संदर्भ:
हाल ही में भारत और बांग्लादेश के संयुक्त नदी आयोग ने कोलकाता में दो दिवसीय बैठक आयोजित की, जिसमें गंगा जल संधि पर विस्तार से चर्चा की गई।
यह संधि 1996 से दोनों देशों के बीच जल बंटवारे को नियंत्रित कर रही है और 2026 में समाप्त होने वाली है। इस पृष्ठभूमि में हुई इस बैठक का उद्देश्य संधि के नवीनीकरण तथा जल बंटवारे से संबंधित अन्य मुद्दों को संबोधित करना था।
गंगा जल संधि के बारे में:
1996 में हस्ताक्षरित गंगा जल संधि, गंगा नदी के जल संसाधनों के न्यायसंगत और संतुलित वितरण को सुनिश्चित करती है। यह संधि शुष्क मौसम (dry season) के दौरान किसी एक देश द्वारा जल के अनियंत्रित मोड़ (diversion) को रोकने के लिए एक संरचनात्मक व्यवस्था प्रदान करती है।
संयुक्त नदी आयोग (JRC) की भूमिका:
1972 में स्थापित संयुक्त नदी आयोग, भारत और बांग्लादेश के बीच 54 सीमा-पार नदियों के प्रबंधन की देखरेख करता है। यह आयोग गंगा जल संधि के प्रभावी क्रियान्वयन और निगरानी में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहा है।
चर्चा में शामिल मुख्य मुद्दे:
1. गंगा जल संधि का नवीनीकरण:
संधि के 2026 में समाप्त होने के मद्देनजर, दोनों देशों ने इसके नवीनीकरण और अद्यतन पर विचार-विमर्श किया। जल-बंटवारे से जुड़ी नई चुनौतियों को ध्यान में रखते हुए, संधि को अधिक प्रभावी और समकालीन परिस्थितियों के अनुरूप बनाने पर चर्चा हुई।
2. गंगा के अतिरिक्त अन्य नदियों का जल-बंटवारा: भारत से बांग्लादेश में प्रवाहित होने वाली अन्य नदियों के जल-बंटवारे की आवश्यकता को देखते हुए, बैठक में इस विषय पर भी विचार किया गया। इन अतिरिक्त नदियों में उचित जल वितरण की सिफारिश करने के लिए एक तकनीकी समिति का गठन किया गया । यह हाल के वर्षों में एक प्रमुख मुद्दा बन गया है।
3. जल प्रवाह का मापन: जल प्रवाह के सटीक मापन और डेटा साझाकरण की पारदर्शिता सुनिश्चित करना एक महत्वपूर्ण विषय रहा। बैठक में जल प्रवाह मापने की तकनीकी चुनौतियों को हल करने के लिए दोनों देशों के विशेषज्ञों द्वारा विचार-विमर्श किया गया।
4. न्यायसंगत जल वितरण सुनिश्चित करना: संधि का मूल सिद्धांत जल का समान और निष्पक्ष वितरण है। दोनों देशों ने एकतरफा जल-आवंटन को रोकने और विशेष रूप से शुष्क मौसम के दौरान निष्पक्षता बनाए रखने के उपायों पर चर्चा की।
बैठक का महत्व:
● यह बैठक अगस्त 2024 में बांग्लादेश में नई सरकार के गठन के बाद पहली महत्वपूर्ण द्विपक्षीय वार्ता थी। यह द्विपक्षीय संबंधों को मजबूत करने और साझा जल संसाधनों पर सहयोग के लिए प्रतिबद्धता की पुष्टि करने में एक महत्वपूर्ण कदम था।
आगे की राह:
संधि के समाप्ति काल को देखते हुए, इसके नवीनीकरण और सुधार की दिशा में निरंतर संवाद आवश्यक होगा। भारत और बांग्लादेश को—जलवायु परिवर्तन के प्रभाव, जल संसाधनों की घटती उपलब्धता, और भविष्य में बढ़ती जल मांग जैसे कारकों को ध्यान में रखते हुए दीर्घकालिक रणनीतियाँ अपनाने की आवश्यकता होगी। गंगा जल संधि का नवीनीकरण न केवल भारत-बांग्लादेश संबंधों को एक नई दिशा देगा, बल्कि यह अंतर्राष्ट्रीय जल-बंटवारे समझौतों के लिए भी एक मॉडल के रूप में कार्य कर सकता है।