर्ष 2000 से अब तक, ग्लेशियरों ने विभिन्न क्षेत्रों में अपनी बर्फ का 2% से 39% तक हिस्सा खो दिया है। इस कारण समुद्र स्तर में वृद्धि हो रही है, जिससे तटीय क्षेत्रों पर दबाव बढ़ रहा है।
2. समुद्री जल का ऊष्मीय विस्तार - बढ़ते वैश्विक तापमान के कारण समुद्री जल गर्म होकर फैलता है। समुद्र स्तर में हो रही कुल वृद्धि का एक-तिहाई से अधिक हिस्सा इसी कारण हो सकता है।
वैश्विक और क्षेत्रीय रुझान:
● 1880 से अब तक, वैश्विक समुद्र स्तर में 21 सेमी की वृद्धि दर्ज की गई है। समुद्र स्तर वृद्धि की दर 1993 में 0.18 सेमी प्रति वर्ष थी, जो अब बढ़कर 0.42 सेमी प्रति वर्ष हो गई है। सभी क्षेत्रों में प्रभाव समान नहीं है। दक्षिण-पश्चिमी हिंद महासागर में समुद्र स्तर वृद्धि 2.5 मिमी/वर्ष दर्ज की गई है, जो वैश्विक औसत से अधिक है।
तटीय शहरों पर प्रभाव:
● भारत के तटीय शहरों पर समुद्र स्तर में वृद्धि का गहरा प्रभाव पड़ रहा है। मुंबई में 1987 से 2021 के बीच समुद्र स्तर में 4.44 सेमी की वृद्धि दर्ज की गई, जिससे यह अत्यधिक संवेदनशील हो गया है। हल्दिया, विशाखापत्तनम और कोच्चि जैसे शहरों में भी समुद्र स्तर बढ़ रहा है, जिससे तटीय बुनियादी ढांचे और समुदायों को खतरा है।
चिंताएँ और परिणाम:
समुद्र के स्तर में वृद्धि मानव आबादी और पारिस्थितिकी तंत्र के लिए गंभीर खतरे उत्पन्न करती है। इसके प्रमुख प्रभाव निम्नलिखित हैं:
1. तटीय बाढ़ और भूमि क्षरण:
● समुद्र के बढ़ते स्तर से तटीय कटाव और बाढ़ की घटनाएँ बढ़ती हैं, जिससे तट पर रहने वाले समुदायों का विस्थापन होता है।
● केस स्टडी: 1990 से 2016 के बीच, पश्चिम बंगाल तट ने लगभग 99 वर्ग किलोमीटर भूमि खो दी, जो समुद्र स्तर में वृद्धि का स्पष्ट प्रमाण है।
2. वैश्विक भेद्यता (Vulnerability):
● 2024 के एक अध्ययन के अनुसार, वैश्विक आबादी का 29% हिस्सा तट से 50 किलोमीटर के अंदर और 15% लोग सिर्फ 10 किलोमीटर के अंदर रहते हैं। यह आबादी बढ़ते समुद्र स्तर के कारण बाढ़, विस्थापन और आजीविका के नुकसान के उच्च जोखिम का सामना कर रही है।
3. पारिस्थितिकी तंत्र को खतरा:
● समुद्र स्तर में वृद्धि के कारण तूफानों की तीव्रता बढ़ती है, जिससे उष्णकटिबंधीय चक्रवातों के दौरान समुद्री जल और अधिक अंदर तक प्रवेश करता है।इससे मैंग्रोव, प्रवाल भित्तियाँ और दलदल जैसे तटीय पारिस्थितिकी तंत्र प्रभावित होते हैं, जो जैव विविधता संरक्षण और मीठे पानी की सुरक्षा में अहम भूमिका निभाते हैं।
4. जल प्रदूषण में वृद्धि :
● समुद्र का खारा पानी जब अंतर्देशीय जल स्रोतों में प्रवेश करता है, तो यह पीने के पानी की आपूर्ति को दूषित कर सकता है। इससे तटीय इलाकों में जल संकट बढ़ सकता है, जिससे दैनिक जीवन और कृषि पर नकारात्मक प्रभाव पड़ता है।
निष्कर्ष:
समुद्र स्तर में इस निरंतर वृद्धि का प्रमुख कारण ग्लेशियरों का पिघलना और समुद्री जल का ऊष्मीय विस्तार है। यह विशेष रूप से तटीय शहरों और कमजोर आबादी के लिए एक गंभीर खतरा उत्पन्न कर सकता है। इस संकट से बचने के लिए ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन में कमी और जलवायु परिवर्तन शमन उपायों को तत्काल लागू करना आवश्यक है।