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Blog / 02 Apr 2025

पश्चिमी घाट में मानसून की तीव्रता में वृद्धि

परिचय:
केरल केंद्रीय विश्वविद्यालय (CUK) के शोधकर्ताओं द्वारा की गई एक हालिया अध्ययन में पाया गया है कि पिछले 800 वर्षों में पश्चिमी घाट में मानसूनी वर्षा में उल्लेखनीय वृद्धि हुई है। यह अध्ययन पिछले 1,600 वर्षों के भारतीय मानसून पैटर्न को फिर से समझने का प्रयास करता है। इससे यह पता चलता है कि मानसून की तीव्रता लगातार बढ़ रही है, जिसका असर जलवायु परिवर्तन पर भी पड़ सकता है।

अध्ययन के प्रमुख निष्कर्ष

  • अध्ययन के अनुसार, पिछले 800 वर्षों में पश्चिमी घाट में मानसूनी बारिश लगातार बढ़ रही है।
  • मानसून की इस दीर्घकालिक वृद्धि के कारण हाल के वर्षों में अधिक बार और तीव्र बारिश की घटनाएं हो रही हैं।
  • उदाहरण के लिए, 2018 और 2019 में केरल के वायनाड और कर्नाटक के कोडागु में आई भयंकर बाढ़ और भूस्खलन संभवतः जलवायु परिवर्तन का ही एक हिस्सा हो सकते हैं, कि केवल संयोग।
  • भविष्य में भी मानसून की तीव्रता बढ़ने से इस तरह की प्राकृतिक आपदाओं की संभावना अधिक हो सकती है।

आपदा प्रबंधन की आवश्यकता

  • यह अध्ययन दर्शाता है कि पश्चिमी घाट, जो अपनी जैव विविधता और पारिस्थितिकीय संवेदनशीलता के लिए जाना जाता है, वहां आपदा प्रबंधन को और मजबूत करने की जरूरत है।
  • विशेषज्ञों का मानना है कि बाढ़ और भूस्खलन जैसी घटनाओं से निपटने के लिए बेहतर बुनियादी ढांचे और प्रभावी प्रारंभिक चेतावनी प्रणाली विकसित करना आवश्यक है।
  • इसके अलावा, जिन क्षेत्रों में बार-बार बाढ़ और भूस्खलन होते हैं, वहां समय पर लोगों को सुरक्षित स्थानों पर पहुंचाने की योजना बनानी चाहिए।

सतत भूमि उपयोग और संरक्षण की आवश्यकता

आपदा प्रबंधन के साथ-साथ, यह अध्ययन पश्चिमी घाट में सतत भूमि उपयोग (सस्टेनेबल लैंड यूज) और बेहतर संरक्षण उपायों पर भी जोर देता है।

  • वर्षा की बढ़ती तीव्रता से भूस्खलन, बाढ़ और मिट्टी के कटाव का खतरा बढ़ जाता है, जिससे मानव बस्तियों और प्राकृतिक पारिस्थितिकी तंत्र को नुकसान हो सकता है।
  • इसलिए, दीर्घकालिक पर्यावरण नीतियों को लागू करना जरूरी है ताकि इन जोखिमों को कम किया जा सके।
  • इसके लिए टिकाऊ भूमि प्रबंधन (सस्टेनेबल लैंड मैनेजमेंट) और प्रभावी संरक्षण प्रयासों की आवश्यकता है, जिससे पश्चिमी घाट की जैव विविधता सुरक्षित रह सके और इसका पारिस्थितिकी तंत्र संतुलित बना रहे।

निष्कर्ष

केरल केंद्रीय विश्वविद्यालय के शोधकर्ताओं द्वारा किए गए इस अध्ययन से यह स्पष्ट होता है कि पश्चिमी घाट में मानसून की तीव्रता लगातार बढ़ रही है। यदि यह प्रवृत्ति जारी रही, तो इससे भविष्य में बाढ़ और भूस्खलन जैसी आपदाएं बढ़ सकती हैं। इसलिए, इन चुनौतियों से निपटने के लिए सक्रिय कदम उठाने की जरूरत है।

  • बेहतर आपदा प्रबंधन,
  • सतत भूमि उपयोग नीति,
  • और दीर्घकालिक पर्यावरणीय नीतियों को लागू करना बहुत जरूरी है।

इस अध्ययन के निष्कर्ष नीति-निर्माताओं, पर्यावरणविदों और स्थानीय समुदायों के लिए एक चेतावनी और कार्य करने की अपील है ताकि पश्चिमी घाट को जलवायु परिवर्तन के प्रभावों से बचाया जा सके।